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भक्ति की खोज: श्रीरामकिंकर प्रवचन माला-पहला दिन
रामराज्य उपदेश से नहीं चरित्र निर्माण से होगा: मैथिलीशरण भाई जी
लखन लाल असाटी
छतरपुर। भगवान ने रामराज्य की स्थापना मात्र उपदेश देकर नहीं की। प्रभु राम ने लोगों में परिवर्तन अपने चरित्र के द्वारा किया। भक्ति की खोज संसार में नहीं, हृदय में करने की जरूरत है। कल्याण मंडपम् में भक्ति की खोज पर मानस की व्याख्या करते हुए मैथिलीशरण भाई जी ने कहा कि सच्चा सत्संग आपको सांसारिक मायाजाल से छुटकारा दिलाता है। प्रभु राम ने हनुमान, विभीषण, सुग्रीव, कैकई आदि को कोई उपदेश नहीं दिया अपितु जिसमें जो गुण था उसका उपयोग किया।
संत सांसारिक वस्तुएं परोसने नहीं
मैथिलीशरण भाई जी ने बड़े ही कठोर शब्दों में कहा कि संतों का कार्य भक्तों को भगवान से जोडऩा है। पर यदि संत आपको सांसारिक वस्तुएं परोसने लगे तो फिर संत में और संसार में क्या अंतर रह जाता है। श्रीरामकिंकर जी के अभिन्न मित्र उडिय़ा बाबा अपने भक्तों से स्पष्ट शब्दों में कहा करते थे यदि आप संसार पाने की कामना से मेरे पास आये हों, तो मत आइए। भगवान के चरणों में प्रेम पाने की इच्छा हो तो आपका स्वागत है। सत्संग तो सांसारिक काई छुटाने का उत्तम साधन है।
भाई जी ने कहा कि भगवान को भक्त की निष्ठा देखना आती है। याद रखिए, कहीं आपकी निष्ठा बिकाऊ तो नहीं है। जो सांसारिक वस्तुएं पाने के लिए बदलती रहती हो। संसार से विरति और प्रभु से रति ही तो राम राज्य है।
आलोचना बुरी लगे तो जरूर गड़बड़ है
भाई जी ने कहा कि व्यक्ति को जीवन में सुनने की आदत डालनी चाहिए। आलोचना में भी सत्य छिपा होता है। कोई व्यक्ति आपकी आलोचना करे और यदि आलोचना सुनकर आपको बुरा लगे तो समझ लीजिए कि उसमें कुछ न कुछ सत्य जरूर है। आलोचना सुनकर आपके चेहरे की हवाइयां उडऩे लगे तो समझ लीजिए यही आपका रोग है। संत मीठी और कड़वी दोनों दवा देते हैं।
भाई जी ने भक्ति स्वरूपा माता सीता जी की खोज के प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संत हृदय हनुमान जी ने अपने राजा सुग्रीव को कड़वी दवा का ही सेवन कराया। पर्वत पर जब प्रभु राम सुग्रीव पर अपने क्रोध को लक्ष्मन जी को सुना रहे थे तभी हनुमान जी को प्रभु की प्रेरणा हुई और उन्होंने तुरंत महाराजा सुग्रीव को बहुत प्रकार से समझाया। 
निकट जाईं चरनन्हि सिरू नावा।
चारहु बिधि तेहि कहि समुझावा।।
हनुमान जी ने कहा कि प्रभु राम ने तुम्हारे दुख के निवारण हेतु बाली का बध कर दिया, फिर बाली का समस्त राज्य तुम्हें सौंप दिया। हनुमान जी ने कहा कि सुग्रीव जी याद रखिए एक तो प्रभु राम ने तुम्हारे बेटे के स्थान पर बाली के पुत्र अंगद को युवराज बनाया है और फिर जिस तीर से उन्होंने बाली का वध किया था वह तीर आज भी उनके तरकश में सुरक्षित है। इस प्रकार हनुमान जी ने सुग्रीव को साम, दान, दण्ड और भेद चारों ही नीतियों से समझाया।
भाई जी ने कहा कि सच्चे संत का यही दायित्व है कि वह भगवान को भूलकर संसार में भटक गए भक्त को भय दिखाकर ही सही, पर भगवान से जोडऩे का काम करें। उन्होंने पं. रामकिंकर जी महाराज के कथनों का उदाहरण देकर कहा कि महाराज श्री कहा करते थे कि अगर मैं भक्तों की खोज में निकलूंगा और उन्हें ही कथा सुनाना चाहूंगा तो यह कथा ही बंद हो जाएगी। प्रभु राम ने भी यही किया वह सुग्रीव की मन:स्थिति (राज्य भोगने की कामना) जानते थे इसलिए उन्हें अपने साथ प्रवर्षण पर्वत पर रखने की जगह चार्तुमास के दौरान किष्कंधा भेजना उचित समझा।
अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदयं धरेहु मम काजू।।
पर 4 की जगह 5 माह बीत जाने पर भी जब सुग्रीव को प्रभु की सुध नहीं आई तो भगवान राम ने लक्ष्मण को अपना क्रोध जतलाते हुए कहा कि
सुग्रीवहुं सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी।।
जोहि सायक मारा मैं बाली। तेहि सर हतौं मूढ़ कहं काली।
भगवान का भय मिटे तो समझिए दुर्भाग्य शुरू हो गया
भाई जी ने कहा कि यह अद्भुत प्रसंग है। क्या प्रभु को भी क्रोध आता है। शंकर जी ने पार्वती जी से कहा, नहीं प्रभु को क्रोध नहीं आता, वह तो क्रोध की लीला कर रहे हैं। संसार को प्रभु की इस लीला से सबक सीखना चाहिए। प्रभु ने क्रोध का तुरंत क्रियान्वयन नहीं किया, उसे कल के लिए टाल दिया कि कल में सुग्रीव को मारूंगा। व्यक्ति को जीवन में जब भी क्रोध आए तो उसका क्रियान्वयन कल पर टाल देना चाहिए। क्योंकि कल मन: स्थिति बदल जाएगी। लक्ष्मण जी ने पूंछा भी कि महाराज कल क्यों? आज ही सुग्रीव का बध क्यों नहीं कर देते तो प्रभु राम ने अनुज को समझाया।
तब अनुजहि समुझावा रघुपति करूना सींव।
भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।।
सुग्रीव को लक्ष्मण जी के माध्यम से जो भय प्रभु राम दिखाना चाह रहे हैं। वह भय हनुमान जी सुग्रीव को पहले ही दिखा देते हैं। 
सुनि सुग्रीव परम भय माना।
विषयं मोर हरि लीन्हेउ ग्याना।।
भाई जी ने कहा कि गुरू, संत और भगवान का डर जीवन में होना चाहिए, जिस दिन उनका डर लगना बंद हो जाए तो समझ लीजिए कि आपका दुर्भाग्य शुरू हो गया है। प्रभु का क्रोध का उद्देश्य प्राणी का कल्याण ही है। भगवान जब भी क्रोध करते हैं तब-तब उसमें कल्याण छिपा रहता है। इसलिए गुरू और संत जब भी समझाएं तो आपको उसे समझना चाहिए। 
मानस इतिहास और दर्पण दोनों हैं
भाई जी ने कहा कि श्री रामचरित मानस इतिहास की दृष्टि से तो प्रेरणास्पद है ही। वर्तमान के संदर्भ में भी वह दर्पण की तरह है। व्यक्ति जब प्राण जाने की स्थिति में आता है तब उसे अपने सभी कर्म याद आ जाते हैं इसलिए समय रहते अपने कर्म सुधारते रहिए। जब कर्म पर आपकी सत्ता समाप्त हो जाती है और आप कोई कर्म करने की स्थिति में नहीं होते हैं तब पछतावे के अलावा आपकेे पास कुछ नहीं होता है। 
भाईजी ने सीता जी की खोज में प्रभु राम द्वारा हनुमान जी को भेजे जाने के प्रसंग की मनोहारी व्याख्या करते हुए कहा कि बाल ब्रह्मचारी और अपने बल को सदैव भूले रहने वाले हनुमान जी से कहा कि वह सीता जी को उनके बल और विरह की कथा सुनाएं। यह अत्यंत अद्भुत और विचित्र कथा है। 
बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु।
भाई जी ने कहा कि प्रभु श्रीराम संकेत कर रहे हैं कि जिसे अपने बल का भान नहीं होगा अर्थात अभिमान नहीं होगा वही प्रभु की कृपा के बल को समझ पाएगा। जिसे अपना बल याद रहता है उसे भगवान का बल अर्थात उनकी भक्ति कभी याद नहीं आती। हनुमान जी जानते थे कि प्रभु रामचन्द्र और सीता जी जल और जल की लहरों के समान अभिन्न हैं। 
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
बंदउं सीता राम पद जिन्हहिं परम प्रिय खिन्न।।
 
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भक्ति की खोज: श्रीरामकिंकर प्रवचन माला- तृतीय दिवस
भगवान नर लीला कर आदर्श की स्थापना करते हैं: मैथिलीशरण भाई जी
लखनलाल असाटी
छतरपुर। भगवान जब अवतार लेते हैं तो नर लीला कर आदर्श की स्थापना करते हैं और ईश्वर के रूप में वह हमें शक्ति प्रदान करते हैं। प्रभु राम का सीता जी के प्रति संपूर्ण विश्वास था पर लोकराजन की दृष्टि से उन्होंने कुछेक व्यक्तियों के अंगुली उठाने पर उनका परित्याग कर दिया। परित्याग के पूर्व उन्होंने सीताजी से चर्चा की थी कि जब मेरे राजा रहते लोग तुम्हें संदेह की दृष्टि से देखते हैं तो हमारे बैकुंठधाम चले जाने के बाद पता नहीं क्या-क्या कहेंगे।
कल्याण मण्डपम् में तीसरे दिन बुधवार को रामकथा का विस्तार करते हुए मैथिलीशरण भाई जी ने कहा कि प्रभु राम लोकराजन के प्रति इतने तत्पर और सतर्क थे कि एक मात्र कैकई के कहने पर वन को चले गए। जबकि महाराजा दशरथ सहित पूरी प्रजा उनके वनगमन के खिलाफ थी। ऐसे में कई व्यक्तियों द्वारा सीता जी की आलोचना करने के पश्चात प्रभु राम द्वारा सीताजी के परित्याग की घटना पर बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए। प्रभु श्रीराम ने सीता जी को भाई लक्ष्मण के द्वारा बाल्मीकि आश्रम भेज दिया और स्वयं अयोध्या में मुनियों की तरह अपना जीवन बिताया। प्रभु राम का यह सभी के लिए स्पष्ट संदेश है कि यदि आपके कार्य की आलोचना हो रही है तो फिर उसमें संशोधन कर लेना ही चाहिए। यदि आपने अपनी आलोचनाओं पर ध्यान नहीं दिया तो समाज में आप तिरस्कार और हास्य के पात्र बने बिना नहीं रहेंगे।
संसार में गुण और दोष दोनों जरूरी
भाई जी ने कहा कि भगवान ने गुण और दोष दोनों को मिलाकर सृष्टि का निर्माण किया है। शुद्ध सोने से आभूषण नहीं बनते, उसमें मिलावट करना होती है। विरोधी स्वभाव के तत्व मिलकर नव निर्माण करते हैं। जैसे आटा और पानी मिलकर रोटी का निर्माण करते हैं।
जड़ चेतन गुन दोष मय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि विकार।।
संत हंस की तरह होते हैं जो गुण रूप दूध तो ग्रहण करते हैं पर दोष रूपी जल छोड़ देते हैं। भगवान के राम राज्य की अवधारण का भी मूल तत्व यही हैं। उन्होंने जिस व्यक्ति में जो योग्यता देखी उसको स्वीकार कर लिया। समाज का स्वभाव तो भगवान ने बनाया है, उसे आप नहीं बदल सकते। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी विचारधारा है इसलिए ज्ञानी व्यक्ति वही है जो गुण और दोष का सही मात्रा में उपयोग करना जानता हो।
अहंकारी व्यक्ति जुगनू की तरह 
भाई जी ने कहा कि अहंकारी व्यक्ति जुगनू की तरह होता है। जैसे जुगनू को सूर्य, चांद या तारों की उपस्थिति उसे कतई पसंद नहीं होती है क्योंकि इनके रहते उसका कोई अस्तित्व नहीं होता है। वह तो रात का घना अंधकार चाहता है जिसमें चमक कर वह अपना अस्तित्व बता सके।
निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा।।
इसी तरह संसार में भी दंभी व्यक्ति अपने से बड़ों को साथ लेकर नहीं चलते। वे तो सिर्फ उनके साथ चलना पसंद करते थे जिनसे वे चमकते और चमकाते रहें। पर वह भूल जाते हैं कि सबके प्रकाशक  तो प्रभु राम हैं।
सब करि परम प्रकाशक जोई।
राम अनादि अवधि पति सोई।।
मैथिलीशरण भाई जी ने कहा कि व्यक्ति को अपने अहंकार से बाहर निकलना चाहिए। भगवान राम के साथ जो लोग थे उन पर मर्यादा का कोई बंधन नहीं था अपितु मर्यादा पुरूषोत्तम राम के साथ रहकर सभी का स्वरूप ही मर्यादा का हो गया था।
प्रभु तरू तर कपि डार पर ते किए आपु समान।
तुलसी कहूं न राम से साहिब सील निधान।।
तुलसीदास जी ने लिखा है कि राम जैसे शील निधान स्वामी कहीं भी नहीं है। किसी ने प्रभु राम से पूंछा कि बंदर पेड़ की शाखाओं पर पूंछ लटकाए बैठे हैं और आप पेड़ के नीचे, यह कैसी मर्यादा है। भाई जी ने इस प्रसंग की भावपूर्ण व्याख्या करते हुए बताया कि बंदर की ममता उसकी पूंछ में होती है।
कपि के ममता पूंछ पर। और सभी बंदर अपनी ममता रूपी पूंछ प्रभु के चारों ओर लटकाए हुए है इसका सांकेतिक अर्थ यह हुआ कि बंदरों ने अपनी संपूर्ण ममता प्रभु को समर्पित कर रखी है। प्रभु राम कहते हैं कि इनकी ममता के कारण ही तो मैं निश्चिंत रहता हूं। गुरू वशिष्ठ जी से प्रभु राम ने बंदरों का परिचय यहीं तो कराया।
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहं बेरे।।
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।।
भाई जी ने भक्ति की खोज पर रामकथा सुनाते हुए कहा कि प्रभु की माया सदैव भक्तों की परीक्षा लेती है राक्षसों की नहीं। जब भी भक्तों के जीवन में पतन दिखाई देता है भगवान माया के द्वारा भक्त का कल्याण करते हैं। भक्त का सांसारिक पतन दिखाई तो देता है पर वास्तव में भगवान उसे संभाले रहते हैं और भक्त की कृपा प्राप्ति या मोक्ष के साधन में कोई बाधा नहीं आती। भगवान जिसका हाथ एक बार पकड़ लेते हैं उसका हाथ छोडऩा वह नहीं जानते हैं।
नारद मोह तथा सती मोह के प्रसंगों के माध्यम से भाई जी ने समझाने का प्रयास किया कि भगवान की माया भक्तों के जीवन में आई विकृति को सुधारने के लिए होती है। सबका कल्याण करने वाले सदाशिव ने जब अपने हृदय में काम का विक्षेप देखा तो तीसरा नेत्र खोल दिया। शिव का यह तीसरा नेत्र भगवान के प्रति विश्वास का प्रतीक है। तीसरा नेत्र यह जांचने के लिए है कि यह संसार है या भगवान हैं। परिणामत: राम की माया होगी तो बच जाएगा पर काम की माया होगी तो जल जाएगा।
तब सिवँ तीसर नयन उघारा।
चितवत कामु भयऊ जरि छारा।।
अंतत: काम जल कर राख हो गया। पर जब नारद जी ने कामदेव को जीत  लिया तो उनमें अहंकार आ गया और वह शंकर जी को बताने पहुंच गए कि देखो आपको तो क्रोध आ गया था मुझे तो काम और क्रोध दोनों ही नहीं ब्यापे। शंकर जी समझ गए उन्होंने नारद जी को समझाया भगवान श्री हरि को यह प्रसंग पूछने पर भी नहीं सुनाना।
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुं प्रसंग दुराएहु तबहूं।
पर नारद जी नहीं माने और भगवान नारायण को अभिमान सहित बता ही दिया।
काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम वरजि सिवँ राखे।।
भगवान समझ गए और कहा कि सेवक का हित करना ही उनका प्रण है। करूरनानिधि मन दीख बिचारी। उरु अंकुरेउ गरब तरु भारी।।
बेगि सो मैं डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी।।
मैथिलीशरण भाई जी ने कहा कि प्रशंसा पाने के लिए काम करना अलग बात है और आप अच्छा काम करें और लोग उसकी प्रशंसा करें यह अलग बात है। पर व्यक्ति की जब प्रशंसा होती है तो उसकी पहली वृत्ति यही होती है कि उससे भी अधिक प्रशंसा किसी और की तो नहीं हो रही है। शायद यही अहसास कराने नारद जी शिवजी के पास पहुंचे थे।
दक्ष प्रजापति की कथा सुनाते हुए भाई जी ने कहा कि जब ब्रह्मा की सभा में सब देवता एकत्रित हो गए और दक्ष प्रजापति नहीं आये तो शंकर जी भगवान नारायण के ध्यान में मग्र हो गए। दक्ष के आने पर सभी देवताओं ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया। पर अभिमानी व्यक्ति जो सम्मान मिलता है उससे संतुष्ट नहीं होता। उसी तरह दक्ष भी आंखें फाड़-फाड़ कर देखने लगे कि मेरे आने पर कौन खड़ा नहीं हुआ है। जब उन्होंने अपने दामाद शंकर को बैठे देखा तो उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई। भाई जी ने कहा कि दुख कोई देता नहीं है। व्यक्ति दुख खुद खरीदते हैं, दक्ष प्रजापति की तरह। दक्ष ने शंकर जी से कहा कि तुम नग्र रहते हो, चिता की भस्म लपटेते हो, श्मशान में वास करते हो, बैल की सवारी करते हो, सर्प लपेटे हो आदि-आदि। पर शंकर जी को बुरा नहीं लगा। क्योंकि जब दक्ष ने उन्हें अपनी पुत्री सती ब्याही थी तब भी शंकर जी का वेष यही थी पर आज दक्ष जो कह रहे थे उसका आधार उनका अहंकार था। शंकर जी ने कहा कि दक्ष ने सब कुछ सत्य ही कहा है फिर मुझे बुरा क्यों लगेगा।
 
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गीता भवन श्रीकृष्ण मंदिर पर शरदोत्सव मनाया गया
मंदसौर। धर्मधाम गीता भवन के अध्यक्ष अन्र्तराष्ट्रीय संत श्री स्वामी
राम निवास जी महाराज के सानिध्य में शरद पूर्णिमा उत्सव श्रीकृष्ण मंदिर
गीता भवन में श्रद्धा भक्ति के साथ मनाया गया। गीता भवन भक्त मण्डल के
सर्वश्री पी.डी. शर्मा, अम्बिका प्रसाद लोहार, राजेन्द्र मेहरा, महेश
शर्मा, संजय राठौर, लाला शर्मा, बालु रावत के सौजन्य से साबुदाने की 51
किलो खीर बनाई गई तथा गीता भवन परिसर में चंद्र किरणो के साथ रात 12 बजे
तक चांदनी में सजा कर रखा गया। गीता भवन के पुजारी जगदीशदास बैरागी ने
भक्तजनो के साथ श्रीकृष्ण की संगीत व वाद्ययंत्रो के साथ आरती की,
तत्पश्चात श्रद्धालुओ को खीर वितरित की गई। उपरोक्त जानकारी देते हुए
गीता भवन के सचिव पं अशोक त्रिपाठी ने बताया कि बडी संख्या में
श्रद्धालु, माताओ, बहनो ने भाग लिया तथा दूसरे दिन प्रातः तक खीर की
प्रसादी का वितरण किया गया।

अशोक त्रिपाठी
9229576969
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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