नई दिल्ली | 7 सितंबर 2026
अजा एकादशी पर पढ़ें राजा हरिश्चंद्र की पौराणिक कथा
हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। साल 2026 में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी के रूप में मनाया जा रहा है। इस बार अजा एकादशी का व्रत सोमवार, 7 सितंबर 2026 को रखा जा रहा है। पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 6 सितंबर की शाम शुरू हुई और 7 सितंबर की शाम तक रहेगी। सूर्योदय के समय एकादशी तिथि होने के कारण व्रत 7 सितंबर को रखा जा रहा है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने, व्रत रखने और अजा एकादशी की कथा सुनने या पढ़ने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति मिलती है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
क्या है अजा एकादशी?
अजा एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी है। इसे कुछ परंपराओं में अन्नदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक परंपरा में यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है।
मान्यता है कि एकादशी के दिन उपवास, भगवान विष्णु का ध्यान, मंत्र जाप, पूजा-पाठ और कथा श्रवण करने से मन को शांति मिलती है। श्रद्धालु इस दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु से सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना करते हैं।
अजा एकादशी की व्रत कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में राजा हरिश्चंद्र एक प्रतापी और धर्मपरायण राजा थे। वे अपनी सत्यनिष्ठा और वचन के लिए प्रसिद्ध थे। उनके राज्य में सुख-समृद्धि थी और प्रजा भी अपने राजा से प्रसन्न रहती थी।
लेकिन समय ने अचानक ऐसी करवट ली कि राजा हरिश्चंद्र को अपना राज्य, धन-संपत्ति और परिवार तक छोड़ना पड़ा। परिस्थितियां इतनी कठिन हो गईं कि उन्हें अपना जीवन चलाने के लिए एक चांडाल के यहां दास के रूप में काम करना पड़ा।
इसके बावजूद राजा हरिश्चंद्र ने सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी उन्होंने अपने कर्तव्य और सत्य के साथ समझौता नहीं किया।
गौतम ऋषि ने बताया अजा एकादशी का महत्व
कथा के अनुसार, इसी कठिन दौर में एक दिन राजा हरिश्चंद्र की मुलाकात गौतम ऋषि से हुई। राजा ने ऋषि को प्रणाम किया और अपने जीवन में आई परेशानियों के बारे में बताया।
राजा की स्थिति जानकर गौतम ऋषि ने उन्हें भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी। ऋषि ने बताया कि यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और श्रद्धापूर्वक इसका पालन करने से व्यक्ति के संकट दूर हो सकते हैं।
राजा हरिश्चंद्र ने ऋषि की सलाह मानते हुए विधि-विधान से अजा एकादशी का व्रत किया और भगवान विष्णु की आराधना की।
व्रत के प्रभाव से वापस मिला खोया हुआ सब कुछ
पौराणिक मान्यता के अनुसार, अजा एकादशी के व्रत और भगवान विष्णु की भक्ति के प्रभाव से राजा हरिश्चंद्र के जीवन के सभी कष्ट दूर हो गए।
कथा में बताया गया है कि उन्हें अपना खोया हुआ राज्य, धन-संपत्ति और परिवार वापस प्राप्त हो गया। अंत में भगवान विष्णु की कृपा से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई और वे वैकुण्ठ धाम चले गए।
इसी वजह से धार्मिक मान्यताओं में अजा एकादशी को संकटों से मुक्ति और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने वाला महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है।
अजा एकादशी पर कैसे करें भगवान विष्णु की पूजा?
अजा एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ कपड़े पहनने और व्रत का संकल्प लेने की परंपरा है।
इसके बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई करके भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। भगवान विष्णु को पीले फूल, फल, पीले वस्त्र और तुलसी दल अर्पित किए जाते हैं। घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और मंत्र जाप किया जाता है।
पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। शाम के समय भगवान विष्णु की आरती और विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया जा सकता है। अजा एकादशी की व्रत कथा पढ़ना या सुनना भी धार्मिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
अजा एकादशी पर क्या खाएं?
एकादशी व्रत में सामान्य तौर पर अनाज, चावल, गेहूं, दाल और अनाज से बने भोजन से परहेज किया जाता है। व्रत रखने वाले लोग अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण कर सकते हैं।
फल, दूध और दूध से बनी चीजों का सेवन किया जाता है। कुछ लोग व्रत के दौरान साबूदाना, सिंघाड़ा, शकरकंद और आलू जैसे खाद्य पदार्थ भी खाते हैं। हालांकि, व्रत के खान-पान की परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकती है।
अजा एकादशी का पारण कब होगा?
अजा एकादशी का व्रत अगले दिन यानी 8 सितंबर 2026, मंगलवार को द्वादशी तिथि में खोला जाएगा।
नई दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार पारण का समय सुबह 6:02 बजे से 10:13 बजे तक बताया गया है। हालांकि अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और तिथि के आधार पर पारण के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।
अजा एकादशी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अजा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की भक्ति, आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना से जुड़ा है। श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं और जीवन में सुख-शांति की कामना करते हैं।
राजा हरिश्चंद्र की कथा इस व्रत के साथ सत्य, धर्म और धैर्य का संदेश भी जोड़ती है। कथा का मूल भाव यह है कि कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति को सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
मान्यता के अनुसार, व्रत के साथ कथा का श्रवण या पाठ करने से धार्मिक रूप से व्रत का महत्व और बढ़ जाता है।
अजा एकादशी पर किन बातों का रखें ध्यान?
अजा एकादशी पर सात्विकता और संयम का पालन करने की परंपरा है। श्रद्धालुओं को अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही व्रत रखना चाहिए। कठोर उपवास हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं है।
धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु का ध्यान, मंत्र जाप, कथा-पाठ, पूजा और जरूरतमंद लोगों को दान करना शुभ माना जाता है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या, गर्भावस्था या नियमित दवा लेने की स्थिति में बिना चिकित्सकीय सलाह के कठोर उपवास नहीं करना चाहिए।
क्यों खास है इस बार की अजा एकादशी?
इस बार अजा एकादशी 7 सितंबर 2026, सोमवार को पड़ रही है। एकादशी तिथि 6 सितंबर की शाम करीब 7:29 बजे शुरू हुई और 7 सितंबर की शाम करीब 5:03 बजे समाप्त होगी। सूर्योदय के समय एकादशी तिथि होने के कारण व्रत 7 सितंबर को ही रखा जा रहा है।
ऐसे में देशभर में भगवान विष्णु के भक्त आज व्रत रखकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं। मंदिरों और घरों में विष्णु पूजा, मंत्र जाप और कथा श्रवण का आयोजन किया जा रहा है।
अजा एकादशी की पौराणिक कथा राजा हरिश्चंद्र के माध्यम से सत्य, धैर्य और भक्ति का संदेश देती है। यही वजह है कि इस दिन भगवान विष्णु की आराधना के साथ इस कथा को पढ़ने और सुनने की परंपरा भी विशेष मानी जाती है।
रक्षाबंधन पर चंद्र ग्रहण का साया, भारत में नहीं लगेगा सूतक; जानें राखी बांधने पर क्या होगा असर
नई दिल्ली, 24 अगस्त 2026
इस साल रक्षाबंधन का त्योहार एक खास खगोलीय घटना के बीच मनाया जाएगा। 28 अगस्त 2026 को रक्षाबंधन के दिन साल का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। रक्षाबंधन और चंद्र ग्रहण के एक ही दिन पड़ने की वजह से लोगों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या ग्रहण के कारण राखी बांधने का समय बदलेगा और क्या भारत में सूतक काल मान्य होगा।
हालांकि, भारतीयों के लिए राहत की बात यह है कि 28 अगस्त का चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आम तौर पर सूतक काल उसी स्थान पर मान्य माना जाता है जहां ग्रहण दिखाई देता है। ऐसे में भारत में इस ग्रहण का सूतक लागू नहीं माना जाएगा और रक्षाबंधन के धार्मिक अनुष्ठान सामान्य रूप से किए जा सकेंगे।
28 अगस्त को रक्षाबंधन और चंद्र ग्रहण का संयोग
हिंदू पंचांग के अनुसार इस बार रक्षाबंधन 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। यह पर्व श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है और इसी दिन चंद्र ग्रहण भी पड़ रहा है।
यानी एक ही दिन जहां भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाएगा, वहीं दूसरी ओर आसमान में चंद्र ग्रहण की खगोलीय घटना होगी। इस संयोग ने धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से लोगों की दिलचस्पी बढ़ा दी है।
भारत में नहीं दिखाई देगा चंद्र ग्रहण
28 अगस्त को लगने वाला चंद्र ग्रहण भारत से दिखाई नहीं देगा। ग्रहण के दौरान भारत में दिन का समय होगा और चंद्रमा की स्थिति ऐसी होगी कि भारतीय क्षेत्र से इस खगोलीय घटना का प्रत्यक्ष अवलोकन नहीं किया जा सकेगा।
रिपोर्टों के मुताबिक यह ग्रहण मुख्य रूप से अमेरिका, यूरोप के कुछ हिस्सों, अफ्रीका और पश्चिम एशिया समेत कई क्षेत्रों में दिखाई देगा। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी दृश्यता अलग हो सकती है।
भारत में सूतक काल क्यों नहीं लगेगा?
चंद्र ग्रहण को लेकर सबसे ज्यादा सवाल सूतक काल को लेकर है। धार्मिक परंपराओं में ग्रहण से पहले का एक निश्चित समय सूतक माना जाता है, लेकिन इसकी मान्यता ग्रहण की दृश्यता से जुड़ी मानी जाती है।
चूंकि 28 अगस्त का चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए भारत में इसका सूतक काल मान्य नहीं होगा। इसका मतलब यह है कि भारत में रक्षाबंधन के दिन ग्रहण के कारण पूजा-पाठ या राखी बांधने पर किसी तरह की रोक नहीं होगी।
क्या राखी बांधने का समय बदलेगा?
भारत में ग्रहण दिखाई नहीं देने के कारण रक्षाबंधन के कार्यक्रम पर चंद्र ग्रहण का सीधा धार्मिक प्रभाव नहीं माना जा रहा है। इसलिए बहनें सामान्य रूप से शुभ मुहूर्त में भाई की कलाई पर राखी बांध सकती हैं।
हालांकि, रक्षाबंधन के दिन भद्रा काल और अन्य शुभ-अशुभ समय का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है। यानी राखी बांधने के लिए ग्रहण की वजह से नहीं, बल्कि पंचांग में बताए गए शुभ समय के अनुसार मुहूर्त देखना महत्वपूर्ण रहेगा।
ग्रहण का भारतीय समय क्या रहेगा?
रिपोर्टों के अनुसार चंद्र ग्रहण भारतीय समय के मुताबिक सुबह करीब 8:05 बजे शुरू होगा और लगभग 11:22 बजे तक रहेगा। इसका मध्यकाल लगभग सुबह 9:43 बजे के आसपास बताया गया है।
लेकिन भारत में इस दौरान ग्रहण दिखाई नहीं देगा। इसलिए यहां रहने वाले लोगों को इसे प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर नहीं मिलेगा और धार्मिक दृष्टि से भी यहां इसका सूतक मान्य नहीं होगा।
विदेश में रहने वाले भारतीयों के लिए अलग स्थिति
भारत में ग्रहण दिखाई नहीं देगा, लेकिन दुनिया के कुछ दूसरे हिस्सों में रहने वाले भारतीय इसे देख सकेंगे। ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए वहां की स्थानीय दृश्यता और धार्मिक परंपराओं के अनुसार नियम अलग हो सकते हैं।
Aaj Tak की रिपोर्ट के मुताबिक, जिन क्षेत्रों में ग्रहण दिखाई देगा, वहां रहने वाले भारतीयों को स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूतक और अन्य नियमों का पालन करना पड़ सकता है।
साल 2026 का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण
28 अगस्त को होने वाला यह ग्रहण 2026 का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण है। इससे पहले भी इस साल एक चंद्र ग्रहण हो चुका है।
इस ग्रहण की खासियत यह है कि यह रक्षाबंधन के दिन पड़ रहा है। इसी वजह से खगोलीय घटना के साथ-साथ धार्मिक दृष्टि से भी इसे लेकर लोगों में काफी उत्सुकता है।
क्या मंदिरों के कपाट बंद होंगे?
भारत में ग्रहण दिखाई नहीं देने के कारण सामान्य तौर पर इस ग्रहण के चलते मंदिरों के कपाट बंद करने या पूजा-पाठ रोकने की स्थिति नहीं बनेगी।
रिपोर्टों में स्पष्ट किया गया है कि भारत में ग्रहण की दृश्यता नहीं होने के कारण यहां ग्रहण से जुड़े सामान्य धार्मिक प्रतिबंध लागू नहीं होंगे। इसलिए रक्षाबंधन के दिन पूजा-पाठ और धार्मिक गतिविधियां सामान्य तरीके से की जा सकती हैं।
रक्षाबंधन पर क्या करें?
भारत में रहने वाले लोगों के लिए रक्षाबंधन को लेकर किसी विशेष ग्रहण संबंधी बदलाव की आवश्यकता नहीं बताई जा रही है। बहनें शुभ मुहूर्त में भाई को राखी बांध सकती हैं और परिवार के साथ सामान्य रूप से पर्व मना सकते हैं।
हालांकि, धार्मिक परंपराओं का पालन करने वाले लोग भद्रा काल, राखी बांधने के शुभ मुहूर्त और स्थानीय पंचांग को ध्यान में रख सकते हैं।
खगोलीय घटना और धार्मिक मान्यता में अंतर
चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है, जिसमें पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है। वहीं सूतक और ग्रहण से जुड़े धार्मिक नियम परंपरागत मान्यताओं का हिस्सा हैं।
इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि से ग्रहण की दृश्यता और धार्मिक दृष्टि से सूतक की मान्यता को अलग-अलग समझना जरूरी है। भारत में इस बार ग्रहण दिखाई नहीं देने की वजह से धार्मिक नियमों के लिहाज से सूतक लागू नहीं माना जा रहा है।

श्रावण मास 2026: कब शुरू होगा सावन और कब पड़ेंगे चारों सोमवार?
नई दिल्ली | 8 जुलाई 2026
भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित श्रावण (सावन) मास का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। इस पवित्र महीने में शिव भक्त व्रत, जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। वर्ष 2026 में सावन का महीना 29 जुलाई 2026 (बुधवार) से प्रारंभ होकर 27 अगस्त 2026 (गुरुवार) तक रहेगा। इस दौरान शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है।
सावन 2026 में कितने पड़ेंगे श्रावणी सोमवार?
वर्ष 2026 में सावन के दौरान कुल 4 श्रावणी सोमवार पड़ेंगे।
- पहला सोमवार: 3 अगस्त 2026
- दूसरा सोमवार: 10 अगस्त 2026
- तीसरा सोमवार: 17 अगस्त 2026
- चौथा सोमवार: 24 अगस्त 2026
श्रावण सोमवार के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक, बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और पंचामृत अर्पित करने की विशेष परंपरा है।
सावन का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय निकले विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया था। इसके बाद देवताओं ने उन्हें जल अर्पित कर विष की तपन को शांत किया। तभी से सावन मास में शिवलिंग पर जलाभिषेक की परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि इस महीने श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान शिव की पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन में शुभ फल प्राप्त होते हैं।
कांवड़ यात्रा की तैयारी
सावन शुरू होने के साथ ही देशभर में कांवड़ यात्रा भी प्रारंभ होती है। लाखों शिवभक्त पवित्र नदियों से जल लाकर शिव मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार सहित कई राज्यों में प्रशासन विशेष सुरक्षा और यातायात व्यवस्थाएं करता है।
पूजा के दौरान रखें इन बातों का ध्यान
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और भस्म अर्पित करें।
- “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें।
- सात्विक भोजन करें और क्रोध व नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
- जरूरतमंदों की सहायता और दान-पुण्य को भी शुभ माना जाता है।
नोट: तिथियों में विभिन्न पंचांगों (अमांत और पूर्णिमांत परंपरा) के अनुसार क्षेत्रीय अंतर हो सकता है। स्थानीय पंचांग या मंदिर समिति द्वारा जारी तिथियों का भी पालन किया जा सकता है।
जुलाई 2026 में व्यतिपात योग, ज्योतिषियों ने दी सतर्क रहने की सलाह
नई दिल्ली | 24 जून 2026
वैदिक ज्योतिष में व्यतिपात योग को महत्वपूर्ण लेकिन चुनौतीपूर्ण योगों में गिना जाता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार जुलाई 2026 की शुरुआत में बनने वाला व्यतिपात योग कुछ राशियों के लिए सावधानी बरतने का संकेत दे रहा है। माना जाता है कि इस दौरान जल्दबाजी में लिए गए निर्णय, आर्थिक जोखिम और विवादों से बचना चाहिए।
ज्योतिष शास्त्र में व्यतिपात योग को 27 प्रमुख योगों में से एक माना गया है। यह योग तब बनता है जब सूर्य और चंद्रमा की विशेष खगोलीय स्थिति बनती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में शुभ कार्यों को टालने और पूजा-पाठ, ध्यान तथा संयम पर अधिक ध्यान देने की सलाह दी जाती है।
इन राशियों को रहना होगा विशेष सावधान
मेष राशि
व्यतिपात योग के दौरान मेष राशि के जातकों को कार्यक्षेत्र में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी। किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय को जल्दबाजी में लेने से बचें। आर्थिक मामलों में सोच-समझकर निवेश करें।
वृषभ राशि
वृषभ राशि वालों के लिए अनावश्यक खर्च बढ़ सकते हैं। पारिवारिक मामलों में धैर्य बनाए रखने की आवश्यकता होगी। विवादों से दूरी बनाकर रखें।
सिंह राशि
सिंह राशि के लोगों को कार्यस्थल पर सहकर्मियों के साथ तालमेल बनाकर चलने की सलाह दी गई है। किसी भी प्रकार की बहस या टकराव से बचना लाभकारी रहेगा।
वृश्चिक राशि
वृश्चिक राशि के जातकों को स्वास्थ्य के प्रति विशेष ध्यान देने की आवश्यकता हो सकती है। यात्रा के दौरान सावधानी बरतें और जोखिम भरे कार्यों से दूरी बनाए रखें।
मकर राशि
मकर राशि वालों को आर्थिक लेन-देन में सतर्क रहने की जरूरत है। बड़े निवेश या नई योजनाओं पर निर्णय लेने से पहले विशेषज्ञों की सलाह लेना उचित रहेगा।
क्या करें और क्या न करें
- महत्वपूर्ण निर्णय सोच-समझकर लें।
- अनावश्यक विवादों से बचें।
- धार्मिक कार्यों और ध्यान में समय दें।
- बड़े निवेश और जोखिम भरे सौदों से बचें।
- वाहन चलाते समय अतिरिक्त सावधानी रखें।
- सकारात्मक सोच बनाए रखें।
ज्योतिषाचार्यों की सलाह
विशेषज्ञों का मानना है कि व्यतिपात योग का प्रभाव सभी लोगों पर समान नहीं होता। किसी व्यक्ति की कुंडली, ग्रह दशा और गोचर के आधार पर इसका प्रभाव अलग-अलग हो सकता है। इसलिए घबराने के बजाय सतर्कता और विवेक के साथ कार्य करना सबसे बेहतर उपाय माना जाता है।

शुक्रवार को करें अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का पाठ, मां लक्ष्मी की कृपा से जीवन में आएंगी सुख-समृद्धि, मजबूत होगी आर्थिक स्थिति
05 जून 2026
हिंदू मान्यताओं के अनुसार शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। इस दिन अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से धन, वैभव, ज्ञान, साहस, अन्न, संतान, विजय और समृद्धि की प्राप्ति होने की मान्यता है।
अष्टलक्ष्मी कौन हैं?
अष्टलक्ष्मी, देवी लक्ष्मी के आठ स्वरूप माने जाते हैं, जो जीवन की अलग-अलग प्रकार की समृद्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं:
- आदि लक्ष्मी
- धन लक्ष्मी
- धान्य लक्ष्मी
- गज लक्ष्मी
- संतान लक्ष्मी
- वीर/धैर्य लक्ष्मी
- विजय लक्ष्मी
- विद्या लक्ष्मी
स्तोत्र पाठ का महत्व
धार्मिक मान्यता है कि अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का नियमित पाठ करने से:
- आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
- घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
- नकारात्मकता दूर होती है।
- जीवन में सफलता और आत्मविश्वास बढ़ता है।
शुक्रवार को क्या करने की सलाह दी जाती है?
- मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करें।
- “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र का जप करें।
- घर और पूजा स्थल की स्वच्छता बनाए रखें।
- सुगंधित पुष्प, चंदन या इत्र अर्पित करें।
ध्यान देने वाली बात
अष्टलक्ष्मी स्तोत्र और उससे जुड़े लाभ धार्मिक आस्था एवं परंपरागत मान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में देखा जाता है, न कि आर्थिक सफलता की गारंटी के रूप में।
यदि चाहें तो मैं अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का संक्षिप्त पाठ, हिंदी अर्थ और शुक्रवार की पूजा-विधि भी बता सकता हूँ।

श्री हुलिगेम्मा देवी जात्रा महोत्सव शुरू, कर्नाटक के कोप्पल में उमड़ रही श्रद्धालुओं की भारी भीड़
11 मई 2026 | कर्नाटक
Sri Huligemma Devi Temple में सोमवार से “श्री हुलिगेम्मा देवी जात्रा महोत्सव” की शुरुआत हो गई। कर्नाटक के कोप्पल जिले के हुलिगी गांव में आयोजित होने वाला यह महोत्सव दक्षिण भारत के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में माना जाता है। प्रशासन के अनुसार इस वर्ष उत्सव के दौरान लगभग 35 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।
मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों को विशेष रोशनी और सजावट से आकर्षक बनाया गया है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा, यातायात और सुविधाओं के व्यापक इंतजाम किए हैं।
14 मई तक चलेंगे मुख्य धार्मिक आयोजन
महोत्सव के मुख्य कार्यक्रम 11 मई से 14 मई 2026 तक आयोजित किए जाएंगे, हालांकि धार्मिक गतिविधियां और भक्तिमय आयोजन इससे अधिक समय तक चलते रहेंगे।
विशेष रूप से महारथोत्सव के दिन करीब 3 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना जताई गई है। इस दौरान देवी के रथ उत्सव और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान मुख्य आकर्षण रहेंगे।
सांसद के. राजशेखर बसवराज हितनाल ने दी तैयारियों की जानकारी
महोत्सव की तैयारियों को लेकर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में K. Rajashekar Basavaraj Hitnal ने बताया कि श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बड़े स्तर पर व्यवस्थाएं की गई हैं।
उन्होंने कहा कि प्रशासन, मंदिर समिति और स्थानीय विभाग मिलकर आयोजन को सुव्यवस्थित तरीके से संचालित करने में जुटे हुए हैं।
महादसोहा कार्यक्रम में श्रद्धालुओं को मिलेगा निःशुल्क भोजन
महोत्सव का प्रमुख आकर्षण “महादसोहा” कार्यक्रम है, जिसके अंतर्गत प्रतिदिन हजारों श्रद्धालुओं को निःशुल्क भोजन कराया जाएगा। दक्षिण भारतीय मंदिर परंपरा में दसोहा सेवा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
मंदिर परिसर में भोजन वितरण के लिए विशेष व्यवस्था की गई है ताकि बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो।
मंदिर परिसर में विशेष रोशनी और सजावट
महोत्सव के अवसर पर मंदिर क्षेत्र को भव्य रोशनी और सजावट से सजाया गया है। रात के समय मंदिर परिसर की आकर्षक प्रकाश व्यवस्था श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
इसके अलावा प्रशासन ने सड़क मरम्मत, पार्किंग व्यवस्था, सार्वजनिक सुविधाओं और भीड़ नियंत्रण के लिए भी व्यापक इंतजाम किए हैं।
सुरक्षा के लिए लगाए गए CCTV और विशेष निगरानी दल
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया गया है। प्रशासन की ओर से मंदिर क्षेत्र में CCTV कैमरे लगाए गए हैं और अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है।
इसके साथ ही कंट्रोल रूम, बैरिकेडिंग सिस्टम और विशेष भीड़ निगरानी दल भी बनाए गए हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति से तुरंत निपटा जा सके।
भगदड़ जैसी स्थिति रोकने के लिए विशेष उपाय
पिछले वर्षों में धार्मिक आयोजनों के दौरान भीड़ बढ़ने से अव्यवस्था की स्थिति सामने आने के बाद इस बार प्रशासन ने अतिरिक्त सावधानी बरती है।
भीड़ नियंत्रण के लिए अतिक्रमण हटाए गए हैं, अलग-अलग प्रवेश मार्ग बनाए गए हैं और कई स्थानों पर यातायात प्रतिबंध लागू किए गए हैं। प्रशासन का उद्देश्य अत्यधिक भीड़ और भगदड़ जैसी स्थिति से बचाव करना है।
विभिन्न शहरों से पहुंच रहे श्रद्धालु
महोत्सव में शामिल होने के लिए श्रद्धालु कर्नाटक सहित आसपास के राज्यों से बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। विशेष रूप से हुबली, गडग, बल्लारी और होसपेटे से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या अधिक बताई जा रही है।
उत्सव के दौरान ट्रेनों और बसों की आवाजाही में भी काफी वृद्धि देखी गई है।
तुंगभद्रा नदी स्नान के बाद करते हैं देवी दर्शन
परंपरा के अनुसार बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहले तुंगभद्रा नदी में स्नान करते हैं और उसके बाद देवी हुलिगेम्मा के दर्शन के लिए मंदिर पहुंचते हैं। इसे धार्मिक रूप से अत्यंत शुभ माना जाता है।
महिला श्रद्धालुओं की संख्या में बढ़ोतरी
प्रशासन के अनुसार इस वर्ष महिला श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल रही है। इसके पीछे कर्नाटक सरकार की “शक्ति” योजना को भी एक प्रमुख कारण माना जा रहा है, जिसके अंतर्गत महिलाओं को राज्य परिवहन बसों में निःशुल्क यात्रा की सुविधा दी जा रही है।
देवी हुलिगेम्मा की धार्मिक मान्यता
Sri Huligemma Devi Temple को उत्तर कर्नाटक का प्रमुख शक्ति उपासना केंद्र माना जाता है। देवी हुलिगेम्मा को ग्राम देवी, रक्षक शक्ति और मां दुर्गा के स्वरूप के रूप में पूजा जाता है।
कर्नाटक के अलावा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के श्रद्धालुओं में भी इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था देखने को मिलती है।




