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पूर्वोत्तर के लिए ऐतिहासिक दिन: केंद्र, असम और नागालैंड के बीच त्रिपक्षीय समझौता; अगले साल 1-2 राज्यों को छोड़ पूरे पूर्वोत्तर से हटेगा AFSPA

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दिनांक: 12 जून, 2026

नई दिल्ली: पूर्वोत्तर भारत (Northeast India) में स्थायी शांति और विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर स्थापित हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में केंद्र सरकार, असम और नागालैंड के बीच एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर गृह मंत्री ने घोषणा की कि अगले साल (2027) तक केवल एक या दो राज्यों को छोड़कर पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम यानी अफ्स्पा (AFSPA) को पूरी तरह से हटा लिया जाएगा।

30 साल पुराना सीमा और तेल विवाद सुलझा

यह त्रिपक्षीय समझौता असम और नागालैंड के बीच विवादित सीमा क्षेत्र (Disputed Area Belt) में खनिज तेल और प्राकृतिक गैस की खोज तथा उनके दोहन को लेकर हुआ है।

  • तीन दशकों का गतिरोध खत्म: क्षेत्राधिकार और कानून-व्यवस्था के मुद्दों के कारण इस क्षेत्र में तेल की खोज का काम पिछले 30 से अधिक वर्षों से पूरी तरह ठप पड़ा था।

  • आर्थिक समृद्धि के खुलेंगे द्वार: इस समझौते के बाद कच्चे तेल की निकासी की क्षमता 1,000-1,500 बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 10 गुना तक हो सकती है। अमित शाह ने बताया कि केवल एक तेल क्षेत्र में ही ₹15,000 करोड़ से अधिक के तेल भंडार मिलने की संभावना है, जो देश की विदेशी तेल पर निर्भरता को कम करेगा।

अगले साल ‘अफ्स्पा मुक्त’ होने की राह पर पूर्वोत्तर

गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि पूर्वोत्तर के जिन इलाकों से अफ्स्पा का दायरा सिकुड़ रहा है, वह इस बात का स्पष्ट प्रतीक है कि क्षेत्र में उग्रवाद खत्म हो रहा है और शांति लौट रही है। उन्होंने कहा, “मुझे पूरा विश्वास है कि अगले साल तक एक या दो राज्यों को छोड़कर, हम पूरे पूर्वोत्तर से अफ्स्पा को वापस ले लेंगे।”

विशेषज्ञों का मानना है कि जिन एक-दो राज्यों में सुरक्षा कारणों से यह कानून अभी लागू रह सकता है, उनमें मुख्य रूप से मणिपुर और नागालैंड के कुछ संवेदनशील हिस्से शामिल हो सकते हैं। वर्तमान में यह कानून असम, नागालैंड, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के कुछ चुनिंदा हिस्सों में ही प्रभावी है।

सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का उत्कृष्ट उदाहरण

इस ऐतिहासिक समझौते के दौरान केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी, असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा और नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो भी मौजूद थे। गृह मंत्री ने दोनों मुख्यमंत्रियों द्वारा दिखाए गए ‘नेशन-फर्स्ट’ (राष्ट्र प्रथम) के जज्बे की सराहना की और इसे सहकारी संघवाद का सबसे बेहतरीन उदाहरण बताया।

साल 2019 के बाद से केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर के विभिन्न उग्रवादी गुटों और राज्य सरकारों के साथ कुल 12 शांति समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में हिंसक घटनाओं में लगभग 80% की भारी कमी दर्ज की गई है।


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TMC में बगावत की असली वजह कौन? ममता या अभिषेक बनर्जी… तृणमूल में उत्तराधिकार की लड़ाई तेज

दिनांक: 4 जून 2026

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) इन दिनों अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर शुरू हुई बगावत ने अब उत्तराधिकार की लड़ाई का रूप ले लिया है। राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह असंतोष ममता बनर्जी के खिलाफ है या फिर उनके भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ। हालिया घटनाक्रम संकेत देते हैं कि पार्टी के अधिकांश असंतुष्ट नेता अभी भी ममता बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार करते हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली और संगठन पर बढ़ते नियंत्रण को लेकर नाराज हैं।

ताजा विवाद तब गहरा गया जब निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने विधानसभा में अलग गुट बनाकर दावा किया कि उनके पास पार्टी के अधिकांश विधायकों का समर्थन है। रिपोर्ट्स के अनुसार करीब 58 से 60 विधायकों ने इस गुट का समर्थन किया और विधानसभा अध्यक्ष से उन्हें अलग विधायी दल के रूप में मान्यता देने की मांग की।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि TMC में लंबे समय से यह चर्चा चल रही थी कि ममता बनर्जी के बाद पार्टी की कमान किसके हाथ में होगी। पिछले कुछ वर्षों में अभिषेक बनर्जी को संगठन और चुनावी रणनीति में बड़ी जिम्मेदारियां दी गईं। युवा नेताओं और पार्टी के एक वर्ग ने इसे स्वाभाविक नेतृत्व परिवर्तन माना, लेकिन कई वरिष्ठ नेताओं को लगा कि पार्टी में निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित होती जा रही है और पुराने नेताओं की भूमिका कम हो रही है।

स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व को सभी संगठनात्मक समितियों और फ्रंटल संगठनों को भंग करने का फैसला लेना पड़ा। इसे पार्टी में बढ़ते असंतोष को नियंत्रित करने और संगठन में व्यापक फेरबदल की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। इस कदम से ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी समेत सभी पदाधिकारियों के संगठनात्मक पद प्रभावी रूप से समाप्त कर दिए गए, ताकि नए सिरे से संरचना तैयार की जा सके।

हालांकि विद्रोही नेताओं का दावा है कि उनका उद्देश्य पार्टी तोड़ना नहीं है। कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि ममता बनर्जी ही उनकी नेता हैं और वे पार्टी को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसके बावजूद घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि TMC के भीतर नेतृत्व और उत्तराधिकार को लेकर गंभीर मतभेद मौजूद हैं।

2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की बड़ी हार के बाद यह संकट और गहरा गया। चुनावी पराजय के बाद संगठन, नेतृत्व शैली और भविष्य की रणनीति को लेकर सवाल उठने लगे। कई नेता मानते हैं कि हार के बाद आत्ममंथन के बजाय नेतृत्व के केंद्रीकरण ने असंतोष को बढ़ाया है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि आने वाले दिनों में यह तय होगा कि TMC इस संकट से उबरकर फिर एकजुट हो पाती है या यह बगावत पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए राजनीतिक समीकरण को जन्म देगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि लड़ाई ममता बनर्जी की लोकप्रियता से ज्यादा पार्टी के भविष्य और अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर है।

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नीतीश कुमार ने MLC पद से दिया इस्तीफा: राज्यसभा सदस्य बनने के बाद उठाया कदम

पटना | 30 मार्च, 2026

बिहार की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम के तहत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधान परिषद (MLC) की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। उनका यह फैसला राज्यसभा सदस्य बनने के बाद लिया गया है, जिससे राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।

29 शब्दों में भेजा इस्तीफा

सूत्रों के अनुसार, नीतीश कुमार ने संक्षिप्त 29 शब्दों का इस्तीफा पत्र भेजा, जिसे उनके सहयोगियों द्वारा विधान परिषद तक पहुंचाया गया। उनका इस्तीफा मंत्री विजय चौधरी और एमएलसी संजय गांधी के माध्यम से संबंधित कार्यालय में जमा कराया गया।

राज्यसभा सदस्य बनने के बाद फैसला

मंत्री विजय चौधरी ने बताया कि नीतीश कुमार अब राज्यसभा के सदस्य हैं, ऐसे में उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता छोड़ने का निर्णय लिया है। यह संवैधानिक और प्रक्रियागत आवश्यकता के तहत उठाया गया कदम माना जा रहा है।

विधानसभा में भी हलचल

इसी बीच, एक अन्य घटनाक्रम में विधायक संजय सरावगी नितिन नवीन का इस्तीफा लेकर विधानसभा पहुंचे, जिससे राज्य की राजनीतिक गतिविधियां और तेज हो गई हैं।

राजनीतिक संकेतों पर चर्चा

नीतीश कुमार के इस कदम को लेकर राजनीतिक विश्लेषक विभिन्न तरह के कयास लगा रहे हैं। हालांकि इसे औपचारिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है, लेकिन राज्यसभा में उनकी सक्रियता को लेकर चर्चाएं जारी हैं।

प्रशासनिक कामकाज पर असर नहीं

सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि इस इस्तीफे का राज्य के प्रशासनिक कामकाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे।


तमिलनाडु 2026: क्या ‘किंगमेकर’ बनेंगे विजय? BJP के साथ गठबंधन की अटकलों पर TVK का बड़ा बयान

चेन्नई | 14 मार्च, 2026

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के करीब आते ही राज्य का सियासी पारा चढ़ गया है। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी TVK को लेकर चल रही गठबंधन की खबरों ने नई बहस छेड़ दी है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, बीजेपी नेतृत्व विजय को NDA पाले में लाने की संभावनाएं तलाश रहा है, लेकिन TVK की ओर से इन दावों पर तीखी प्रतिक्रिया आई है।

गठबंधन की खबरों पर TVK का स्टैंड

13 मार्च 2026 को टीवीके के शीर्ष नेतृत्व और जिला सचिवों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। सूत्रों के मुताबिक:

  • अफवाहों का खंडन: पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने NDA में शामिल होने की खबरों को ‘निराधार अफवाह’ करार दिया है।

  • एकला चलो की रणनीति: विजय ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी राज्य की सभी 234 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।

  • वैचारिक विरोध: विजय पहले ही बीजेपी को अपना “वैचारिक दुश्मन” (Ideological Enemy) और सत्तारूढ़ DMK को अपना “राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी” (Political Adversary) घोषित कर चुके हैं।

BJP की नजर TVK पर क्यों?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी विजय को साथ लाकर तमिलनाडु में अपनी ‘तीसरे मोर्चे’ की ताकत बढ़ाना चाहती है।

  • वोट बैंक का गणित: विजय का युवाओं और महिलाओं के बीच जबरदस्त क्रेज है। बीजेपी को उम्मीद थी कि पवन कल्याण (आंध्र प्रदेश मॉडल) की तरह विजय भी NDA का हिस्सा बनकर द्रविड़ राजनीति के किले में सेंध लगा सकते हैं।

  • त्रिकोणीय मुकाबला: अगर विजय अकेले लड़ते हैं, तो वह केवल DMK ही नहीं, बल्कि विपक्ष (AIADMK और BJP) के वोट बैंक को भी प्रभावित कर सकते हैं।

विजय की ‘विलेक’ और चुनावी वादे

विजय ने हाल ही में महाबलीपुरम में महिला दिवस के अवसर पर कई बड़े लोक-लुभावन वादे किए हैं, जो सीधे तौर पर द्रविड़ दलों के वोट बैंक पर निशाना साधते हैं:

  1. महिलाओं को ₹2,500 प्रति माह की आर्थिक सहायता।

  2. साल में 6 मुफ्त रसोई गैस सिलेंडर।

  3. सरकारी बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा।

बड़ी चुनौती: फंड और उम्मीदवार

भले ही विजय गठबंधन से इनकार कर रहे हों, लेकिन पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि 234 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए भारी-भरकम फंड (लगभग ₹5 करोड़ प्रति सीट का अनुमान) जुटाना एक बड़ी चुनौती है। इसी वजह से पार्टी का एक धड़ा किसी मजबूत गठबंधन (जैसे AIADMK) के साथ जाने के पक्ष में भी चर्चा कर रहा है।


भोपाल किसान महाचौपाल में खड़गे का केंद्र पर हमला, ट्रेड डील और किसानों के मुद्दे पर शिवराज को घेरा

भोपाल | 25  फरवरी 2026

भोपाल के भेल दशहरा मैदान में आयोजित ‘कांग्रेस किसान महाचौपाल’ में मल्लिकार्जुन खड़गे ने केंद्र सरकार और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान पर तीखा हमला बोला। अपने संबोधन में उन्होंने किसानों से जुड़े मुद्दों, व्यापार समझौतों और कृषि नीतियों को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि दिल्ली जाने के बाद नेताओं की आवाज क्यों बदल जाती है और वे किसानों के हितों पर खुलकर क्यों नहीं बोलते।

खड़गे ने आरोप लगाया कि सरकार अंतरराष्ट्रीय ट्रेड डील के नाम पर ऐसी नीतियां बना रही है जिनसे छोटे और मध्यम किसानों को नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि यदि कृषि उत्पादों पर विदेशी प्रतिस्पर्धा बढ़ी तो स्थानीय किसानों की आय पर असर पड़ेगा और खेती का लागत-मुनाफा संतुलन बिगड़ सकता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि किसानों की समस्याओं पर संसद और मंत्रालय स्तर पर ठोस चर्चा नहीं हो रही है।

सभा में मौजूद किसानों और पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए खड़गे ने कहा कि किसानों की आय दोगुनी करने के वादे अब तक अधूरे हैं और कई योजनाओं का लाभ जमीन स्तर तक नहीं पहुंच पाया है। उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य, फसल बीमा, उर्वरक कीमतों और सिंचाई सुविधाओं जैसे मुद्दों पर भी सरकार से जवाब मांगा।

कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस नेताओं ने केंद्र और राज्य की नीतियों की आलोचना करते हुए किसानों के लिए व्यापक नीति सुधार, कर्ज राहत और बाजार समर्थन की मांग उठाई। सभा में बड़ी संख्या में किसानों की मौजूदगी रही, जहां कई प्रतिनिधियों ने मंच से अपनी समस्याएं भी रखीं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा चुनाव के बाद विपक्ष किसानों के मुद्दे को फिर से प्रमुख राजनीतिक एजेंडा बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि सत्तापक्ष अपनी योजनाओं और सुधारों को उपलब्धि के रूप में पेश कर रहा है। ऐसे में आने वाले समय में कृषि नीति और ट्रेड समझौतों पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।


राहुल गांधी पर सब्सटेंटिव मोशन की तैयारी, क्या बढ़ेंगी मुश्किलें? ऑपरेशन दुर्योधन की मिसाल फिर चर्चा में


नई दिल्ली | 07 फरवरी 2026

संसद के भीतर राजनीतिक माहौल एक बार फिर गर्म हो गया है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की संसद सदस्यता समाप्त करने और उन पर आजीवन चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की मांग की है। इस संबंध में उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ सब्सटेंटिव मोशन लाने का नोटिस भी दिया है। इस कदम ने संसद और सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

भाजपा सांसद का आरोप है कि राहुल गांधी के हालिया बयानों और आचरण ने सदन की गरिमा और नियमों का उल्लंघन किया है, इसलिए उनके खिलाफ सख्त संसदीय कार्रवाई की जानी चाहिए। हालांकि कांग्रेस और विपक्षी दलों ने इस पहल को राजनीतिक प्रतिशोध बताते हुए इसका विरोध किया है और कहा है कि यह विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश है।

ऑपरेशन दुर्योधन का उदाहरण क्यों चर्चा में?

इस पूरे विवाद के बीच साल 2005 का चर्चित स्टिंग ऑपरेशन ऑपरेशन दुर्योधन फिर चर्चा में आ गया है, जिसे मीडिया संगठन आजतक ने प्रसारित किया था। उस स्टिंग में कथित रूप से सवाल पूछने के बदले पैसे लेते हुए 11 सांसद कैमरे में कैद हुए थे। मामले की जांच के बाद संसद ने कड़ी कार्रवाई करते हुए 11 सांसदों की सदस्यता समाप्त कर दी थी, जिसे संसदीय इतिहास की सबसे सख्त कार्रवाइयों में गिना जाता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यही मिसाल अब मौजूदा मामले में संदर्भ के रूप में दी जा रही है, हालांकि दोनों मामलों की प्रकृति और कानूनी आधार अलग-अलग हैं।

क्या होता है सब्सटेंटिव मोशन?

संसदीय प्रक्रिया में सब्सटेंटिव मोशन एक औपचारिक प्रस्ताव होता है, जिसके जरिए किसी सदस्य के खिलाफ कार्रवाई की मांग की जा सकती है। इसे स्वीकार या खारिज करने का अधिकार स्पीकर के पास होता है। यदि स्पीकर इसे अनुमति देते हैं, तो सदन में इस पर चर्चा और मतदान की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

सियासी टकराव तेज

कांग्रेस का कहना है कि यह कदम लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है और विपक्ष को निशाना बनाने की रणनीति का हिस्सा है। वहीं भाजपा का दावा है कि संसद की मर्यादा बनाए रखने के लिए नियमों के तहत कार्रवाई की मांग की गई है।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि स्पीकर इस नोटिस पर क्या निर्णय लेते हैं। यदि प्रस्ताव स्वीकार होता है, तो यह मामला संसद की कार्यवाही का बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है और आने वाले दिनों में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और बढ़ने की संभावना है।


 


मुंबई | 22 जनवरी 2026

महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों के चुनाव परिणामों ने राज्य की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं। ‘आज तक’ की रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी-शिंदे (महायुति) गठबंधन की भारी जीत के बीच सबसे ज्यादा चर्चा एकनाथ शिंदे और राज ठाकरे (MNS) के बीच बढ़ती नजदीकियों की हो रही है। जानकारों का मानना है कि यह गठबंधन केवल चुनावी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी ‘अवसरवादी राजनीति’ का हिस्सा है।

1. गठबंधन के पीछे का गणित: शिंदे को राज की जरूरत क्यों?

एकनाथ शिंदे ने अपनी पार्टी की वैधता साबित करने के लिए राज ठाकरे का सहारा लिया है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • बीजेपी पर दबाव: ठाणे और कल्याण-डोंबिवली जैसे इलाकों में शिंदे ने राज ठाकरे की मदद से अपनी संख्या बढ़ाई है। इससे वे बीजेपी को यह संदेश दे रहे हैं कि वे केवल उन पर निर्भर नहीं हैं।
  • मराठी कार्ड: उद्धव ठाकरे के ‘मराठी मानुष’ के एजेंडे को काटने के लिए शिंदे और राज ठाकरे का एक साथ आना एक रणनीतिक कदम है।
  • किंगमेकर की भूमिका: कल्याण-डोंबिवली में शिंदे की पार्टी (53 सीटें) और राज की MNS (5 सीटें) मिलकर बहुमत के करीब पहुँच रहे हैं, जिससे बीजेपी (50 सीटें) बैकफुट पर आ गई है।

2. ‘अवसरवादी राजनीति’ के आरोप क्यों?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह गठबंधन सिद्धांतों से ज्यादा ‘अस्तित्व की लड़ाई’ पर टिका है:

  • विचारधारा का मेल या मजबूरी? राज ठाकरे और एकनाथ शिंदे दोनों ही शिवसेना से निकले नेता हैं। दोनों ही बाला साहेब ठाकरे की विरासत पर दावा ठोकते हैं। लेकिन सत्ता के लिए कभी एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे ये नेता अब साथ खड़े हैं।
  • उद्धव ठाकरे को कमजोर करना: इस गठबंधन का सबसे बड़ा लक्ष्य उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) को उसके पारंपरिक गढ़ों (जैसे मुंबई और मध्य मुंबई) से बेदखल करना है।

3. चुनाव परिणामों की बड़ी तस्वीर (2026)

नगर निगमों के ताजा नतीजों ने महायुति का पलड़ा भारी रखा है, लेकिन राज ठाकरे की पार्टी का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है:

4. भविष्य की चुनौती: 2029 की तैयारी?

यह गठबंधन केवल नगर निगम तक सीमित नहीं दिखता। चर्चा है कि एकनाथ शिंदे भविष्य में बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए राज ठाकरे को ‘स्थायी साथी’ के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, राज ठाकरे की ‘पलटवार’ वाली छवि (कभी मोदी के समर्थक, कभी कट्टर विरोधी) इस गठबंधन की स्थिरता पर सवाल भी खड़े करती है।

 

अहमदाबाद में 12 जून को एक दर्दनाक हादसा हो गया। इस हादसे में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी का निधन हो गया। इस विमान में 242 लोग सवार थे, जिनमें से सिर्फ एक की जान बच सकी। हालांकि विजय रूपाणी पहली हस्ती नहीं हैं, जिन्होंने विमान हादसे में अपनी जान गंवाई है। हवाई हादसों में अपनी जान गंवाने वाले कुछ शीर्ष नेता और प्रमुख हस्तियों की लिस्ट कुछ इस प्रकार है |

होमी जहांगीर भाभा (1966): भारत के अग्रणी परमाणु भौतिक विज्ञानी होमी जहांगीर भाभा की 24 जनवरी, 1966 को एयर इंडिया की उड़ान 101 के दुर्घटनाग्रस्त होने से मृत्यु हो हो गई। जिनेवा हवाई यातायात नियंत्रण के साथ गलत संचार के कारण विमान स्विस आल्प्स पर्वत में दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

संजय गांधी (1980): कांग्रेस नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की 23 जून 1980 को एक हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई। संजय सफदरजंग हवाई अड्डे के पास दिल्ली फ्लाइंग क्लब के एक विमान को उड़ा रहे थे और हवाई कलाबाजी करने का प्रयास करते समय उन्होंने विमान पर से नियंत्रण खो दिया। विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने की वजह से उनकी जान चली गई।

माधव राव सिंधिया (2001): कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माधवराव सिंधिया की मृत्यु 30 सितंबर, 2001 को एक विमान दुर्घटना में हुई थी। वह कानपुर जाने के लिए दस सीट वाले एक निजी विमान में सवार थे जो उत्तर प्रदेश में मैनपुरी के पास खराब मौसम के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। सिंधिया स्वयं पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री थे।

जीएमसी बालयोगी (2002): लोकसभा अध्यक्ष और तेलुगु देशम पार्टी के नेता जीएमसी बालयोगी की तीन मार्च 2002 को एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो गई। हादसे के समय वह आंध्र प्रदेश के पश्चिमी गोदावरी जिले के भीमावरम से आ रहे थे तभी उनका हेलीकॉप्टर कृष्णा जिले के कैकालूर के निकट दुर्घटनाग्रस्त होकर एक तालाब में गिर गया।

साइप्रियन संगमा (2004): मेघालय के ग्रामीण विकास मंत्री साइप्रियन संगमा और नौ अन्य लोग पवन हंस हेलीकॉप्टर से 22 सितंबर 2004 को गुवाहाटी से शिलांग जा रहे थे। इसी बीच उनका हेलीकॉप्टर राज्य की राजधानी से मात्र 20 किलोमीटर दूर बारापानी झील के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिससे उनकी मृत्यु हो गई थी।

के एस सौम्या (2004): सौंदर्या के नाम से मशहूर दक्षिण भारतीय अभिनेत्री के एस सौम्या की 17 अप्रैल 2004 को एक हवाई दुर्घटना में मौत हो गई थी। दुर्घटना के समय ‘सूर्यवंशम’ फिल्म की अभिनेत्री अपने भाई के साथ बेंगलुरु से करीमनगर जा रही थीं।

ओपी जिंदल और सुरेंद्र सिंह (2005): उद्योगपति और हरियाणा के मंत्री ओम प्रकाश जिंदल और कृषि मंत्री सुरेन्द्र सिंह की 2005 में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनका हेलीकॉप्टर दिल्ली से चंडीगढ़ जा रहा था, तभी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

वाई एस रेड्डी (2009): आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी (2009), जिन्हें वाईएसआर के नाम से जाना जाता था, की मृत्यु 2 सितंबर 2009 को एक हेलीकॉप्टर हादसे में हुई। यह हादसा तब हुआ जब उनका बेल 430 हेलीकॉप्टर खराब मौसम के कारण घने नल्लामाला जंगल में दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

दोरजी खांडू (2011): अरुणाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दोरजी खांडू और चार अन्य की 30 अप्रैल 2011 को उस समय मृत्यु हो गई थी, जब उन्हें तवांग से ईटानगर ले जा रहा हेलीकॉप्टर राज्य के पश्चिमी कामेंग जिले में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।

सीडीएस जनरल बिपिन रावत (2021): भारत के पहले प्रमुख रक्षा अध्यक्ष (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत की आठ दिसंबर, 2021 को एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो गई। यह घटना तमिलनाडु के कुन्नूर के पास हुई, जब वह अपनी पत्नी और 11 अन्य लोगों के साथ सुलूर से वेलिंगटन जा रहे थे।

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