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हमारी विरासत -हमारे महापुरुष

शंकराचार्य

शंकराचार्य हिमालयकी ओर यात्रा कर रहे थे । तब उनके साथ उनके सभी शिष्य थे । सामने अलकनंदा नदीका विस्तीर्ण पात्र था । किसी एक शिष्यने शंकराचार्यजीकी स्तुति करना प्रारंभ किया । उसने कहा, ‘‘आचार्य, आप कितने ज्ञानी हैं ! यह अलकनंदा सामनेसे बह रही है ना ! कितना पवित्र प्रवाह है ये ! इससे भी कितने गुना अधिक ज्ञान आपका है ! महासागरसमान !’’
उस समय शंकराचार्यजीने हाथका दंड पानीमें डुबाया, बाहर निकाला एवं शिष्यको दिखाया । ‘‘देख, कितना पानी आया ? एक बूंद आई उसपर ।'’ शंकराचार्य हंसकर बोले, ‘‘पागल, मुझे कितना ज्ञान है बताऊं ? अलकनंदाके पात्रमें जितना जल है ना, उसका केवल एक बिंदु दंडपर आया । पूरे ज्ञानमेंसे मेरा ज्ञान केवल उतना ही है । जब आदि शंकराचार्य ऐसा कहते हैै, तो आप-हम क्या है ?

रामकृष्ण परमहंस

संपूर्ण जगत् जब शांत सोया हुआ होता है, तब रामकृष्ण परमहंस निर्जन घने वनमें वृक्षके नीचे ध्यानमग्न होकर कालीमाताकी उपासना करते थे । रामकृष्णका भतीजा हरिदाके मनमें प्रश्न उभरता था, ‘प्रति रात्रि रामकृष्णजी कहां जाते हैं ? क्या करते हैं ?' एक रात्रि हरिदा रामकृष्णजीके पीछे-पीछे गए । रामकृष्णजी घने वनमें घुस गए । उनके हाथमें न तो दीया था, न तो मोमबत्ती । रामकृष्णजीने आंवलेके पेडके नीचे पद्मासन लगाया एवं नेत्र मूंद लिए । इससे पूर्व उन्होंने गलेमें पहना हुआ जनेऊ भी केसरी वस्त्रोंसहित उतार दिया । यह देख हरिदाको आश्चर्य हुआ । सूर्योदयतक रामकृष्णजी अविचल बैठे रहे । कुछ समय उपरांत उन्होंने यज्ञोपवित (जनेऊ) धारण किया । सूर्योपासना की । हरिदा यह सब देख रहे थे । रात्रिसे अस्वस्थ करनेवाला प्रश्न उसने किया, ‘‘आप उपासनाके समय जनेऊसहित सभी वस्त्र क्यों उतारते हैं ? यह पागलपन नहीं लगता क्या ?'' उसपर रामकृष्णजी बोले, ‘‘हरिदा, ईश्वरतक पहुंचनेके मार्गमें अनेक बाधाएं आती हैं । मैं जब जगन्माताका ध्यान करता हूं, तब द्वेष, मत्सर, भय, अहंकार, लोभ, मोह, जातिका अभिमान-जैसी अनेक बातोंका त्याग करनेका प्रयास करता हूं । नहीं तो ये सभी बातें मनमें कोलाहल मचाती हैं । जनेऊ अर्थात् जातिका अभिमान, ज्ञानका अहंकार, वह भी दूर करना आवश्यक है न ! अहंकारकी बाधाएं दूर करते हुए मुझे वहां (साध्यतक) पहुंचना है ।’’

छत्रपति शिवाजी महाराज


आबाजी सोनदेवने आगे बढकर शिवाजी महाराजको अभिवादन किया और सील-बंद कोशका संदूक प्रस्तुत करते हुए कहा, ‘‘आपके आशीर्वादसे हमने बीजापुरका यह कोश अपने अधिकारमें ले लिया है । कोशके साथ उनके सब सैनिक, सरदार सूबेदार, मुल्ला एवं मूहम्मदको बंदी बना लिया हैं । महाराज ! इस आक्रमणके समय एक बहुमूल्य वस्तू भी हमें मिली ।’’ इतना कहकर आबाजी सैनिकोंके पीछेसे बुरकापोश सुंदरीको आगे ले आए और झुककर बोले ,‘‘महाराज, यह है वह बेशकीम...’’ उसका वाक्य तो रहा ही किंतु उनके शब्द भी पूरे न हो सके । शिवाजी महाराज क्रोधमें आपेसे बाहर हो गए और गरज उठे, ‘‘खामोश! बेशर्म आबाजी, खामोश ! यह सब करनेसे पहले आपके हाथ टूट क्यों नहीं गए, यह कहनेसे पहले जीभ कटकर गिर क्यों नहीं गई । आखिर हमने स्वराज्यकी स्थापनाका व्रत ही क्यों लिया है ? क्या दूसरोंकी बहू-बेटियोंकी अस्मत लूटनेके लिए ? दूसरोंके धर्मस्थान नष्ट करनेके लिए ? कभी नहीं । हम हिंदु हैं । सबसे बडे शत्रुकी बहू-बेटी भी हमारी मां-बेटी है, धर्मपुत्री है ।’’ महिलाने बुर्का मुंहसे हटा दिया । शिवाजी महाराजने महिलासे कहा, ‘‘बहन! हम आपको किस मुंहसे क्षमा मांगे । आप बंदी नहीं, हमारी प्रतिष्ठित अतिथि हैं । आप अपने सैनिकोंके साथ जानेके लिए स्वतंत्र हैं ।’’‘‘ किन लफ्जों में आपका शुक्रिया अदा करूं, ऐ मेरे रहनुमा ! माफी मागंकर मुझे गैरतमें न डालिए । आप जैसे फरिश्तोंकी कामयाबीमें ही कौम और मुल्ककी इज्जत छिपी है,’’ कहते हुए उस सुंदरीने झुककर सलाम किया और पुन: बुर्का मुंहपर ओढ लिया ।

महाराणा प्रताप

भारतके इतिहासमें राजा महाराणा प्रतापका नाम अमर है । महाराणा प्रताप राजस्थानके शूरवीर एवं स्वाभिमानी राजा थे ।
जयपुरके राणा मानसिंहने अकबरद्वारा अपने राज्यको कष्ट न हो; इसलिए अपनी बहनका विवाह अकबरसे किया । एक बार अपने वैभवके प्रदर्शन हेतु राजपूत दिल्ली जाते समय मार्गमें स्थित महाराणा प्रतापसे मिलने कुंभलगढ गये । महाराणा प्रतापने उन सभीका योग्य आदरसत्कार किया; परंतु उसने साथ बैठकर भोजन न करने की इच्छा व्यक्त की । मानसिंहद्वारा कारण पूछनेपर महाराणा प्रतापने कहा, ``समशेरी (मुगल शासक)से अपने राज्यकी रक्षा करनेकी अपेक्षा अपनी बेटी-बहनोंको मुगलोंके हाथ देकर उनसे राज्यकी रक्षा करानेवाले स्वाभिमान शून्य राजपूतोंके साथ बैठकर मैं भोजन नहीं करता ।''
महाराणा प्रतापजीद्वारा कहे गए कटु सत्य सुनकर मानसिंह भोजनकी थाली छोड, खडा हुआ और क्रोधित होकर चिल्लाया, ``महाराणा प्रताप ! रणक्षेत्रमें तेरा सत्यानाश नहीं किया, तो मेरा नाम मानसिंह नहीं !''
कुछ समय उपरांत मानसिंह, अकबरके पुत्र सलीम एवं प्रचंड सैन्यके साथ महाराणा प्रतापसे युद्ध करने निकला । यह सूचना मिलते ही महाराणा प्रतापने तत्परतासे अरावली पर्वतसे आनेवाले मार्गपर मानसिंहकी सेनापर आक्रमण आरंभ किया और उनकी अधिकांश सेनाको मिट्टीमें मिला दिया । महाराणा प्रतापजीकी तलवारसे सलीमका वध होनेवाला था; परंतु वह वार उसके हाथीपर हुआ और सलीम बच गया । महाराणा प्रतापकी तलवारके भयसे मानसिंह सेनाके पीछे था । महाराणा अपनी धारदार चमकती तलवारसे शत्रुके घेरेसे बाहर निकलनेका प्रयास कर रहे थे । इतनेमें किसी शत्रुसैनिकने महाराणाजीके घोडे ‘चेतक’के एक पैर में तीर मारकर उसे घायल कर दिया। ऐसी स्थितिमें भी वह स्वामीनिष्ठ घोडा अपनी पीठपर बैठे महाराणाजीको बचानेके लिए भागकर उस घेरेको भेदनेका प्रयास करने लगा । इतनेमें मार्गमें नाला आया । चेतकने छलांग लगाकर वह नाला पार किया, परंतु हृदय गति रुकनेके कारण उसने अपने प्राण त्याग दिए ।
महाराणा प्रतापजीने पीछे मुडकर देखा, तो अकबरकी सेनामें भर्ती हुआ उनका छोटा भाई शक्तिसिंह, चार-पांच मुगल सैनिकोंको जानसे मार रहा था । वह दृश्य देखकर महाराणाजी आश्चर्यचकित हुए । इतनेमें उन पांच सैनिकोंके प्राण लेकर शक्तिसिंह महाराणाके पास आया एवं उन्हें आलिंगनमें लेकर कहने लगा, ``भैया ! मैं मुगलोंकी सेनामें हूं, तो भी आपका असीम शौर्य, पराक्रमके कारण आप ही मेरा आदर्श हैं । मैं आपके इस स्वामीनिष्ठ घोडेसे भी तुच्छ हूं ।''

मेवाडका इतिहास लिखनेवाले कर्नल टॉण्डने महाराणा प्रतापजीका गौरव बताते हुए कहा है, `उत्कट महत्वाकांक्षी, शासन निपुणता एवं अपरिमित साधनसंपत्तिके बलपर अकबरने दृढनिश्चयी, धैर्यशाली, उज्ज्वल कीर्तिमान और साहसी महाराणा प्रतापके आत्मबलको गिरानेका प्रयास किया; परंतु वह निष्फल हुआ ।'


सुभाषचंद्र बोस

५ जुलाईको आजाद हिंद सेनाका ६५ वां स्थापनादिवस मनाया जाएगा ! आजाद हिंद सेनाके संस्थापक नेताजी सुभाषचंद्र बोस उग्रमतवादी क्रांतिकारी थे । अंगे्रजोंको परास्त करनेके लिए भारतकी स्वतंत्रता संग्रामकी अंतिम लडाईका नेतृत्व नियतीने नेताजीके हाथों सौंपा था । नेताजीने यह पवित्र कार्य असीम साहस एवं तन, मन, धन तथा प्राणका त्याग करनेमें तत्पर रहनेवाले हिंदी सैनिकोंकी ‘आजाद हिंद सेना' संगठनद्वारा पूर्ण किया । इस संगठनका अल्पसा परिचय !
ब्रिटिश सेनाके हिंदी सैनिकोंका नेताजीने बनाया संगठन !
अंग्रेजोंकी स्थानबद्धतासे भाग जानेपर नेताजीने फरवरी १९४३ तक जर्मनीमें ही वास्तव्य किया । वे जर्मन सर्वसत्ताधीश हिटलरसे अनेक बार मिले और उसे हिंदुस्थानकी स्वतंत्रताके लिए सहायताका आवाहन भी किया । दूसरे महायुद्धमें विजयकी ओर मार्गक्रमण करनेवाले हिटलरने नेताजीrको सर्व सहकार्य देना स्वीकार किया । उस अनुसार उन्होंने जर्मनीकी शरणमें आए अंग्रेजोंकी सेनाके हिंदी सैनिकोंका प्रबोधन करके उनका संगठन बनाया । नेताजीrके वहांके भाषणोंसे हिंदी सैनिक देशप्रेममें भावविभोर होकर स्वतंत्रताके लिए प्रतिज्ञाबद्ध हो जाते थे । 

आजाद हिंद सेनाकी स्थापना और ‘चलो दिल्ली' का नारा !

नेताजीके मार्गदर्शनानुसार पूर्व एशियाई देशोंमें पहलेसे ही रहनेवाले रासबिहारी बोसने हिंदी सेनाका संगठन किया । इस हिंदी सेनासे मिलने नेताजी ९० दिन पनडुब्बीसे यात्रा करते समय मृत्युसे जूझते जुलाई वर्ष १९४३ में जापानकी राजधानी टोकियो पहुंचे । रासबिहारी बोसजीने इस सेनाका नेतृत्व नेताजीके हाथों सौंपकर दिया । ५ जुलाई १९४३ को सिंगापुरमें नेताजीने ‘आजाद हिंद सेना’की स्थापना की । उस समय सहस्रों सैनिकोंके सामने ऐतिहासिक भाषण करते हुए वे बोले, ‘‘सैनिक मित्रों ! आपकी युद्धघोषणा एक ही रहे ! चलो दिल्ली ! आपमें से कितने लोग इस स्वतंत्रतायुद्धमें जीवित रहेंगे, यह तो मैं नहीं जानता; परंतु मैं इतना अवश्य जानता हूं कि अंतिम विजय अपनी ही है । इसलिए उठो और अपने अपने शस्त्रास्त्र लेकर सुसज्ज हो जाओ । हमारे भारतमें आपसे पहले ही क्रांतिकारकोंने हमारे लिए मार्ग बना रखा है और वही मार्ग हमें दिल्लीतक ले जाएगा । ....चलो दिल्ली ।''

‘रानी ऑफ झांसी रेजिमेंट'की स्थापना !

नेताजीने झांसीकी रानी रेजिमेंटके पदचिन्होंपर महिलाओंके लिए ‘रानी ऑफ झांसी रेजिमेंट'की स्थापना की । पुरुषोंके कंधेसे कंधा मिलाकर महिलाओंको भी सैनिक प्रशिक्षण लेना चाहिए, इस भूमिकापर वे दृढ रहे । नेताजी कहते, हिंदुस्थानमे १८५७ के स्वतंत्रतायुद्धमें लडनेवाली झांसीकी रानीका आदर्श सामने रखकर महिलाओंको भी स्वतंत्रतासंग्राममें अपना सक्रिय योगदान देना चाहिए ।'

आजाद हिंद सेनाद्वारा धक्का !

१९ मार्च १९४४ के ऐतिहासिक दिन आजाद हिंद सेनाने भारतकी भूमिपर कदम रखा । इंफाल, कोहिमा आदि स्थानोंपर इस सेनाने ब्रिटिश सेनापर विजय प्राप्त की । इस विजयनिमित्त २२ सितंबर १९४४ को किए हुए भाषणमें नेताजीने गर्जना की कि, ‘‘अपनी मातृभूमि स्वतंत्रताकी मांग कर रही है ! इसलिए मैं आज आपसे आपका रक्त मांग रहा हूं । केवल रक्तसे ही हमें स्वतंत्रता मिलेगी । तुम मुझे अपना रक्त दो । मैं तुमको स्वतंत्रता दूंगा !'' (‘‘दिल्लीके लाल किलेपर तिरंगा लहरानेके लिए तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा'') यह भाषण इतिहासमें अजरामर हुआ । उनके इन हृदय झकझोर देनेवाले उद्गारोंसे उपस्थित हिंदी युवाओंका मन रोमांचित हुआ और उन्होंने अपने रक्तसे प्रतिज्ञा लिखी ।
रणक्षेत्रकी ओर अर्थात् सयाम जाते समय १८ अगस्त १९४५ को फार्मोसा द्वीपपर उनका बॉम्बर विमान गिरकर नेताजीका हदयद्रावक अंत हुआ ।
आजाद हिंद सेना दिल्लीतक नहीं पहुंच पाई; परंतु उस सेनाने जो प्रचंड आवाहन् बलाढ्य ब्रिटिश साम्राज्यके सामने खडा किया, इतिहासमें वैसा अन्य उदाहरण नहीं ।
ब्रिटिश भयभीत हो गए और नेहरू भी झुके !
स्वतंत्रताके लिए सर्वस्व अर्पण करनेवाली नेताजीकी आजाद हिंद सेनाको संपूर्ण भारतवासियोंका उत्स्फूर्त समर्थन प्राप्त था । आजाद हिंद सेनाके सैनिकोंकी निस्वार्थ देशसेवासे ही स्वतंत्रताकी आकांक्षा कोट्यवधी देशवासियोंके मनमें निर्माण हुई ।

भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव

हुतात्मा भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेवकी फांसीसे पूर्व उनके सहयोगियोंके साथ हुई अंतिम भेंट !

‘भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव इन महान क्रांतिकारियोंको फांसीका दंड सुनाया गया था । उस समय उनके साथ इस षड्यंत्रमें सहभागी शिवकर्मा, जयदेव कपूर एवं अन्य सहयोगियोंको आजन्म कारावासका दंड सुनाया गया था । जिन सहयोगियोंको आजन्म कारावास मिला था उन्हें अगले दिन बंदीगृह ले जानेवाले थे । तब बंदीगृहके वरिष्ठ अधिकारियोंने भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेवसे अंतिम भेंट करनेकी उन्हें अनुमति दी ।
इस भेंटमें जयदेव कपूरने भगतसिंहसे पूछा, ‘आपको फांसी दी जा रही है । युवावस्थामें मृत्युका सामना करते हुए क्या आपको दु:ख नहीं हो रहा ? तब भगतसिंहने हंसकर कहा, ‘अरे ! मेरे प्राणोंके बदलेमें ‘इंकलाब जिंदाबाद’ की घोषणा हिंदुस्थानके गली-कूचोंमें पहुंचानेमें मैं सफल हुआ हूं और इसे ही मैं अपने प्राणोंका मूल्य समझता हूं । आज इस बंदीगृहके बाहर मेरे लाखों बंधुओंके मुखसे मैं यही घोषणा सुन रहा हूं । इतनी छोटी आयुमें इससे अधिक मूल्य कौन-सा हो सकता है ?’ उनकी तेजस्वी वाणीसे सभीकी आंखें भर आर्इं । सभीने बडी कठिनाईसे अपनी सिसकियां रोकीं । तब उनकी अवस्था देखकर भगतसिंह बोले, ‘मित्रों, यह समय भावनाओंमें बहनेका नहीं है । मेरी यात्रा तो समाप्त हो ही गई है; परंतु आपको तो अभी अत्यंत दूरके लक्ष्यतक जाना है । मुझे विश्वास है कि आप न हार मानेंगे और न ही थककर बैठ जाएंगे ।’

उन शब्दोंसे उनके सहयोगियोंमें अधिक जोश उत्पन्न हुआ । उन्होंने भगतसिंहको आश्वासन दिया कि ‘देशकी स्वतंत्रताके लिए हम अंतिम सांसतक लढेंगे’, और इस प्रकार यह भेंट पूर्ण हुई । इसके पश्चात् भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेवके बलिदानसे हिंदुस्थानवासियोंके मनमें देशभक्तिकी ज्योत अधिक तीव्रतासे जलने लगी ।’

बिपिनचंद्र पाल

‘राष्ट्रवादके महानतम पुरोधाओंमें एक' इस प्रकारसे वर्णित बिपिनचंद्र पाल, भारतके राजनैतिक इतिहासमें लोकमान्य तिलक तथा लाल लाजपत रायके साथ किए गए सहयोगके कारण स्वतंत्रता संग्रामसे जुड गए थे । साहस, सहयोग एवं त्यागके द्वारा संपूर्ण राजनैतिक स्वतंत्रता अथवा स्वराज्यकी मांग की ।

‘पाल’ शिक्षक, पत्रकार, लेखक तथा ग्रंथपाल थे । ब्राह्मो समाजके समर्थकके रूपमें आरंभ कर, बिपिनचंद्र वेदांतकी ओर झुके तथा अंततः श्री चैतन्यके वैष्णव दर्शनके पुरोधा रहे । एक कट्टर समाजसुधारकके रूपमें उन्होंने जीवनमें दो बार उच्चभ्रू समाजकी विधवाओंसे विवाह किया । उन्होंने राजाराममोहन राय, केशवचंद्र सेन, श्री अरविंद घोष, रविंद्रनाथ टैगोर, आशुतोष मुखर्जी तथा एनी बेसेंट प्रभृति आधुनिक भारतके निर्माताओंपर शोधमूलक ज्ञानप्रद लेखमाला भी लिखी । व्यापक दृष्टिकोण देनेवाली ‘सामंजस देशभक्ति'का उन्होंने उपदेश दिया । ‘परिदर्शक' (१८८६ - बांग्ला साप्ताहिक), ‘न्यू इंडिया (१९०२ - अंग्रेजी साप्ताहिक) तथा बंदे मातरम (१९०६ - बांग्ला दैनिक) ये उनके द्वारा चलाए गए कुछ पत्र हैं ।

सिलहट (अबका बांग्लादेश) में एक गांवके एक संपन्न परिवारमें ७ नवंबर १८५८ के दिन जन्मे पालको अपना शिक्षण माध्यमिक स्तरपर ही छोड देना पडा । इस समय वे केशवचंद्र सेन तथा पं. शिवनाथ शास्त्री जैसे विख्यात बंगाली नेताओंके प्रभावमें आए । श्री अरविंदके विरुद्ध वंदे मातरम अभियोगमें साक्ष्य देना अस्वीकार करनेके कारण उन्हें ६ महीने सश्रम कारावास भोगना पडा । उन्होंने इंग्लैंड (३ बार) तथा अमरीका भ्रमण भी किया ।

पालने १९२० में गांधीके असहयोग आंदोलनका विरोध भी किया । १८८६ में सिलहटके प्रतिनिधिके रूपमें उन्होंने कॉंग्रेस अधिवेशनमें भाग भी लिया । १९२० में सक्रिय राजनीतिसे लगभग संन्यास लेकर वे राष्ट्रीय प्रश्नोंपर टिप्पणी मात्र करते रहे । २० मई १९३२ के दिन यह महान देशभक्त चिरनिद्रामें लीन हो गया ।

खुदीराम बोस

भारतके सबसे युवा क्रांतिकारीके रूपमें परिचित खुदीराम बोस अपनी आयुके केवल १९ वें वर्षमें ही वीरगतिको प्राप्त हुए । उनका जन्म बंगालमें स्थित मेदिनीपुर जिलेके बहुवेनी गांवमें दि. ३ दिसंबर १८८९ को हुआ था । बाल्यावस्थामें ही माता (लक्ष्मीप्रियादेवी) तथा पिता (त्रैलोक्यनाथ) की मृत्यु होनेके कारण बडी बहन अनुरूपादेवी तथा उनके पति अमृतलाल ने उनका पालनपोषण किया ।

ब्रिटिश शासनने वर्ष १९०३ में बंगाल प्रांतका विभाजन करना निश्चित किया । सामान्य जनोंमें अत्यंत निराशाकी लहर फैल गई । खुदीरामको भी बंगालके विभाजनका यह निर्णय अन्यायकारी लगा, उनके मनमें देशके लिए कुछ करनेके विचार बारंबार आनेके कारण मिदनापुरमें थोडी-बहुत शिक्षा लेनेके पश्चात् उन्होंने सशस्त्र क्रांतिके मार्गको स्वीकार किया । सरकारके विरूद्ध आंदोलन करनेवालोंको पकडकर कठोर दंड दिए जाने लगे । कुछ ही दिनोंमें मुजफ्फरपुरके मजिस्ट्रेटका, जो क्रांतिकारियोंको अमानुषिक दंड देते थे, वध करनेका दायित्व क्रांतिकारियोंके नेता बारीद्रकुमार एवं उपेंद्रनाथ को दिया तथा उनकी सहायताके लिए प्रफुल्लचंद्र चक्रवर्तीको नियुक्त किया । वे दोनों ही मुजफ्फरपुर आए एवं मजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड पर ध्यान रखकर अवसरकी प्रतीक्षा करने लगे । मजिस्ट्रेट किंग्जफोर्डका वध करनेके उपरांत ही उन्होंने शासनके विरोधका संकल्प लिया । बंकिमचंद्र चट्टोपाध्यायजी के आनंदमठ उपन्यासमें वंदे मातरम गीतके माध्यमसे उन्होंने लोगोंमें नवजीवनका संचार किया । खुदीरामने किंग्जफोर्डके वधका दायित्व स्वीकार किया । दि. १अप्रैल १९०५ के दिन किंग्जफोर्ड की गाडीपर बम फेंककर उसका वध करना निश्चित हुआ एवं उसके अनुसार एक बम फेंका गया; परंतु वह बम गलतीसे दूसरी गाडीपर फेंके जानेसे उस गाडीमें सवार दो महिलाओंकी मृत्यु होगई एवं किंग्जफोर्ड बच गया । खुदीराम एवं उनके सहायक तत्काल वहांसे भाग गए । उसी रात खुदीराम चालीस कि.मी. दूर भागकर बेनी रेल स्टेशनपर आ गए । भूख लगनेके कारण वह एक दुकानपर चने ले रहे थे, उस समय वहांका स्टेशनमास्टर र्पोटरको कह रहा था, 'अरे, इस समाचारको पढा क्या?' मजफ्फरपुरमें दो मैडमोंकी हत्या कर दो लोग फरार हो गए हैं, उनको पकडनेके लिए वारंट निकाला गया है । अभी आनेवाली गाडीमें कोई मिलता है क्या देखो । खुदीरामने यह बात सुनतेही एकदमसे कहा, ''क्या, किंग्जफोर्ड मरा नहीं ।'' निकटके लोगोंको उनके इस वक्तव्यसे आश्चर्य लगा एवं उन्हें आशंका हुई । तत्काल खुदीराम वहांसे भागे । घटनाके दूसरे दिन खुदीराम पकडे गए, प्रफुल्लने उनके पकडे जानेसे पूर्व ही आत्महत्या कर ली थी । खुदीरामके पास दो पिस्तौलें एवं ३० कारतूसें मिलीं । उनपर धारा ३०२ के अंतर्गत अभियोग चलाकर फांसीका दंड दिया गया । २२ अगस्त १९०८ के दिन यह युवक हाथमें गीता लेकर एवं ‘भारतमाता’ की जय कहते हुए हंसते हंसते प्रसन्नतापूर्वक फांसीपर चढ गया । सशस्त्र क्रांतिमें बमका उपयोग करनेवाला खुदीराम देशका पहला क्रांतिकारी बना । 

सरदार ऊधमसिंग

ब्रिटिश साम्राज्यका दृढ शत्रु 

५ जून १९४० लंदनका ओल्ड बेली न्यायालय । न्यायाधीश अ‍ॅटकिन्सनके सामने लगभग चालीस वर्षकी अवस्थाका हृष्ट-पुष्ट एक हिंदुस्थानी बंदी बडे अभिमानसे अपना वक्तव्य पढ रहा था । न्यायधीशके दंड सुनानेके पूर्वका यह उसका अंतिम वक्तव्य था । उसने कहा, ‘‘ब्रिटिश साम्राज्यवादके हिंदुस्थानमें मैंने जनताको दाने-दानेके लिए मरते हुए देखा है । अमृतसरके जलियांवाला बागमें जनरल डायर और माइकल ओडायरके आदेशपर किए हुए क्रूर हत्याकांडका दृश्य मैं आज भी नहीं भूला हूं । इन्हीं घटनाओंसे मैंने ब्रिटिश साम्राज्यके विरुद्ध प्रतिशोध लेनेकी मन-ही-मन शपथ ली थी । ओडायरका वध करके यदि मैं यह प्रतिशोध न लेता, तो हिंदुस्थानके नामको कलंक लग जाता ! तुम्हारे १०, १५ अथवा २० वर्षोंके कारावासका अथवा मृत्युदंडका मुझे भय नहीं । वृद्धावस्थातक ऐसे जीनेसे क्या लाभ, जिसमें कोई उद्देश्य ही न हो । अपने उद्देश्यपूर्तिके लिए, मरनेमें ही खरा पुरुषार्थ है, फिर यह कार्य युवावस्थामें ही क्यों न हो ! अपने देशके सम्मानकी रक्षाके लिए अपने प्राणोंकी आहुति देनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है, यह तो मेरे लिए गौरवकी बात है !''

उसका वक्तव्य २० मिनट चला । ब्रिटिश शासनद्वारा हिंदुस्थानपर किए जा रहे अत्याचारोंका ऐसा स्पष्ट वर्णन सुनना न्यायाधीशको भी असह्य हुआ । निवेदन समाप्त हुआ, तब न्यायाधीश इतने क्रोधित थे कि मृत्युदंड (फांसी) सुनाते समय सिर पर काली टोपी चढाए बिना, ही उन्होंने उस बंदीके वक्तव्यके प्रकाशनपर प्रतिबंध लगाया दिया और दंड सुनाने लगे । इतनेमें उनके पास खडे किसी अधिकारीने उनके सिर पर काली टोपी रखी, फिर उन्होंने बंदीसे कहा, ‘तुम्हें मैं मृत्युदंड सुनाता हूं !’ 
इस महा पराक्रमी बंदीका नाम था ऊधमसिंह !

पंजाबशार्दूल सरदार ऊधमसिंहका जन्म पटियाला जनपदके सुनाम गांवमें २८ दिसंबर १८९९ को हुआ । १९१९ के जलियांवाला बाग हत्याकांडके वे प्रत्यक्ष दर्शी थे । इस सभामें वह स्वयंसेवकके रूपमें पानी देनेकी सेवा कर रहे थे । गोलियां चलनेपर उनके हाथमें भी गोली लगी और वे धरतीपर गिर पडे; परंतु अपने देशबांधवोंकी कारुणिक चीत्कारें सुनकर वे उन्हें पानी देनेके लिए पुनः उठे । ३७३ निरपराध लोगोंको मारनेवाले और १५०० से भी अधिक लोगोंको आहत करनेवाले इस हत्याकांडका आदेश उस समयके पंजाबके लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओडायरने दिया था । तभीसे ऊधमसिंहके मनमें प्रतिशोधकी अग्नि धधक रही थी ।

२१ वर्षोंके पश्चात् हिंदुस्थानका कलंक अपने रुधिरसे धो दिया !

सरदार ऊधमसिंग कुछ समय भगतसिंहके साथ थे । उस समय उनके पास शस्त्रास्त्र और विस्फोटक (गोलाबारूद) मिले । उस प्रकरणमें उन्हें ५ वर्षोंका कारावास भी हुआ था । कारागृहसे छूटते ही वे १९३३ में वे इंग्लैंड गए । इसी कालावधिमें उन्होंने हिंदुस्थानसे इंग्लैंड लौटे ओडायरका वध करनेका दृढ निश्चय किया । इसके लिए उन्होंने ओडायरसे मित्रता बढाई । यह मित्रता इतनी गहरी थी कि १९४० में मृत्युपूर्व ओडायरने डेवॉनशायरके अपने घरपर उन्हें चाय-पानीके लिए आमंत्रित किया था और उन्होंने इस आमंत्रणको सहर्ष स्वीकार भी किया । इस समय वे ओडायरको मार सकते थे; परंतु उन्हें तो ओडायरका प्रतिशोध सार्वजनिक स्थानपर तथा सबके सामने लेना था । इसलिए उन्होंने ओडायरको उसके घरमें मारना उचित नहीं समझा ! १३ मार्च १९४० को जहां मदनलाल ढींगराने कर्जन वायलीका वध किया था, उसी वॅâक्स्टन हॉलमें शामको एक सभा थी । भारतमंत्री लॉर्ड जेटलैंड सभाके अध्यक्ष स्थानपर थे । सभामें भाषण करनेके लिए पर्सी साईक्स, मायकेल ओडायर आदि मान्यवर लोग आए थे । सबका भाषण समाप्त होते ही ऊधमसिंह आगे बढे और तीन गज दूर रुककर उन्होंने प्रथम पंक्तिमें बांर्इं ओर बैठे ओडायरपर दो गोलियां चलायीं । वह वहीं ढेर हो गया । उसके पश्चात् दो-दो गोलियां लॉर्ड जेटलैंड, लॉर्ड लैमिंगटन और सर लुई डेनको लगीं; परंतु वे सब केवल आहत हुए ।

फांसीसे विवाह !

ऊधमसिंहको पकड लिया गया । कारागृहसे जोहलसिंह नामके मित्रको भेजे हुए पत्रमें वे लिखते हैं, ‘‘मुझे मृत्युका भय कभी भी नहीं लगता । मैं शीघ्र ही फांसीसे विवाह करनेवाला हूं । मेरे सर्वोत्तम मित्रको (भगतसिंह) मुझे छोडकर गए हुए १० वर्ष हो गए । मेरी मृत्युके उपरांत उससे मेरी भेंट होगी । वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा है ।'' इन्हीं दिनों कारागृहमें कुछ अन्याय होनेके कारण उन्होंने ४२ दिन अन्नत्याग भी किया था । अपेक्षानुसार ऊधमसिंहको मृत्युदंड सुनाया गया । सुनकर उन्होंने सरदार भगतसिंहको आदर्श मानकर तीनबार ‘इंकलाब जिंदाबाद !' यह घोषणा की और ब्रिटिश न्यायालयके प्रति तुच्छता तथा तिरस्कार दिखाने हेतु न्यायालयपर थूंक दिया ! ३१ जुलाई १९४० को पेंटनवील कारागृहमें उन्हें फांसी दे दी गई ।

व्यक्तिगत प्रतिशोध वर्ष-दो वर्षोंमें लिया जा सकता है; परंतु राष्ट्रका प्रतिशोध अनेक वर्षोंके उपरांत भी लिया जा सकता है । प्रखर देशभक्त तो केवल उस अवसरकी प्रतीक्षा करते हैं । २१ वर्षोंके उपरांत भी अपने राष्ट्रके अपमानका प्रतिशोध लेनेके लिए सच्चे भारतीय देशभक्त अपने प्राणोंपर भी खेल जाते हैं, यह ऊधमसिंहने सारे विश्वको दिखा दिया !

महाराजा छत्रसाल

मध्यकालीन भारत में विदेशी आतताइयों से सतत संघर्ष करने वालों में छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप और बुंदेल केसरी छत्रसाल के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । बुंदेल केसरी छत्रसालको ‘शत्रु और संघर्ष’ ही विरासत में मिले थे । उन्होंने अपने पूरे जीवनभर स्वतंत्रता और सृजन के लिए ही सतत संघर्ष किया । उन्होंने विस्तृत बुंदेलखंड राज्य की गरिमामय स्थापना ही नहीं की थी, वरन साहित्य सृजन कर जीवंत काव्य भी रचे । छत्रसालने अपने ८२ वर्षके जीवन और ४४ वर्षीय राज्यकालमें ५२ युद्ध किये थे । उनके पिता चंपतरायने पूरे जीवनभर विदेशी मुगलों से संघर्ष करते हुए अपने ही विश्वासघातियों के कारण सन् १६६१ में अपनी वीरांगना पत्नी रानी लालकुंआरि के साथ आत्माहुति दी ।

इतिहास पुरुष : महाराजा छत्रसाल

इतिहास पुरुष छत्रसालका जन्म ज्येष्ठ शुक्ल ३ संवत १७०७ (सन् १६४१) को वर्तमान टीकमगढ जिलेमें हुआ । अपने पराक्रमी पिता चंपतरायकी मृत्युके समय वे मात्र १२ वर्षके ही थे । वनभूमिकी गोदमें जन्में, वनदेवोंकी छायामें पले, वनराजसे इस वीरका उद्गम ही तोप, तलवार और रक्त प्रवाहके बीच हुआ । उनका जन्म होते ही परिस्थिति अत्यंत विकट थी । पारंपरिक सत्ता शत्रुओंने छीन ली थी, निकटतम स्वजनोंके विश्वासघातके कारण उनके वीर मां-पिताजीको आत्महत्या करनी पडी, उनके पास कोई सैन्य बल अथवा धनबल भी नहीं था, ऐसे १२-१३ वर्षीय बालक की मनोदशा वैâसी होगी ? परंतु उनके पास बुंदेली शौर्यका संस्कार, वीर मां- पिताका अदम्य साहस और आत्मविश्वास था । इसलिए वे निराश न होकर अपने भाईके साथ पिताके मित्र राजा जयसिंहके पास पहुंचकर सेनामें भरती होकर आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण लेना प्रारंभ कर दिया ।

अपने पिताके वचनको पूरा करनेके लिए छत्रसालने पंवार वंश की कन्या देवकुंअरि से विवाह किया । उस समय छत्रपति शिवाजी महाराज हिंदवी राज्यके लिए कृत्यशील थे । छत्रसालजी मुगल सत्ताके कारण दुखी थे, इन परिस्थितियोंमें उन्होंने शिवाजीसे मिलना उचित समझा और सन १६६८ में दोनों राष्ट्रवीरों की जब भेंट हुई तो शिवाजीने छत्रसालको उनके उद्देश्यों, गुणों और परिस्थितियोंका आभास कराते हुए स्वतंत्र राज्य स्थापनाकी मंत्रणा दी एवं समर्थ गुरु रामदासके आशीषों सहित ‘भवानी’ तलवार भेंट की-

करो देस के राज छतारे हम तुम तें कबहूं नहीं न्यारे।
दौर देस मुगलन को मारो दपटि दिली के दल संहारो।
तुम हो महावीर मरदाने करि हो भूमि भोग हम जाने।
जो इतही तुमको हम राखें तो सब सुयस हमारे भाषे।


शिवाजी से स्वराज का मंत्र लेकर सन १६७० में छत्रसाल वापस अपनी मातृभूमि लौट आए परंतु तत्कालीन बुंदेल भूमि की स्थितियां बिलकुल भिन्न थीं । अधिकांश रियासतदार मुगलों के मनसबदार थे, छत्रसालके भाई-बंधु भी दिल्लीसे लडनेको तैयार नहीं थे । छत्रसालजीके बचपनके साथी महाबली तेलीने उनकी धरोहर, थोडी-सी पैत्रिक संपत्तिके दी जिससे छत्रसालजीने ५ घुडसवार और २५ पैदलोंकी छोटी-सी सेना तैयार कर ज्येष्ठ सुदी पंचमी रविवार वि.सं. १७२८ (सन १६७१) के शुभ मुहूर्त में औरंगजेबके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजाते हुए स्वराज्य स्थापनाका बीडा उठाया ।

संघर्ष का शंखनाद

छत्रसाल की प्रारंभिक सेना में सैन्य, राजा नहीं थे अपितु तेली बारी, मुसलमान, मनिहार आदि जातियों से आनेवाले सेनानी ही थे । चचेरे भाई बलदीवान उनके साथ थे । छत्रसालने अपने माता-पिताके साथ विश्वासघात करने वाले सेहराके धंधेरों पर पहला आक्रमण किया । कुंअरसिंहको कैद किया तथा उसकी मददको आये हाशिम खांकी धुनाई की और सिरोंज एवं तिबरा लूटे गये । लूट की सारी संपत्ति छत्रसालने अपने सैनिकों में बांटकर पूरे क्षेत्र के लोगों को उनकी सेना में सम्मिलित होने के लिए आवाहन किया । कुछ ही समय में छत्रसाल की सेना में भारी वृद्धि होने लगी और उन्होंने अनेक क्षेत्र जीत लिए । सन १६७१ में ही कुलगुरु नरहरि दास ने भी विजय का आशीष छत्रसाल को दिया।

ग्वालियर की लूट से छत्रसाल को सवा करोड रुपये प्राप्त हुए । इस कारण औरंगजेबने आठ सवारों सहित तीस हजारी सेना भेजकर गढाकोटा के पास छत्रसालपर धावा बोल दिया । घमासान युद्ध हुआ । दणदूल्हा (रुहल्ला खां)पराजित हुआ तथा भरपूर युद्ध सामग्री छोडकर जान बचाकर उसे भागना पडा । सन १६७१-८० की अवधि में छत्रसालजीने चित्रकूटसे लेकर ग्वालियर तक और कालपी से गढाकोटा तक प्रभुत्व स्थापित कर लिया । सन १६७५ में छत्रसाल की भेंट संत प्राणनाथसे हुई जिन्होंने छत्रसाल को आशीर्वाद दिया- छत्ता तोरे राज में धक धक धरती होय जित जित घोड़ा मुख करे तित तित फत्ते होय।

बुंदेले राज्यकी स्थापना

आतंकके कारण अनेक मुगल फौजदार स्वयं ही छत्रसाल को राज्य देने लगे । बघेलखंड, मालवा, राजस्थान और पंजाब तक छत्रसाल ने युद्ध जीते । परिणामतः यमुना, चंबल, नर्मदा और टोंस क्षेत्रमें बुंदेला राज्य स्थापित हो गया । सन १७०७ में औरंगजेबकी मृत्यु हो गई । उसके पुत्र आजमने छत्रसालजीको मात्र सूबेदारी देनी चाही पर छत्रसालने स्वाभिमानीसे इसे अस्वीकार कर दिया ।

महाराज छत्रसालपर इलाहाबादके नवाब मुहम्मद बंगस का ऐतिहासिक आक्रमण हुआ । इस समय छत्रसाल लगभग ८० वर्ष के वृद्ध हो चले थे और उनके दोनों पुत्रोंमें अनबन थी । जैतपुरमें छत्रसाल पराजित हो रहे थे । ऐसी परिस्थितियोंमें उन्होंने बाजीराव पेशवाको पुराना संदर्भ देते हुए सौ छंदों का एक काव्यात्मक पत्र भेजा जिसकी दो पंक्तियां थीं जो गति गज और ग्राह की सो गति भई है आज बाजी जात बुंदेल की राखौ बाजी लाज।

फलतः बाजीरावकी सेना आनपर बंगश की पराजय हुई तथा उसे प्राण बचाकर अपमानित हो, भागना पडा । छत्रसाल युद्धमें क्षीण हो गए थे, लेकिन मराठोंके सहयोगसे उन्होंने सम्मानसे मुगलोंसे युद्ध किया और विजयी हुए । छत्रसालजीने अपने अंतिम समय में राज्यके बंटवारेमें बाजीरावको तीसरा पुत्र मानते हुए बुंदेलखंड झांसी, सागर, गुरसराय, काल्पी, गरौठा, गुना, सिरोंज और हटा आदि हिस्सेके साथ राजनर्तकी मस्तानी भी उपहार में दी । छत्रसालजीने अपने दोनों पुत्रों ज्येष्ठ जगतराज और कनिष्ठ हिरदेशाहको जनता को समृद्धि और शांति से राज्य-संचालन हेतु बांटकर अपना दायित्व निभाया । यही कारण था कि छत्रसाल को अपने अंतिम दिनों में वृहद राज्य के सुप्रशासनसे (उस समय) एक करोड आठ लाख रुपये की आय होती थी । उनके एक पत्र से स्पष्ट होता है कि उन्होंने अंतिम समय १४ करोड रुपये राज्य के खजाने में (तब) शेष छोडे थे । प्रतापी छत्रसाल ने पौष शुक्ल तृतीया भृगुवार संवत् १७८८ (दिसंबर १७३१) को छतरपुर (नौ गांव) के निकट अपना शरीर त्यागा और भारतीय आकाश पर सदा-सदा के लिए जगमगाते सितारे बन गये।

कलाका सम्मान करनेवाले

छत्रसाल की तलवार जितनी धारदार थी, कलम भी उतनी ही तीक्ष्ण थी । वे स्वयं कवि तो थे ही कवियों का श्रेष्ठतम सम्मान भी करते थे । अद्वितीय उदाहरण है कि कवि भूषणके बुंदेलखंडमें आने पर आगवानीमें जब छत्रसालने उनकी पालकीमें अपना कंधा लगाया था । बुंदेलखंड ही नही संपूर्ण भारत देष ऐसे महान व्यक्तित्व के प्रति कृतज्ञ रहेगा ।



ईस्वी वर्ष ७३५ में सब अरबोंने मिलकर मेवाडपर आक्रमण कर दिया । उस समय सिसोदिया वंशके बाप्पा रावळने उनसे घमासान युद्ध कर उन्हें मार भगाया । उनके प्रांतोंमें जाकर अपना दबदबा निर्माण किया । तथा सर्व अरबोंको अपने अधीन कर लिया । इस युद्धके कारण भारतपर ३०० वर्ष तक आक्रमण न करनेका भय विदेशियोंमें समा गया ।


राणा राणासंग

दिल्लीपर मुगल बादशाह बाबरका राज्य था । उस समय मेवाडके सिसोदिया वंशके राणासंगाका राजस्थान, पंजाब तथा सिंधपर वर्चस्व था । उसने दिल्लीकी विदेशी सत्ता उखाड फेंकनेका प्रयत्न आरंभ किया । बाबर को इसकी भनक लग गई और उसने सन् १५२७ में राणासांगासे घमासान युद्ध कर उन्हें पराजित कर दिया । इस कारण हिंदवी राज्यकी अपेक्षा मुगलोंका राज्य शक्तिशाली हो गया । इतना होनेपर भी बाबरके मनमें राजपूतोंसे भय निर्माण हो गया तथा उसके उपरांत उसने राजपूतोंसे संघर्ष करना छोड दिया । इस पराजयसे निराश न होते हुए राणासांगाने पुनः युद्धकी तैयारी आरंभ की; परंतु दुर्भाग्यवश उनकी मृत्यु हो गई ।
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