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राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों में फोन बांटने का खेल क्या है?

06/11/2018 हमारे वक्त की राजनीति को सिर्फ नारों से नहीं समझा जा सकता है. इतना कुछ नया हो रहा है कि उसके अच्छे या बुरे के असर के बारे में ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो रहा है. समझना मुश्किल हो रहा है कि सरकार जनता के लिए काम कर रही है या चंद उद्योगपतियों के लिए. मीडिया में इन नई बातों की समीक्षा कम है. समीक्षा करने की काबिलियत भी कम है. मीडिया सिर्फ नारों के पीछे भाग रहा है. मीडिया के भागते रहने के लिए हर हफ्ते एक नारा लॉन्‍च कर दिया जाता है.बिजनेस स्टैंडर्ड में आधे पन्ने पर पांच कॉलम का कुमार संभव श्रीवास्तव का लेख पढ़ा. यह लेख राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा बांटे गए जियो कनेक्शन से लैस मोबाइल पर है. आपको पता होगा कि विधानसभा चुनावों को देखते हुए राजस्थान और छत्तीसगढ़ में डेढ़ करोड़ परिवारों को मोबाइल हैंडसेट बांटे गए हैं. इस फोन में इंटरनेट कनेक्शन भी है. दोनों राज्यों की तीन-चौथाई आबादी के पास सरकारी स्मार्टफोन पहुंच गया है. पर इसका क्या असर है, इससे किस तरह की जानकारी एक कंपनी या एक कंपनी के ज़रिए सरकार के पास जा रही है, इसकी न जनता के बीच समझ है और न ही समझने का दावा करने वालों के बीच.
यह सब पब्लिक टेंडर से हुआ है. दोनों राज्यों में टेंडर के ज़रिए जियो मोबाइल को मौका मिला है. छत्तीसगढ़ में खुला टेंडर के ज़रिए रिलायंस जियो को पचास लाख परिवारों को इंटरनेट कनेक्शन देने का ठेका मिला है. अंग्रेज़ी में नेटवर्क लिखा है. इस फोन में दो साल तक जियो का ही नेट कनेक्शन रहेगा. बीच में इसे नहीं बदला जा सकेगा. उपभोक्ता को छह महीने तक इंटरनेट मुफ्त मिलेगा. बदले में कंपनी को राज्य सरकार अपना टावर लगाने के लिए ज़मीन देगी जिसका दस साल तक कोई किराया नहीं लगेगा. इसके साथ एक विकल्प भी मिला है कि वह सरकार के ई-पेमेंट सेवाओं को भी चलाए. फोन माइक्रोमेक्स का है और इंटरनेट जियो का. सरकार इस पर 1400 करोड़ से अधिक की रकम ख़र्च करेगी.

गणेश शंकर समाचार सेवा

आजादी की पत्रकारिता को ध्यान में रख कर ही  हमने बर्ष 1981 दिसम्बर 11  से दैनिक राष्ट्र भ्रमण समाचार पत्र से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की है.


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