राहुल गांधी पर सब्सटेंटिव मोशन की तैयारी, क्या बढ़ेंगी मुश्किलें? ऑपरेशन दुर्योधन की मिसाल फिर चर्चा में
नई दिल्ली | 07 फरवरी 2026
संसद के भीतर राजनीतिक माहौल एक बार फिर गर्म हो गया है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की संसद सदस्यता समाप्त करने और उन पर आजीवन चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की मांग की है। इस संबंध में उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ सब्सटेंटिव मोशन लाने का नोटिस भी दिया है। इस कदम ने संसद और सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
भाजपा सांसद का आरोप है कि राहुल गांधी के हालिया बयानों और आचरण ने सदन की गरिमा और नियमों का उल्लंघन किया है, इसलिए उनके खिलाफ सख्त संसदीय कार्रवाई की जानी चाहिए। हालांकि कांग्रेस और विपक्षी दलों ने इस पहल को राजनीतिक प्रतिशोध बताते हुए इसका विरोध किया है और कहा है कि यह विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश है।
ऑपरेशन दुर्योधन का उदाहरण क्यों चर्चा में?
इस पूरे विवाद के बीच साल 2005 का चर्चित स्टिंग ऑपरेशन ऑपरेशन दुर्योधन फिर चर्चा में आ गया है, जिसे मीडिया संगठन आजतक ने प्रसारित किया था। उस स्टिंग में कथित रूप से सवाल पूछने के बदले पैसे लेते हुए 11 सांसद कैमरे में कैद हुए थे। मामले की जांच के बाद संसद ने कड़ी कार्रवाई करते हुए 11 सांसदों की सदस्यता समाप्त कर दी थी, जिसे संसदीय इतिहास की सबसे सख्त कार्रवाइयों में गिना जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यही मिसाल अब मौजूदा मामले में संदर्भ के रूप में दी जा रही है, हालांकि दोनों मामलों की प्रकृति और कानूनी आधार अलग-अलग हैं।
क्या होता है सब्सटेंटिव मोशन?
संसदीय प्रक्रिया में सब्सटेंटिव मोशन एक औपचारिक प्रस्ताव होता है, जिसके जरिए किसी सदस्य के खिलाफ कार्रवाई की मांग की जा सकती है। इसे स्वीकार या खारिज करने का अधिकार स्पीकर के पास होता है। यदि स्पीकर इसे अनुमति देते हैं, तो सदन में इस पर चर्चा और मतदान की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
सियासी टकराव तेज
कांग्रेस का कहना है कि यह कदम लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है और विपक्ष को निशाना बनाने की रणनीति का हिस्सा है। वहीं भाजपा का दावा है कि संसद की मर्यादा बनाए रखने के लिए नियमों के तहत कार्रवाई की मांग की गई है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि स्पीकर इस नोटिस पर क्या निर्णय लेते हैं। यदि प्रस्ताव स्वीकार होता है, तो यह मामला संसद की कार्यवाही का बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है और आने वाले दिनों में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और बढ़ने की संभावना है।

मुंबई | 22 जनवरी 2026
महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों के चुनाव परिणामों ने राज्य की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं। ‘आज तक’ की रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी-शिंदे (महायुति) गठबंधन की भारी जीत के बीच सबसे ज्यादा चर्चा एकनाथ शिंदे और राज ठाकरे (MNS) के बीच बढ़ती नजदीकियों की हो रही है। जानकारों का मानना है कि यह गठबंधन केवल चुनावी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी ‘अवसरवादी राजनीति’ का हिस्सा है।
1. गठबंधन के पीछे का गणित: शिंदे को राज की जरूरत क्यों?
एकनाथ शिंदे ने अपनी पार्टी की वैधता साबित करने के लिए राज ठाकरे का सहारा लिया है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- बीजेपी पर दबाव: ठाणे और कल्याण-डोंबिवली जैसे इलाकों में शिंदे ने राज ठाकरे की मदद से अपनी संख्या बढ़ाई है। इससे वे बीजेपी को यह संदेश दे रहे हैं कि वे केवल उन पर निर्भर नहीं हैं।
- मराठी कार्ड: उद्धव ठाकरे के ‘मराठी मानुष’ के एजेंडे को काटने के लिए शिंदे और राज ठाकरे का एक साथ आना एक रणनीतिक कदम है।
- किंगमेकर की भूमिका: कल्याण-डोंबिवली में शिंदे की पार्टी (53 सीटें) और राज की MNS (5 सीटें) मिलकर बहुमत के करीब पहुँच रहे हैं, जिससे बीजेपी (50 सीटें) बैकफुट पर आ गई है।
2. ‘अवसरवादी राजनीति’ के आरोप क्यों?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह गठबंधन सिद्धांतों से ज्यादा ‘अस्तित्व की लड़ाई’ पर टिका है:
- विचारधारा का मेल या मजबूरी? राज ठाकरे और एकनाथ शिंदे दोनों ही शिवसेना से निकले नेता हैं। दोनों ही बाला साहेब ठाकरे की विरासत पर दावा ठोकते हैं। लेकिन सत्ता के लिए कभी एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे ये नेता अब साथ खड़े हैं।
- उद्धव ठाकरे को कमजोर करना: इस गठबंधन का सबसे बड़ा लक्ष्य उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) को उसके पारंपरिक गढ़ों (जैसे मुंबई और मध्य मुंबई) से बेदखल करना है।
3. चुनाव परिणामों की बड़ी तस्वीर (2026)
नगर निगमों के ताजा नतीजों ने महायुति का पलड़ा भारी रखा है, लेकिन राज ठाकरे की पार्टी का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है:
4. भविष्य की चुनौती: 2029 की तैयारी?
यह गठबंधन केवल नगर निगम तक सीमित नहीं दिखता। चर्चा है कि एकनाथ शिंदे भविष्य में बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए राज ठाकरे को ‘स्थायी साथी’ के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, राज ठाकरे की ‘पलटवार’ वाली छवि (कभी मोदी के समर्थक, कभी कट्टर विरोधी) इस गठबंधन की स्थिरता पर सवाल भी खड़े करती है।
अहमदाबाद में 12 जून को एक दर्दनाक हादसा हो गया। इस हादसे में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी का निधन हो गया। इस विमान में 242 लोग सवार थे, जिनमें से सिर्फ एक की जान बच सकी। हालांकि विजय रूपाणी पहली हस्ती नहीं हैं, जिन्होंने विमान हादसे में अपनी जान गंवाई है। हवाई हादसों में अपनी जान गंवाने वाले कुछ शीर्ष नेता और प्रमुख हस्तियों की लिस्ट कुछ इस प्रकार है |
होमी जहांगीर भाभा (1966): भारत के अग्रणी परमाणु भौतिक विज्ञानी होमी जहांगीर भाभा की 24 जनवरी, 1966 को एयर इंडिया की उड़ान 101 के दुर्घटनाग्रस्त होने से मृत्यु हो हो गई। जिनेवा हवाई यातायात नियंत्रण के साथ गलत संचार के कारण विमान स्विस आल्प्स पर्वत में दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
संजय गांधी (1980): कांग्रेस नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की 23 जून 1980 को एक हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई। संजय सफदरजंग हवाई अड्डे के पास दिल्ली फ्लाइंग क्लब के एक विमान को उड़ा रहे थे और हवाई कलाबाजी करने का प्रयास करते समय उन्होंने विमान पर से नियंत्रण खो दिया। विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने की वजह से उनकी जान चली गई।
माधव राव सिंधिया (2001): कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माधवराव सिंधिया की मृत्यु 30 सितंबर, 2001 को एक विमान दुर्घटना में हुई थी। वह कानपुर जाने के लिए दस सीट वाले एक निजी विमान में सवार थे जो उत्तर प्रदेश में मैनपुरी के पास खराब मौसम के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। सिंधिया स्वयं पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री थे।
जीएमसी बालयोगी (2002): लोकसभा अध्यक्ष और तेलुगु देशम पार्टी के नेता जीएमसी बालयोगी की तीन मार्च 2002 को एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो गई। हादसे के समय वह आंध्र प्रदेश के पश्चिमी गोदावरी जिले के भीमावरम से आ रहे थे तभी उनका हेलीकॉप्टर कृष्णा जिले के कैकालूर के निकट दुर्घटनाग्रस्त होकर एक तालाब में गिर गया।
साइप्रियन संगमा (2004): मेघालय के ग्रामीण विकास मंत्री साइप्रियन संगमा और नौ अन्य लोग पवन हंस हेलीकॉप्टर से 22 सितंबर 2004 को गुवाहाटी से शिलांग जा रहे थे। इसी बीच उनका हेलीकॉप्टर राज्य की राजधानी से मात्र 20 किलोमीटर दूर बारापानी झील के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिससे उनकी मृत्यु हो गई थी।
के एस सौम्या (2004): सौंदर्या के नाम से मशहूर दक्षिण भारतीय अभिनेत्री के एस सौम्या की 17 अप्रैल 2004 को एक हवाई दुर्घटना में मौत हो गई थी। दुर्घटना के समय ‘सूर्यवंशम’ फिल्म की अभिनेत्री अपने भाई के साथ बेंगलुरु से करीमनगर जा रही थीं।
ओपी जिंदल और सुरेंद्र सिंह (2005): उद्योगपति और हरियाणा के मंत्री ओम प्रकाश जिंदल और कृषि मंत्री सुरेन्द्र सिंह की 2005 में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनका हेलीकॉप्टर दिल्ली से चंडीगढ़ जा रहा था, तभी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
वाई एस रेड्डी (2009): आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी (2009), जिन्हें वाईएसआर के नाम से जाना जाता था, की मृत्यु 2 सितंबर 2009 को एक हेलीकॉप्टर हादसे में हुई। यह हादसा तब हुआ जब उनका बेल 430 हेलीकॉप्टर खराब मौसम के कारण घने नल्लामाला जंगल में दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
दोरजी खांडू (2011): अरुणाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दोरजी खांडू और चार अन्य की 30 अप्रैल 2011 को उस समय मृत्यु हो गई थी, जब उन्हें तवांग से ईटानगर ले जा रहा हेलीकॉप्टर राज्य के पश्चिमी कामेंग जिले में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।
सीडीएस जनरल बिपिन रावत (2021): भारत के पहले प्रमुख रक्षा अध्यक्ष (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत की आठ दिसंबर, 2021 को एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो गई। यह घटना तमिलनाडु के कुन्नूर के पास हुई, जब वह अपनी पत्नी और 11 अन्य लोगों के साथ सुलूर से वेलिंगटन जा रहे थे।



