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आदरणीय - आपको मेरा नमस्कार । संतोष गंगेले ,  संघर्ष का नाम संतोष गंगेले : - 

 

 

मेरे बारे में आप पूरी जानकारी रख सकते है 
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1-नाम - संतोष कुमार गंगेले 
2-पिता का नाम - श्री प्यारे लाल गंगेले 
3-माता का नाम - श्रीमती सुमित्रा देवी 
4-मेरा जन्म स्थान - ग्राम बीरपुरा पो0 नौगाव (बुन्देलखण्ड) थाना नौगाव जिला छतरपुर मध्य प्रदेष

5-मेरी शिक्षा- बी.ए. बापू महाविद्यालय नौगाव जिला छतरपुर मध्य प्रदेश  

6-मेरी धर्म पत्नी स्व0 श्रीमती प्रभा देवी बर्तमान श्रीमती रंजना देवी 
7-मेरी संतान- मेरी पहली पत्नी की चार संतान दो पुत्र कुलदीप , राजदीप दो पुत्रियाँ- मंदाकनी -अभिलाषा मेरी बर्तमान पत्नी रंजना देवी की एक संतान- रत्नदीप 
मेरी जन्म तिथि 11 दिसम्बर सन् 1956 है ।

8-मेरे भाई बहन - राजेन्द्र कुमार गंगेले-अधिबक्ता, सुरेश गंगेले सहित्यकार, लेखक, पत्रकार , कैलाश मजदूर बहन - गीता , गृहणी

9- मेरा पिता जी- मेरे पिता एक कुख्यात अपराधिक जीवन के बाद संत हुये , संत होने के बाद , मेरी माँ के साथ भारत का भ्रमण किया । श्रीराम चरित मानस का बिषेष ज्ञान रखते थें, तथा भविष्य बक्ता रहे ।
संत हो जाने के बाद उन्होने समाज में भारतीय संस्कृति के माध्यम से समाज सेवा की, बाल्यमीक जी की तरह उनका जीवन रहा है ।

10-मेरा बचपन- मेरा बचपन बहुत ही कठिन परिस्थितिओ से गुजरता हुआ रहा । क्यों कि पिता जी के संत हो जाने के बाद अपने छोटे भाईयों व बहन का पालन पोषण का कार्य मेरे कंधों पर था , इसलिए मेने ईश्वर की कृपा से अपने जीवन को कर्मयोग के रूपमें स्वीकार करते हुये कठिन से कठिन कार्य करते हुये भाई बहनों का मुशिबतों से दूर रखा, उनका पालन पोषण किया तथा उनकी षिक्षा पर ध्यान देकर उन्हे सक्षम बनाया । परिवार की माली हालत ठीक न होने के कारण एक समय व्यापारियों के यहाँ कार्य किया एक समय अध्ययन स्वयं किया , सत्य को साथ रखा ईमानदारी को मित्र बनाया , सफलता साथ चली अपने मुकाम तक पहुचने में मुझे आप सभी का साथ रहा ।

11-परिवारिक समस्याओं को दूर करने केलिए भारत सरकार की आर्मी एमईएस में चैकीदार रहा उसके बाद मैने 1979 में दिल्ली जाकर एक साल तक मजदूरी का कार्य किया, वहाँ से आकर चाय पान की दुकान खोलकर हायर सेकेण्ड्री की परीक्षा उत्तीर्ण करते हुये बी0ए0 में प्रवेष लिया । बी0ए0 फाइनल हो जाने के बाद एल.एल.वी. में प्रवेश लिया था.

12- छात्र नेता के रूप में- हायरसेकेण्ड्री की परीक्षा के दौरान छात्र नेता के रूपमें पहली बार छात्र संघ का सचिव बना , मंच का कलाकार बनने के शौक ने मुझे रंगमंच पर भी अवसर मिला जिसमें सफल हुआ । जिला , संभाग, एवं बुन्देलखण्ड स्तर के पत्रकार सम्मेलन कराने का भी अवसर मिला है ।

13-पत्रकारिता में प्रवेश- सन् 1981 में छतरपुर से प्रकाशित दैनिक राष्ट्र-भ्रमण समाचार पत्र का पहली बार संवाददाता नियुक्त हुआ । उसके बाद मुझे पत्रकारिता में इतनी रूचि हुइ कि मैं छतरपुर के साथ साथ सतना, भोपाल, रीवा , ग्वालियर, सागर, झाॅसी , कानपुर आदि शहरो  के राष्ट्रीय समाचार पत्रों में लिखने लगा । पत्रकारिता के क्षेत्र में ख्याती प्राप्त हो जाने के कारण समाज सेवा एवं राजनैतिक क्षेत्र में पहुॅच हुई । अनेक लेख कवितायें , कहानी भी लिखने का शौक रहा । हम भूल गए अपने दायित्व ,महिलाओं पर लेख। 

14-सन् 2004 से कम्प्यूटर का अनुभव लेकर, इंटरनेट पर अपनी पहचान बना सका हॅू । मेरी तस्वीरो एवं नेट पोर्टल के माध्यम से अनेक बेब साईटों पर लेखक का कार्य कर रहा हॅू । आप मेरे बारे में गॅूगल में लिखे- santosh gangele my portal-www.mpmirror.com ,  www.ganeshshankarsamacharsewa.in  , www.Ajmernama.com  ,  www.rainbonews.in  and other wew..


15-अपने कर्म के व्दारा भाग्य बदलने का लगातार प्रयास जारी रखा, छतरपुर जिला कलेक्टर श्री होशियार सिंह जी ने रोजगार केलिए तहसील में प्राइवेट याचिका लेखक के रूपमें मुझे नियुक्त किया । रोजगार के साधन जुट जाने के बाद मेरे विकाश की गति बढ़ती गई । पत्रकारिता समाज सेवा लेखक के साथ साथ षिक्षा ग्रहण करते हुये सन् 1984 में बी0ए0 फाईनल किया । सन् 1985 में विवाह संस्कार हुआ । इस आयोजन में रिष्तेदारों के अतिरिक्त समाजसेवी, अधिकारी, नेता, पत्रकारों ने मेरा साथ दिया ।

16-सुख दुःख की यात्रा के बीच सन् 1993 में मेरी धर्म पत्नी का निधन हो गया । ईष्वरी कृपा से दो माह के अंदर ही दूसरा विवाह 14 दिसमबर 1993 को एक गरीव किसान परिवार में हुआ । मेरी दूसरी धर्म पत्नी ने बो इतिहास रचा जो आज तक लाखों में कोई एक महिला ही रच सकती है , पहली पत्नी के चार बच्चों का पालन पोषण हो जाने के बाद उनकी इच्छा से एक पुत्र को जन्म देकर , नसबंदी करा दी । सभी बच्चों का पालन पोषण इस प्रकार किया कि कोई माँ अपने पुत्रों की नही कर सकती थी । यहीं मेरे पुण्य प्रताप थें । यही ईष्वर भक्ति है ।

17- भगवान श्री कामता नाथ चित्रकूट व भगवान श्री राम राजा सरकार श्री ओरछा बालों की कृपा से मुझे दुर्जनो की संगति प्राप्त नही हुई , किसी प्रकार की नषा की आदत नही हुई । मेरा व्यवहार सत्य पर निर्धारित है । मै जो कहता है सामने कहता है इसलिए कुछ लोगों को सत्य हजम नही होने के कारण मेरी बुराईयाॅ करते है । मेरे जीवन की सैकड़ों ऐसी घटनायें हैं जो आज की युवा पीढ़ी केलिए एक सबक नजीर हो सकती है ।

18- जीवन में नियम व संयम का पालन किया । किसी विशेष संकट या बीमारी में मुझे सूर्य उदय के बाद उठने का अवसर मिला अन्यथा आज तक विस्तर पर सूर्य उदय नही हुआ । प्रतिदिन अध्यात्मिकता का अध्ययन ईश्वर का नाम , समाज सेवा की लगन , गरीवों पीड़ित परेषानों की मदद ही मेरी मौत को दूर भगाते आ रही है । ईष्वर से प्रार्थना है कि समाज में बहुत कुछ कार्य करना बाकी है यदि समय मिला तो करने का प्रयास जारी होगा ।

19- सन् 2004 से कम्प्यूटर का हल्का ज्ञान रखता हॅू । इंटरनेट पर अपनी पहचान बनाने केलिए कुछ करता रहता हॅू । सन् 2007 से नौगाॅव जनपद पंचायत क्षेत्र की प्राथमिक , माध्यमिक एवं हायर सेकेण्ड्री स्कूलों में जाकर बच्चों के बीच बाल सभाओं का आयोजन कराना, प्रतिभाओं को निखारने का कार्य करता हॅू तथा शिक्षकों का सम्मान, समाज सेवा करने बालों, ईमानदार कर्मचारियों का सम्मान, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियेां पत्रकारो को सम्मान करना पहली कर्तव्य है । जो पुलिस कर्मचारी उत्तम या समाज में अच्दा कार्य करते है उनका अनिेकों वार सम्मान किया । मेरा भी दिल्ली व मथुरा में सम्मान हो चूका है। 

20-शहीद गणेष शंकर विद्यार्थी जी के जीवन से प्रभावित होकर गणेष शंकर  विद्यार्थी प्रेस क्लब का गठन कर  संस्था का पंजीयन कराया है । इस संस्था के माध्यम से मध्य प्रदेष के सम्पूर्ण जिला के पत्रकारों को एक मंच पर लाने एवं पत्रकारिता की गरिमा बनाये रखने, पत्रकारों की समस्याओं का हल कराने का मेरा लक्ष्य है जो सभी के सहयोग से ही पूरा होगा । 

21-  1  जुलाई 15 जन्म स्थान वीरपुरा में एक शिक्षा पर विशाल आयोजन जिसमे पांच सूत्रीय जागरूकता अभियान शुरू होगा - शिक्षा ,स्वास्थ्य ,स्वच्छता ,समरसता ,समाज को  प्रदेश में आयोजन होगें। 

प्रयास मेरा -सहयोग आपका ।

यदि आप इंटर नेट पर है तो आप गूँगल में मुझे खोज सकते है । 
सिर्फ लिखना है – santosh gangele

 


आपका

(संतोष कुमार गंगेले ) प्रदेश अध्यक्ष गणेश शंकर विधार्थी प्रेस क्लब मध्य प्रदेश। 
मेरा सम्पर्क नं. 09893196874 है 

वेबसाइट : www.ganeshshankarsamacharsewa.in 

ई-मेल - 

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-------हिन्दी साहित्य के लेखक कौशल किशोर रिछारिया की कलम से--------


सूखी रोटी -दीपक की रोशनी से दिखाया प्रगति का मार्ग 
कर्म को द्वारा भाग्य को बदलने में संतोष गंगेले ने मेहनत का लिया सहारा 

 

बुन्देलखण्ड की धरती का अपना एक इतिहास है, भारत भूमि के मध्य बुन्देलखण्ड राज्य की मांग भी अपनी चरम सीमा पर चल रही है, बुन्देलखण्ड की राजधानी कहा जाने बाला कस्बा नौगाॅव छावनी के नाम से जाना जाता है, नौगांव छावना से पश्चिम दिशा में बसा छोटा सा ग्राम बीरपुरा है जो उत्तर प्रदेश की सीमा से लगा हुआ है, इस ग्राम की सरहद से बना धवर्रा सरकार का एक विशाल मंदिर ने अपना धार्मिक स्थान बना लिया है, बुन्देलखण्ड मोर्टस ट्रान्स्पोर्टट कं. के मालिक साकेतवासी स्व. श्री नारायण दास जी अग्रवाल ने इस मंदिर के लिए अपना तन-मन-धन ही समर्पित किया है, इस मंदिर में ऐसा भी एक आयोजन हो चुका है जिसमें तीन पीठ के स्वामी शंकरार्चाय के प्रवचन एक मंच से हो चुके है । इस स्थान को त्रिवेणी का स्थान की संज्ञा दी जा सकती है ।

ग्राम बीरपुरा का अपना एक इतिहास रहा है, यह ग्राम किसान खेतीहल मजदूरों का ग्राम था लेकिन देश की आजादी के बाद इस ग्राम में शिक्षा का विकास किया गया जिससे ग्राम में शिक्षण संस्था खुल जाने से ग्राम के बच्चों को पढ़ने के लिए छावना न जाकर अपने ग्राम में ही अध्ययन का अवसर मिला । ग्राम बीरपुरा में क्षत्रिय खॅगार जाति की संख्या अधिक रही कुछ ही परिवार राजपूत कुशवाहा, ढीमर के थें दो ही ब्राम्हण परिवार जिसमें प्रागनारायण नायक व बूचे गंगेले का परिवार था, इस ग्राम की एक अजव गजब कहानी भी है कि प्रागनारायण नायक व हरदास खॅगार (राय) आपस में परममित्र थें तथा उनकी मित्रता भी एक मिशाल थी दो मित्रों का विवाह भी एक ही साल में हुआ , प्रकृति की देन कहे कि प्रागनारायण नायक के छ: पुत्र व तीन पुत्रियाॅ थाी, इस प्रकार हरदास राय के भी छ: पुत्र व तीन पुत्रियाॅ हुई । दोनो मित्रों का जिस दिन निधन हुआ वह तिथि भी 27 सितम्बर 1977 का दिन था कि सुबह हरदास राय का निधन हुआ जिसका पता चलते ही दोपहर 3 बजे श्री प्रागनारायण नायक का भी निधन हो गया । 

इस प्रकार का संयोग भरा इतिहास बीरपुरा के साथ हम ऐसे एक युवक के जीवन से जुड़े उन तमाम घटनााओं को दर किनार करते हुये प्रमुख अंश लेते हुये लिखते है कि ग्राम बीरपुरा में एक गृहस्थ संत (साधु) हरिहर बाबा के नाम से जाने जाते थें, उनके यहां चार संतान होने के बाद भी संतान का जीवित न रह पाने के कारण संत ने अपनी धर्म पत्नि श्रीमती सुमित्रा देवी के साथ भगवान श्री राम के वनवास की स्थली चित्रकूट धाम की परिक्रमा करते हुये यह संकल्प लिया कि प्रभु हमे अब जो संतान दे वह जीवित रहे तथा समाज के कार्य में काम आने बाली देना । ईश्वरीय कृपा की वह संतान का जन्म 11 दिसम्बर 1956 को हुआ जिसका नाम उनकी दादी ने नाम संस्करण संतोष के नाम से दिया । जिस समय संतोष का जन्म हुआ उस समय परिवार की मालीहालत बहुत ही नाजुक व खराब थी । पिता के संत होने पर परिवार की भूमि को ही करने बाला कोई नही था परिवार के अन्य लोग ही भूमि में जो कुछ कर लेते उसी का अंश देते था, माता सुमित्रा देवी एक गृहस्थ जीवन जीने की अच्छी कला जानती थी भले ही वह अषिक्षित रही । संत हरिहर वावा जी की पाॅच संतानों में संतोष बड़ी संतान के रूपमें हुए । अपने होष संभालते ही उन्होने घर परिवार व समाज केलिए कार्य किये है अपने माता-पिता की सेवा व सम्मान करने में कभी पीछे नही रहे है । संतोष कुमार सबसे बड़ी संतान है उनके तीन भाई कैलाश, राजेन््रद कुमार , सुरेश कुमार व एक बहन गीता है । राजेन्द्र कुमार अधिबक्ता के साथ साथ उर्दू के जानकार है सुरेश एक लेखक व साहित्यकार है|

कठिनाईयों में ग्रहण की शिक्षा 

संतोष ने अपना अध्ययन एक कठिनाई भरे जीवन से शुरू की , बचपन से ही चंचल व तेज स्वभाव के कारण शिक्षण संस्था के प्रमुख ने हमेशा स्लेट, पेंसिल, पुस्तके उपलव्ध कराई तथा कक्षा में आगे बैठा कर अध्ययापन कराया सन् 1965 में कक्षा 5 वी उत्तीण्र करने के बाद बालक हायर सेकेण्ड्री नौगाॅव में कक्षा 6 वी का अध्ययन शुरू किया ,गाॅव से शहर की ओर आते ही कुछ दुर्जनों की संगति से शिक्षा अध्ययन में परेशानी गई तो पिता जी शिक्षा को बंद कराकर नौगाॅव नगर में व्यापारियों के यहां मजदूरी कार्य में लगा दिया । जब व्यापारियों व महाजन लोगों की संगति का असर हुआ तो पुनः शिक्षण संस्थान में प्रवेश दिलाया गया । 

नगर के व्यापारी श्री लक्षमी चन्द्र जैन ने इस बालक को पढ़ने के लिए समय दिया जिससे सुबह 7 से दोपहर 12 बजे तक स्कूल , दोपहर 12 बजे से रात्रि 8 बजे तक व्यपारी के यहाँ ही कार्य करना होता था , रात्रि 9 बजे घर पहुँचने के बाद भोजन करने के बाद एक से दो घंटे दीपक की रोशनी में अध्ययन करने की ललक ने उसे अंधेरे से प्रकाश की ओर आकर्षित कर दिया , सुबह 4 बजे से उठना, नित्य क्रिया करने के बाद स्कूल जाना , घर परिवार के कार्य करना, अपने कर्तव्यों का ज्ञान न होने के बाद भी खेल खेल में भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों का ज्ञान अर्जित कर लिया । सन् 1977 में घर-परिवार में भीषण संकट आ जाने के बाद कक्षा 8 वी से पुनः शिक्षा छोड़कर जिला रोजगार कार्यालय छतरपुर में नाम लिखा कर रोजगार की तलाश की, भाग्य ही कहे कि आर्मी आई.टी.वी.पी. पुलिस ने नोगाॅव छावनी से अपना डेरा उठाया तो एम.ई.एस. में चोकीदारी के पद पर अस्थाई मस्टर पर काम मिल गया, मस्टर के माध्यम से 2 साल तक सेन्टर की नोकरी करने के बाद सन् 1779 में चैकीदारी पद से हट जाने के बाद दिल्ली रवाना हो गये । दिल्ली में मजदूरी मेहनत के काम को अंजाम देते हुये परिवार का संचालन किया । भगवान में आस्था रखने के कारण , ईष्वरी प्रेरणा से दिल्ली से पुनः नौगाॅव आकर एक चाय पान की गुमटी लगाकर कार्य शुरू किया । इसी बीच कुछ मित्रों से चर्चा के बाद हायर सेकेण्ड्री की परीक्षा की चर्चाएं होने पर फार्म डाल दिया । चॅूकि इसी दुकान में छोटे भाई भी साथ देने लगे थें इस कारण समय मिलने पर स्वंय पुनः अध्ययन किया और अपने भाई बहनों को साथ में पढ़ाया । लगन व मेहनत के कारण हायर सेकेण्ड्री स्कूल की परीक्षा उत्र्तीण कर ली, हायर सेकेण्ड्री हो जाने के बाद , बापू महावि़द्यालय नौगाॅव में बी0ए0 में प्रवेष लिया , दुकान के साथ साथ बी0ए0 की परीक्षाओं की तैयार की । 

इसी बीच छात्र नेताओं के साथ रहने के कारण राजनैतिक ज्ञान हो गया तथा पत्रकारिता समाचार पत्रों का अध्ययन किया । सन् 1981 में छतरपुर से प्रकाशित दैनिक राष्ट्र-भ्रमण में संवाददाता की जगह निकलने पर संपादक श्री सुरेन्द्र अग्रवाल से मिलने पर उन्होने समाचार भेजने के तौर तरीके समझा दिया । यह संतोष के जीवन का पहला दिन था जब समाज सेवा करने केलिए कलम के पुजारी बने । समय के साथ छतरपुर से प्रकाशित दैनिक सीक्रेट बुलेटिन, कर्तव्य, दैनिक कृष्ण क्रांति, साप्ताहिक ओरछा बुलेटिन में समाचार लिखना शुरू किया । सहयोगियों के साथ टाईपिंग परीक्षा भी दी जिसमें मध्य प्रदेष भोपाल वोर्ड से उत्र्तीण कर दिखाई । परीक्षा उत्तीर्ण होने के बाद नौगाॅव न्यायालय में पं0 गोविन्द तिवारी अधिबक्ता के साथ टाईपिस्ट के रूपमें कार्य किया । भारतीय संस्कृति व संस्कार प्राप्त होने के कारण समाज सेवा करने का मन हुआ इसी के साथ छतरपुर जिला कलेक्टर श्री होशीयार सिंह ने तहसील कार्यालय में लेखक के रूप में कार्य करने की अनुमति दी जिससे विकास की गति जुड़ती चली गई , अच्छे संस्कारों के साथ उत्तम विचार वालों का साथ मिला , लगातार प्रगति के पथ पर बढ़ते चले आ रहे है । 

पत्रकारिता को एक मिशन के रूपमें स्वीकार किया

संतोष गंगेले ने पत्रकारिता को एक मिशन के रूप में स्वीकार करते हुये छतरपुर से प्रकाशित समाचार पत्रों के साथ साथ दैनिक जागरण झाँसी, दैनिक जागरण रीवा, दैनिक आलोक रीवा, देनिक बान्ध्वीय समाचार रीवा, साप्ताहिक दमोह संदेश, दैनिक नव भारत भोपाल, रीवा ,दैनिक भास्कर सतना, दैनिक आचरण ग्वालियर, सागर, जबलपुर, कानपुर आदि के समाचार पत्रों में धुॅआधार पत्रकारिता करते हुये नौगाॅव का नाम गौरवान्ति किया । सन् 1986 में हिन्दुस्तान के इतिहास में पहली वार किसी पत्रकार संगठन ने जिला जज एवं सत्र न्यायाधीश श्री एम0एसत्र कुरैषी छतरपुर से शपथ ग्रहण कर समाज में व्याप्त बुराईयों को दूर करने का साहस किया । लगातार 14 सालों पर नोगाॅव तहसील ईकाई के अध्यक्ष पद पर रहते हुये अनेक जिला एवं सभाग स्तर के पत्रकार सम्मेलन कराने का अवसर किया । आज उन्होने शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी के जीवन को पढ़कर उनके आदर्श को स्वीकार करते हुये उनके नाम से प्रान्तीय प्रेस क्लब का गठन कर सम्पूर्ण प्रान्त में पत्रकारिता के क्षेत्र में व्याप्त बुराईयों को दूर करने केलिए नया संगठन तैयार किया है । अनेक ऐसे उदाहरण दिये जा सकते है लेकिन एक कर्मयोगी के जो गुण होना चाहिये वह संतोष गंगेले में पाये जाते है । इंटरनेट सेवाओं का लाभ लेकर भोपाल के श्री पवन देवलिया जी से संपर्क होने पर एमपी मिरर समाचार सेवा भोपाल का छतरपुर जिला का व्यूरोचीफ नियुक्त किया गया तथा अजमेर नामा के संचालक श्री गिरधर तेजवानी से ने उन्हे बहुत बड़ा योगदान किया । आज इंटरनेट पोर्टल में सर्वाधिक समाचार भेजने का काम किया है । यदि आप उनकी बारे में जानकारी चाहे तो गूॅगल में संतोष गंगेले लिखकर उनकी जीवनी व लेखनी का पता लगा सकते है। पिछले माह शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब संस्था का गठन कर सम्पूर्ण मध्य प्रदेश में इसका कार्य क्षेत्र तय किया है । इस संस्था के माध्यम से प्रदेश के प्रत्येक जिला व ग्राम तक इस संस्था के सदस्य बनाने का संकल्प है । 

भारतीय संस्कृति-संस्कारों की अलख जगाने निकले है 

बर्तमान समय में भारतीय संस्कृति एंव संस्कारों का पतन हो रहा है उसे बचाने केलिए समाज मे ऐसे लोगों को ही आने होगा जो समाज के लिए कुछ त्याग कर सके, अपनी भारतीय संस्कृति संस्कारों , परम्परों को बचाकर पौराणिक कथाओं के आधार पर मानव जीवन जीने की कला दे सकते है । भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों को बचाने केलिए बच्चों में ही संस्कार डाले जाना चाहिये । प्रत्येक व्यक्ति को अपने धार्मिक ग्रन्थों से अध्यात्मिकता को पाठ सीखना ही अति आवष्यक हो गया है संतोष गंगेले अब एक ऐसा नाम है जो नौगाॅव के साथ साथ छतरपुर एवं टीकमगढ़ जिला की जनता जानती है, उत्तर प्रदेष के सीमावर्ती ग्रामों में उनकी अपनी एक ख्याती है । अपराध व अपराधिओं से दूर रह कर ही वह अभी तक अपना जीवन व्यतीत करते आ रहे है । उनके पास जीवन जीने की ऐसी कला चली आ रही है कि अपने नियम व संयम से चलने के कारण अपनी जीवन को समय बध्द किये हुये है । राजनीति में विश्वासघात व धोखे की राजनीति आ जाने के कारण वह नेताओं से परहेज करते है लेकिन जो जन प्रतिनिधि, राजनेतिक नेता, समाजसेवी, कर्मचारी योग्य कुशल व त्याग करने बाले है उनका सम्मान करने में कभी पीछे नही रहते है । मुॅह पर सच्ची बात बोलने के कारण वह कुछ लोग्रों की आॅच केलिए मिर्च हो सकते है लेकिन सामाजिक एवं समाज की सुरक्षा करने बाले केलिए वह एक नजीर बन कर सामने आ गये है । स्वंय आत्म निर्भर बनना, अपने भाईयों को आत्म निर्भन बनाने में उन्होने अपना जीवन लगाकर परिवार की इज्जत को बचाकर रखा|

संतोष गंगेले बर्ष 2007 से नौगाॅव जनपद पंचायत क्षेत्र के सो से अधिक ग्रामों की शिक्षण संस्थाओं में बाल सभाओं के माध्यम से बच्चों को प्रोत्साहित करते है तथा उनकी प्रतिभाओं को निखाने का काम भी करते है । इस दौरान बच्चों को टाॅपी मिठाईयाॅ, उपहार स्वरूप पठन पाठन की सामग्री व साहित्य भी देते आ रहे है । हाल ही मे उन्होने ब्राहम्ण समाज की कन्याओं के विवाह में नगद धन राषि देना बंद करते हुये श्री राम चरित मानस ग्रन्थ देना शुरू किया है जिसका समाज के लोगों ने सम्मान किया है लेकिन कुछ लोगों ने इसकी उपयोगिता को व्यर्थ भी कहा है । अनेकों वार आकाशवाणी से भी वार्तायें प्रसारित हो चुकी है । 

जीवन में नशा को कभी हाथ नही लगाया 

किसी व्यक्ति के गुण व दोष छुपते नही है, इंत्र लगाने से वह अपनी खुशबू छोड़ता है, प्यार मोहब्बत हो जाने पर उसे दूर नही किया जा सकता है, इसी प्रकार से यदि कोई व्यक्ति किसी भी तरह का नशा करता है तो वह पता चल जाता है , संतोष गंगेले ने अपने बचपन से इतनी लंबी उम्र पार करने तक कभी कोई नशा नही किया है, पान, बीड़ी, सिगरेट, गुटका, तम्बाखू कोई भी मादक पदार्थ का सेवन नही किया । जबकि उनकी संगत अच्छे व बुरे लोगों के बीच रही , उनका कहना है कि इन सभी कार्यो में भगवान की कृपा रही है जिस कारण दुर्जनों की संगत नही हो सकी । उन्होने अपने जीवन में हमेशा घृणा पाप से करते रहे पापी से नही, जल में पैदा होने बाली पुरैन के पत्ते पर पानी नही ठहता है, चंदन के बृक्षों में सर्प लिपटे रहते है लेकिन जहर का असर नही होता है । इसी कारण संतोष गंगेले को नगर नोगाॅव के साथ साथ टीकमकढ़ जिला में अनेक स्थानो पर सम्मान मिल चुका है लेकिन वह सम्मान प्राप्ता करने का नही सम्मान देने केलिए स्थान की खोज में लगे रहते है ।

सम्पूर्ण मध्य प्रदेश में अपने विचार भेजने का लिया संकल्प 

संतोष गंगेले आज के बर्तमान युग के युवाओं को जहां प्रे्ररणा के स्त्रोत बन कर सामने आ रहे है वही वह आम जनता के अधिकारों को जाग्रत करने एवं उनके अधिकारों को प्रदान कराने के लिए हजारो रू. व्यय करके अपना संदेश पत्र जन जन तक पहुॅचाते है , शहीद गणेश शकर विद्यार्थी प्रेस क्लब का पंजीयन कराकर उन्होने अपने बिचार मध्य प्रदेश सरकार के प्रत्येक मंत्री, प्रदेश के समस्त जन सम्पर्क विभाग, प्रदेश के समस्त जिला कलेक्टरों , जिला पंचायत अध्यक्षों एवं अधिकारियों को डाक से पत्र भेजकर अपनी मन की बात का संदेष भेज दिया हे । संतोष गंगेले के परिवार में आज सभी तरह की सुख -सुविधाये व खुशियाँ होने के बाद भी वह समाज सेवा का रास्ता नही छोड़ पा रहे है उनका कहना है कि जो भी यह जीवन है वह भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों को बचाने के लिए समर्पित कर दिया है । 

लेखक : कौशल किशोर रिछारिया

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विशेष आलेख महिलाओ पर : 
रंजना देवी ने सौतन नाम के कंलक को मिटाया.......

भारतीय संस्कृति के हिन्दू धर्म में माॅ, बहन, बहू, बेटी, बुआॅ, मौसी, चाची, मामी, भाभी, दादी, नानी, ननद, पुत्री, भतीजी, देवरानी,जेठानी,सहेली, के पवित्र रिष्ते है इन रिष्तों से ही परिवार के रिष्ते बने हैं , अन्यथा परिवार की परिभाषा में नही की जा सकती हैं , परिवार की परिभाषा में हर रिष्ते का अपना एक महत्व व कर्तव्य हैं, जिस प्रकार भाई का कर्तव्य अपनी बहन के प्रति कितना हैं, ऐसा ही बहन का कर्तव्य अपने भाई के प्रति कितना हैं , इसी प्रकार से भाई की बहन व पत्नि की नंद का अपना एक अलग रिष्ता हैं, अपनी संतान की बुआॅ जो कि हमारी बहन होती हैं , इसी प्रकार पत्नी की बहन बच्चों की मौसा होती हैं जबकि पत्नी के भाई की पत्नी बच्चों की मामी जी होती हैं । भाई केलिए बड़े भाई की पत्नी हमारी भाभी जी होती हैं, साले की पत्नी भी भाभी होती है लेकिन पत्नी के भाई की पत्नी से हंसी मजाक व दिल की बात की जा सकती है लेकिन भाई की पत्नी जो हमारी भाभी जी होती है वह माॅ के समान होती हैं उससे मर्यादा व संस्कृति के अनुसार ही सम्मान जनक बात की जाती हैं भाभी को भी चाहिये कि वह अपने देवर जी से मर्यादित एवं संयम पूर्ण बातावरण करें । इसी प्रकार अपने पिता के भाई की पत्नि को चाची जी या काकी जी कहा जाता हैं वह माॅ के समान ही होती हैं । हमारी बहन जो पत्नी की ननद होती हैं , देवरानी व जेठानी के रिष्ते पत्नी से जुड़े होते हैं , पति के बड़े भाई की पत्नी को पत्नी जेठानी के रूप में सम्बोधित करती हैं उसे बड़ी दीदी या जीजी के नाम से पुकारते हैं , पति के छोटे भाई की पत्नी को छोटी बहन या देवरानी के नाम से पुकारा जाता हैं ं , इसी प्रकार से भतीजी पुत्री के समान सम्मान पाने की हकदार होती हैं , भतीजी अपने भाई , भाभी जी या साले की की पुत्री को कहते हैं । अन्य मित्र की पुत्री को भी भतीजी ही कहा जाता हैं । यहीं सभी रिष्ते एक दूसरे को आपस में जोड़कर रखते हैं और जीवन भर केलिए यहीं रिष्ते होते हैं । लेकिन जब कोई व्यक्ति अपनी व्याहता पत्नि के रहने दूसरी महिला से ष्षादी करता है या उसे अपनी रखैल रखकर पत्नि का दर्जा दिया जाता है तो वह सौतन के नाम से संबोधित होती है । पहिली पत्नी के बच्चों को भी दूसरी माॅ केलिए सौतेली माॅ का सम्बोधन होता है । यह समाज में सबसे बड़ी समस्या हो जाती है कि सौतन एवं सौतेली माॅ का रिष्ते को कैसे पवित्र बनाया जावे यह कठिन होता है ? लेकिन समाज में धर्म है तो अधर्म का नाम होगा, सत्य है तो पाप होगा, दिन है तो रात होगी । इस प्रकार से प्रकृति अपने नियम से ही संचालित हो रही है और होती रहेगी ।

बुन्देलखण्ड की राजधानी कहलाने बाला एक स्थान नौगाॅव छावनी के नाम से जाना जाता है इस नौगाॅव छावनी को अपना एक इतिहास है, यह मध्य प्रदेष के छतरपुर जिला की तहसील नौगाॅव के नाम से स्थापित है । इसी तहसील के ग्राम बीरपुरा में चार बच्चों को छोड़कर श्रीमती प्रभादेवी का निधन हो गया था उन बच्चों की परवरिष करने की जिम्मेदारी को हिन्दु विवाह परिग्रहण संस्कारों के साथ झीझन के एक गरीब ब्राम्हण परिवार धर्मदास -लक्ष्मी देवी की लाड़ली बेटी रंजना देवी ने अपनी भारतीय संस्कृति एंव संस्कारों के प्रति अपना जीवन न्यौछावर करते हुये सौतन के इस कंलक को मिटाया है जिसकी जीवनी लिखना कठिन है लेकिन इस बेटी ने अपना जीवन समर्पित करते हुये एक उजड़े परिवार की चार संतानों को अपनी अल्प आयु में ही माॅ का स्थान देकर उनका पालन पोषण करती आ रही है , भगवान कामता नाथ जी चित्रकूट व भगवान श्री राम राजा सरकार की परम भक्ति के कारण रंजना देवी की गोदी भी एक संतान रत्नदीप जैसी उन्हे प्राप्त हुई है । रंजना देवी ने सोतन के कंलक को मिटाने में अपनी अहम भूमिका त्याग व परिश्रम के साथ की है । भारतीय संस्कृति एंव संस्कारों को बचाने के लिए भारतीय महिलाऐ ही अपने सत्य की परीक्षा पर खरी उतरती है ।

भारतीय संस्कृति में कन्या को देवी का रूप माना गया है और जिस दिन कन्या पैदा होती है उसी समय कहा जाता है कि घर में देवी जी का आगमन हो गया हैं , कन्याओं का महत्व हिन्दू धर्म के सभी गन्थों , बेद ,पुरान व षास़्त्रों में बताया गया हैं । जिस परिवार में कन्या नही होती है वह परिवार एक तरह से अष्वमेघ यज्ञ से अधूरा माना गया हैं ं । कन्या का विवाह व कन्यादान का महत्व उसी प्रकार से माना गया हैं जिस प्रकार कोई सौ गाॅव का मिलकर एक भण्डारा या पूर्ण यज्ञ कराया जावें , इसी प्रकार से कन्या विवाह माना जाता हैं ं । कन्या के पैदा होते ही यह कहा जाता है कि हमारे यहाॅ बरात आ गई । यह बात तीन स्थानों पर लागू हो जाती है । एक तो उस परिवार का मुखिया का सिर कन्या होते ही झुकता हैं, दूसरा उसका समाज में सम्मान होता हैं तीसरा उसे कोई यज्ञ की आवष्यकता नही होती है कि कन्यादान कन्या विवाह से बड़ा कोई पुण्य कार्य और कोई नही हैं । हमें आपको इस बात को सोचने केलिए मजबूर होना चािहये कि यदि हमारी माता जी किसी की पुत्री थीं , उन्ही के कारण आज हम इस संसार में हैं , जिस प्रकार हमारी माॅ ने हमें जन्म दिया है और प्रकृति के नियमों का पालन करते हुये हमारा पालन पोषण किया , हमारे सभी सुख दुःखों को अपने सिर पर रखा, दिन व रात का अनुभव नही किया ,हमारा अपनी माता जी के प्रति क्या सम्मान बनता है क्या हम या तुम या अन्य कोई अपनी माॅ के ़ऋण को अदा करने का साहस कर सकते हैं ? कभी नही यदि जो व्यक्ति यह कह दें कि मेरी माॅ ने मुझे कुछ नही दिया या मेरे साथ मेरे पिता व माता जी ने कुछ नही किया तो उससे बड़ा अपराधी इस संसार में कोई नही हो सकता हैं । माता पिता की गहराई , माता पिता ही समझते हैं , जिन्हे माॅ-बाप बनने का ईष्वर ने सौभाग्य दिया हो वही इस सुख-दुःख का अनुभव कर सकते हैं ं आपको स्मरण दिलाता हॅू कि महाराज मनू व सतरूपा ने हजारों बर्ष तपस्या की और जब प्रभु प्रषन्न हुये तो उन्होने महाराज से कहा कि आप जो बर माॅगें में दे सकता हॅू तब प्रभु से दोनो पति-पत्नि ने एक ही बर माॅगा था प्रभु हम तो आपके समान पुत्र चाहते हैं ।

तब प्रभु ने कहा कि मुझ समान तो में हॅू , लेकिन भक्त के बष में प्रभु ने कहा था कि में तुम्हें यह बर देता हॅू और वह भगवान श्री राम के रूप में तुम्हारा पुत्र रहॅगा, अयोध्या के ं महाराज दषरथ जो पूर्व में महाराज मनू व भगवान श्री राम की माॅ जो कौषिलया थी वही सतरूपा कौषिल्या हुई । इसलिए माता व पिता का रिष्ता ईष्वरी रिष्ता के समान है, यह रिष्ता गंगा जी से भी अधिक पवित्र रिष्तों को हमें कभी नही भूलना चाहिये जो व्यक्ति अपने माॅ-बाप को भूल सकते हैं वह संसार में किसी के हितकारी नही हो सकते हैं न ही वह संसार में सुख प्राप्त कर सकते हैं । यह बात प्रमाणित हे और जो ऐसा करते हैं वह जगह जगह परेषान व दुःखी है और जन्म जन्म तक दुःखित रहते हैं । हम जो भी बैज्ञानिक खोज करते है या हो रही है और होगी वह भारतीय संस्कृति के इतिहास से ही हो रही हैं , वह ईष्वर कृपा हैं और बिना ईष्वर के कोई खोज नही हो सकती हैं । तुलसीदास जी ने लिखा है कि हरि अनंत है और उनकी कथा अनंत हैं । उनका रहस्य विरला ही कोई समझ पाता हैं , उनके इस रहस्य में संसार के प्राणी उलझे हैं । जो प्रभु की लीला का रहस्य जान जाते है वह संसार की भौतिक बस्तुओं से दूर हो जाते हैं उसकी इच्छा प्रभु ध्यान व भक्ति में लगी रहती है तथा वह अपने कर्तव्यो का पालन करते हुये परिवारिक वं सामाजिक बंधनों में बंधकर देष सेवा में लग जाता है । 

सौतन कौन हैं ? 
भारतीय संस्कृति में अनेक परिभाषायें परिवार में आती है लेकिन सौतन एक ऐसा रिष्ता है जो हर कोई और केलिए जहर की तरह है बैसे जहर पीकर या खाकर तो महिलायें तुरन्त प्राण त्याग कर सकती है लेकिन सौतन का जहर पूरे जीवन जीते नषा करता हैं और यह महिलाओं केलिए खाना-पीना तक भुला देता हैं । आखिर यह सौतन का नाम क्यों इतना खतरनाक हैं ? हम आप इस बात का अहसास नही कर पाते है लेकिन सौतन के बारे में जानना भी आवष्यक है ।

साधारण बोल चाल की भाषा में सौतन ष्षव्द का एक पत्नी के रहते पति किसी दूसरी महिला से प्रेम करता है या किसी महिला के संतान न हो तो वह दूसरी ष्षादी करें या कोई प्रेम करने बाली महिला पति के गले पड़ जावें तो उसे अपना ही सौतन कहा जाता हैं ं । सौतन का महत्व पति केलिए सुखदायी हो सकता हैं लेकिन पत्नि केलिए सबसे बड़ा जहर है । महिलायें तो यहाॅ तक कहती है कि वह पति व्दारा किसी महिला की सुंदरता की तारीफ करने से उनके दिल में गहरी चोटे आती है, किसी भी दूसरी महिला की फोटो तक देखाना उचित नही समझती है इसलिए मिट्टी या चून (आटा) से बनी सौतन को भी नही देख सकती हैं । इसलिए कोई भी प्र्रेमिका या महिला से आपका कितना ही स्नेह व प्यार हो यदि आप अपने बीच जहर या जीवन को बर्वाद करना चाहते है तो किसी अमुक महिला के बारे में अपनी प्रेमिका या पत्नि को यह बात बता दें कि हमारा प्रेम तो अब अमुक महिला से हो गया है या हम करने जा रहे हैं तो आपका सालों पुराना प्यार व स्नेह एक पल में रेत के पहाड़ की तरह बिखर जायेगा ।

इस युग में तो सौतन या दूसरी महिलायें हर किसी के पीछे पड़ सकती है इस भौतिकवादी युग में आम आदमी की आवष्यकता बहुत बढ़ गई हैं और आये दिन समाचार पत्रों एवं घटनाओं में यहीं बात सामने आती है कि अमुक महिला के चलते हत्या, डकैती, मारपीट व झगड़ा हो रहे है या अमुक परिवार में नव विवाहिता ने तेल डाल कर या जहर खाकर आत्म हत्या कर ली हैं । इसका कारण आज के युग में कथित महिलायें किसी परिवार को हंसता खेंलता देंख नही पा रही हैं , अपनी सुन्दरता ,मधुरता का जाल तथा रमणीय भाषा, का उपयोग कर पुरूषों का अपनी ओर आकर्षित करती है। पुरूष कामुक बिषयविकार व पापी हो कर अपने परिवार व बच्चों की चिन्ता का त्याग कर परनारी के चक्कर में पड़ जाता है । जिससे वह अपना जीवन अनेक तरह से बर्वाद करता हैं , तुलसीदार जी लिखा है कि दूसरी स्त्री से प्रेम करने बाले तीन तरह से अपना जीवन को नष्ट करते हैं , परनारी पैनी छुरी तीन ठोर से खाय-धन छीन यौवन हरे मरें नरक ले जायें ।। यानी दूसरी स्त्री से जब कोई आदमी पागलपन में प्रेम या प्यार करता है तो उसे धन की क्षति होती है वह दूसरी स्त्री के कहने पर जो चाहे सामग्री खरीददारी करने को तैयार रहता है और अपनी बनी हुई संपत्ति मिटा देता हैं , सौतन के रूप में ष्षराब भी आती है जो परिवारिक व्यक्ति यदि दूसरी पत्नि से प्रेम नही करता यदि ष्षराब पीता है तो वह भी ष्षौतन का ही काम करती हैं । और परिवार बिखर जाते हैं उस पर भी वही तीन बातें लागू हो जाती हैं ं धन जाता है और स्वास्थ्य नष्ट होता है , और ष्षराव के नषें में नाली-नरदा , अच्छी बुरी जगह नही देंखता वह गिर जाता है पड़ा रहता हैं । इसी प्रकार दूसरी औरत व्यक्ति से धन छीनती है उसकी जवानी को पूरी तरह समाप्त करती है , जब दूसरी स्त्री संग रंगेलियाॅ मनाओं तो समाज में प्रतिष्ठा नष्ट हो जायेगी और सामाजिक बहिष्कार एवं विवाहिता पत्नि व बच्चों की दुःखित आवाज के बाद पाप के अंधकार से तुम्हारी बुध्दि व विवेक समाप्त हो जायेगा जो सीधा नरक का व्दार खोल देता हैं यानी बुरी दुर्गति हो जाती हैं । ं

बर्तमान इस भौतिकवादी युग जिसे आम आदमी कलयुग के नाम से संवोधित करता है तथा आये दिन अन्याय अत्याचार दहेज प्रताड़ता के कारण महिलाओं की हत्यायें हो रही है उन्हे जिन्दा जलाया जा रहा है महिलाओ को आत्म हत्या करने केलिए मजबूर किया जा रहा है , ऐसे समय में एक भारतीय नारी ने भारतीय महिलाओं पर लगने बाले सोतन के नाम के कलंक को मिटा दिया है । आज हजारों लोगों के मुॅह पर इस महिला व परिवार का नाम एक सम्मान के साथ साथ एक आदषर््ा नारी के रूप पहचान बना कर सौतने के रूप मे जीवन निर्वाहन करने बाली महिलाओं के लिए नजीर बनकर समाज में जीवित हैं । यदि भारतीय महिलाओ में सत्य व चरित्र न होता तो आज भारत के अंदर धर्म न रहता है । यदि आज भी महिलाये चाहे तो अपने सत्य व चरित्र के कारण भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों का जो विनाष हो रहा है उसे बचाया जा सकता है , अन्यथा भारत की नारी विदेषी महिला हो जायेगी और उसके चरित्र की कीमत बाजार के चैराहो पर लगाई जा सकती है । इस कलंक से बचने केलिए महिलाओं को प्रेरणा देने बाली इस महिला के बारे में पूरा पता लगाना भी आवष्यक है । 

सौतन का दायित्य

यदि बास्तविक कोई परिवार किसी हादसे का षिकार है या उसका बंष नही आगे बढ़ रहा है और विवाहित स्त्री के संतान नही हो रही है और विवाहित पत्नी की भी इच्छा है तो दूसरी ष्षादी या महिला का अपनाना कोई अपराध नही है । या किसी परिवार में कोई महिला की मृत्यु हो गई हैं और बच्चें है उनका पालन पोषण नही हो पा रहा हैं तो दूसरी ष्षादी करना किसी महिला को पत्नी स्वीकार करना भी समाज में अपराध नही हैं । बैसे ऐसे समय में कोई भी समाज की बिधवा या तलाक षुदा महिला को सजातिय रूप में अपनाना समाज के हित में होगा और महिला को भी दूसरा जीवनदान मिलता है। । ऐसी दूसरी आने बाली महिलाओं का कर्तव्य या दायित्व बनता है कि वह भी महिला है और उसकी भी वहीं इच्छायें है जो पहिलें से पत्नी है या उसकी मदद से वह घर में हैं वह उसकी ही तो बहन हैं । 

सौतन को ऐसे में उसे अपनी बहन स्वीकार कर लेना चाहिये हैं और उससे मिलकर ही परिवार का संचालन करना चाहिये । आज समाज में अनेक ऐसी महिलायें समाज केलिए उदाहरण है और उनका परिवार बहुत ही अच्छा चल रहा है । लेकिन सौतन का नाम ही बदनाम है वह कितना ही अच्छा करें लोग उसे बुरी नजर से ही देंखत हैं और कोई नही महिलाओं में ही आपस में यहीं बात कहीं जाती हे कि अमुक महिला के कारण ऐसा हुआ , चाहे किसी का भी अपराध हो लेकिन कहां कुछ ही जायेगा । आज आवष्यकता है कि महिलाओं एवं पुरूष को एक अच्छी सोच एवं संयम के साथ जीवन जीने की कला सीखना चाहिये । आज के इस भौतिकवादी युग में महिलाओं एवं पुरूष को समानता का अधिकार है अब औरते किसी नर की सेविका के रूप में जीवन जीना नही चाहती हैं वह भी अपने अधिकार समझती है और उनकी इच्छायें हैं । इसलिए समान रूप से सहयोग करना चाहिये । ऐसा नही कि औरतें के दिल व दिमाग को प्रकृति ने बदल दिया है आज भी औरतें पुरूष के प्यार के आगे वह तन,मन,धन समर्पित नही कर सकती हैं , उनके लिए पति ही ईष्वर आज है और जब तक सृष्टि रहेगी औरत पति को अपना सब कुछ मानती रहेगीं । लेकिन पति को चाहिये कि वह हमेषा अनुषासन एवं गरमदल की बातें न करें उसे भी अपनी पत्नी के मन की बात को टटोलना होगा । यदि व्यक्ति अपनी पत्नी को बिष्वास में लेकर कोई भी गलत से गलत कार्य कर देता है तो उसे वह माफ करती हैं लेकिन जब झूठ बोलकर कोई कार्य किया जावें या उसे गुमराह किया जाता है तो वह परिवार टूटने लगते है और मुकदमवाजी एवं तलाक होने लगते हैं । सौतन को पहली पत्नी के बच्चों के साथ अन्याय व अत्याचार नही करना चाहिये अन्यथा इसके परिणाम बहुत घातक व कष्टदायी होते हैं । जीवन नरक के समान हो सकता है । पहली पत्नी के बच्चों को ममता व दुलार तो नही दिया जा सकता हैं लेकिन उन्हे स्नेह व प्यार दिया जा सकता हैं इसलिए जो प्यार दूसरी माॅ दे सकती हैं उसे देने का पूरा प्रयास करना चाहिये ।

सौतन का मुख्य दायित्य हम यह कह सकते है कि जब भी किसी परिवार में कोई संकट हो या कोई दुघर्टना हो तो वह दूसरी ष्षादी करें लेकिन दूसरी ष्षादी के बाद पहिली पत्नी यदि जीवित है तो प्रथम सम्मान जीवित पत्नी का है और जो भी घर में कार्य किय जावें दूसरी पत्नी व पति को उनकी बिना सलाह से नही करना चाहिये और मिल कर किसी भी बात का समाधान किया जा सकता हैं । जब इस प्रकार का बातावरण होगा तो परिवार में विवाद नही होगें , जब भी घर में कोई बस्त्र या जेबरात लायें जावें तो समान रूप से लियें जावें , जब भी कहीं जावें साथ साथ लेकर जावें । इस प्रकार से समझदारी से कार्य करने पर परिवार में समंजय बना रहेगा और अषाॅति व तनाव नही होगा । यदि किसी ऐसे परिवार में किसी दूसरी महिला का प्रवेष हो रहा है कि पहिली पत्नी का निधन हो गया है और उसका एक या अनेक बच्चें है तो महिला का सर्वप्रथम फर्ज है होता है कि वह जैसे ही अपनी ससुराल आवें सबसे पहिले पहिली पत्नी के जो बच्चें है उन्हे गोंदी में उठाकर उन्हे माॅ का दुलार दें, क्योंकि बच्चों के सिर पर माॅ का साया नही है और जो दूसरी माॅ उसके स्थान पर आई है उसका पूरा कर्तव्य बच्चों का पालन पोषण व उन्हे संस्कारवान बनाना हैं । वह सोतेली माॅ जरूर लोगों के लिए कहीं जा सकती हे लेकिन यदि उसका कर्तव्य व दायित्य बच्चों के प्रति हैं तो वह पहिली माॅ से अधिक सम्मान प्राप्त कर सकती हैं और घर-परिवार समाज में सम्मान प्राप्त करने की हकदार हैं । 

सौतन समाज की उनकी महिलाओं के व्दारा दिया गया नाम है जो महिलायें दुराचार व दुष्टा, महिलाओं के आर्दर्षो को जो नारियाॅ मर्यादाओं को समाप्त करती हैं । ऐसा नही कि बिपत्ति या संकट मानव जीवन में न आती है, हर व्यक्ति पर संकट आते हैं लेकिन निराकरण करने का उपाय भी प्रकृति के व्दारा ईष्वर ही करता हैं । हमें अपने ज्ञान,बुध्दि, विवेक, अनुभव के व्दारा तथा बुर्जुगों के बताये रास्ता को समझ कर परिवार का संचालन करना चाहिये । समाज में दूसरी माॅ व दूसरी पत्नी के ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनकी हम कल्पना नही कर सकते हैं लेकिन अधिकाॅष दूसरी पत्नी व दूसरी माॅ का व्यवहार उस समय परिवर्तन हो जाता है जब उस महिला को पति कामुक होकर बच्चों का ध्यान नही देता और पत्नी के इंषारे पर नाचने लगता है तो समाज ऐसे महिला व पुरूष को घृणा की दृष्टि से देखता है और लोगों को उदाहरण देने लगता है कि दूसरी ष्षादी व दूसरी माॅ में कितना अन्तर हो जाता हैं । इसलिए यदि समाज में दूसरी माॅ या जो पत्नी हो उसे समाज व परिवार की मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिये और अपने आत्मबल व संयम के व्दारा परिवार का संचालन करना चाहिये क्योंकि भारत देष ही एक ऐसा देष है जहां नारी की पूजा होती है , नारी की परिभाषा में भारतीय हर नारी आती है ।

उसकी कोई जाति नही होती हैं वह तो नारी है तो नारी हैं । चाहे किसी भी धर्म या जाति में पैदा हो । नारी का कर्तव्य क्या है यह उसे समझाना नही होता हैं वह अपने संस्कारों एवं कर्तव्यों से परिचित होती हैं । विवाद व झंझट वहां पैदा हो जाते हैं जब कोई माॅ अपनी कोख से संतान पैदा की गई हो और दूसरी माॅ की कोख से पैदा की गई संतान के साथ पक्षपात करती है या कटू बचन बोलती है तो वहां दूसरी माॅ व पत्नी का अहसास होने लगता हैं वहीं सौतन का नाम आता है और यहीं से नारी के सम्मान पर चैंट पहुॅचती हैं । हर माता को चाहिये कि वह अपनी सन्तान की तरह हर सन्तान के साथ अच्छा वर्ताव करें , उसे सुख न दे सकें तो कम से कम दुःख नही देना चाहिये साथ ही किसी की आत्मा को कष्ट नही देना चाहियें जब यह बिचार हर औरत व माता के हृदय में स्थान बना लेगा तो सौतन का नाम न तो बदनाम होगा न किसी संतान को यह पता हो सकेगा कि मेरी माॅ व दूसरी माॅ में कोई अंतर हैं इसलिए सौतन के नाम को कंलकित करने बाली महिलाओं को हर बात का ध्यान रखना चाहिये । इस संसार में माॅ की ममता की तुलना आज तक किसी से नही की जा सकी, लेकिन प्रभु कृपा से इस भारत भूमि में हजारो ऐसी भी महिलाये है जिन्होने दूसरी महिला या पत्नि की संतान को अपना पूरा जीवन न्यौछावर किया भले ही उन्हे हजारो हजारेा कठिनाईया परेषानी या दुःख सहन करना पड़े हो लेकिन अपने नारी धर्म का सम्मान व गौरव के कम नही होने दिया , आज भी भारत में महिलाओं को देवी, लक्ष्मी, सरस्वती,, सती, सावित्री, सीता के ही स्वरूप में पूज्यनीय माना जाता है लेकिन इसके लिए महिलाओं को ही अपना त्याग, तपस्या समर्पण, सरलता, सहजता, षालीनता, संयम, कर्मयोगी के साथ साथ लोक लाज मर्यादाओं को पूरा ध्यान रखने बाली भारतीय महिलाओं को इन भारतीय संस्कृति एंव संस्कारों से गुजरना होता है तब वह इस सम्मान को प्राप्त कर पाती है । अन्यथा जो महिलायें अपना चरित्र का पतन करती है, भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों को त्याग कर अपने यौवन, रूप के कारण वैष्याओं जैसे घृणित कार्य करती है उनका बर्तमान व भविष्य तो खराव होता ही है ,धर्म व ष्षास्त्रों के अनुसार उन्हे अनेक जन्मों तक दुःख व कष्ट उठाना होते है । इसलिए महिलाओं को ही उच्च स्थान है उसको पाने केलिए प्रत्येक महिलाओं को प्रयासरत रहना चाहिये ।

गीता पटेरिया ने दिया सम्मान 
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छतरपुर जिला की बरिष्ठ समाजसेवी ,भारतीय जनता पार्टी की नेता श्रीमती गीता पटेरिया जी को इस महिला श्रीमती रंजना देवी के बारे में जानकारी मिलने पर वह उनके निवास कुलदीप हाउस नौगाव पहुंची , साथ ही रंजना देवी को शाल श्रीफल से सम्मान किया। नातिन आल्या दिक्षित को पांच सो का नोट देकर प्रत्साहित किया। 
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लेखक :  बलराम साहू विदिशा 

गणेश शंकर समाचार सेवा

आजादी की पत्रकारिता को ध्यान में रख कर ही  हमने बर्ष 1981 दिसम्बर 11  से दैनिक राष्ट्र भ्रमण समाचार पत्र से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की है.


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