आस्था और संस्कृति

गणेश चतुर्थी 2026: 11 बजे से डेढ़ बजे तक बप्पा की स्थापना, जानें राहुकाल और पूजा का समय

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नई दिल्ली | 14 सितंबर 2026

आज देशभर में गणेश चतुर्थी का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भक्त भगवान गणेश की प्रतिमा घरों और सार्वजनिक पंडालों में स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन को गणपति बप्पा के स्वागत के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

इस वर्ष गणेश चतुर्थी 14 सितंबर 2026, सोमवार को मनाई जा रही है। गणपति स्थापना और पूजा के लिए मध्याह्न काल को विशेष महत्व दिया जाता है। दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार इस दिन सुबह 11:02 बजे से दोपहर 1:31 बजे तक गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त रहेगा। यानी भक्तों के पास बप्पा की स्थापना के लिए करीब ढाई घंटे का समय रहेगा।

आज ही क्यों मनाई जा रही है गणेश चतुर्थी?

हिंदू पंचांग के अनुसार गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है।

2026 में चतुर्थी तिथि 14 सितंबर की सुबह करीब 7 बजे के बाद शुरू होकर 15 सितंबर की सुबह तक रहने वाली है। गणेश चतुर्थी की पूजा के लिए मध्याह्न में चतुर्थी तिथि का होना महत्वपूर्ण माना जाता है, इसी आधार पर 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जा रहा है।

गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त

14 सितंबर को भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापना के लिए मध्याह्न का समय सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।

दिल्ली के अनुसार स्थापना मुहूर्त:

  • गणपति स्थापना: सुबह 11:02 बजे से दोपहर 1:31 बजे तक
  • कुल अवधि: करीब 2 घंटे 29 मिनट
  • अभिजीत मुहूर्त: करीब 11:52 बजे से 12:41 बजे तक

ध्यान देने वाली बात यह है कि पंचांग के समय स्थान के अनुसार बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए पुणे में मध्याह्न पूजा का समय 11:16 बजे से 1:43 बजे तक बताया गया है। इसलिए दूसरे शहरों में रहने वाले श्रद्धालु अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देख सकते हैं।

राहुकाल में क्या करें और क्या न करें?

गणेश चतुर्थी के दिन पूजा और स्थापना के लिए राहुकाल से बचने की धार्मिक परंपरा है।

दिल्ली के पंचांग के अनुसार 14 सितंबर को राहुकाल सुबह के समय पड़ता है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और सूर्यास्त के अंतर के कारण राहुकाल का समय भी कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है।

इसलिए जिन श्रद्धालुओं को गणपति स्थापना करनी है, उन्हें स्थानीय पंचांग के अनुसार राहुकाल की स्थिति देखते हुए शुभ मुहूर्त में स्थापना करना उचित माना जाता है।

पुणे के उदाहरण में 14 सितंबर को राहुकाल सुबह 7:54 बजे से 9:26 बजे तक बताया गया है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि स्थान बदलने के साथ पंचांग के समय बदलते हैं।

गणपति स्थापना के बाद कैसे करें पूजा?

धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान गणेश की प्रतिमा को साफ और पवित्र स्थान पर स्थापित करने के बाद पूजा की जाती है।

पूजा में भगवान गणेश को जल, पंचामृत, लाल फूल, दूर्वा, सिंदूर, फल और मोदक अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद गणेश मंत्रों का जाप और आरती की जाती है।

भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा और मोदक का विशेष महत्व माना जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार गणपति को भोग अर्पित करते हैं और परिवार की सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना करते हैं।

गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन से क्यों बचते हैं?

गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा देखने को लेकर भी धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को कई परंपराओं में कलंक चतुर्थी भी कहा जाता है।

मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा के दर्शन करने से मिथ्या कलंक लग सकता है। इसके पीछे भगवान श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि से जुड़ी धार्मिक कथा सुनाई जाती है।

यह धार्मिक मान्यता है, इसलिए अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसके पालन की परंपरा अलग हो सकती है।

कितने दिन तक विराजेंगे गणपति बप्पा?

गणेश उत्सव आमतौर पर 10 दिनों तक मनाया जाता है। हालांकि घरों में परिवार की परंपरा के अनुसार गणपति को डेढ़ दिन, 3 दिन, 5 दिन, 7 दिन या 10 दिन तक भी विराजमान किया जाता है।

जिन परिवारों में 10 दिनों तक गणपति की स्थापना की जाती है, वहां अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जन किया जाता है।

इस वर्ष अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर 2026 को होगी और इसी दिन देश के कई हिस्सों में गणपति विसर्जन का मुख्य आयोजन होगा।

गणपति विसर्जन कब होगा?

गणेश चतुर्थी के साथ शुरू होने वाला गणेश उत्सव अनंत चतुर्दशी पर अपने चरम पर पहुंचता है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु गणपति प्रतिमाओं का विसर्जन करते हैं।

2026 में अनंत चतुर्दशी: 25 सितंबर, शुक्रवार

हालांकि सभी श्रद्धालु 10वें दिन ही विसर्जन नहीं करते। घर की परंपरा के अनुसार अलग-अलग दिनों में भी विसर्जन किया जाता है।

विसर्जन के दौरान पर्यावरण का ध्यान रखते हुए प्राकृतिक मिट्टी से बनी प्रतिमाओं और स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन स्थलों का उपयोग करने की अपील भी की जाती है।

घर में गणपति स्थापना करते समय किन बातों का रखें ध्यान?

गणपति स्थापना को लेकर धार्मिक और वास्तु परंपराओं में कई मान्यताएं प्रचलित हैं। श्रद्धालु आमतौर पर प्रतिमा को स्वच्छ और शांत स्थान पर स्थापित करते हैं।

पूजा स्थल की साफ-सफाई रखने, नियमित पूजा करने और प्रतिमा के सामने दीपक जलाने जैसी परंपराओं का पालन किया जाता है।

प्रतिमा की दिशा और स्वरूप को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग मान्यताएं हैं। इसलिए किसी एक दिशा को वैज्ञानिक रूप से अनिवार्य मानने के बजाय इसे धार्मिक एवं पारंपरिक मान्यता के रूप में देखना चाहिए।

इस बार गणेश चतुर्थी क्यों खास है?

इस वर्ष गणेश चतुर्थी सोमवार को पड़ रही है और देश के अलग-अलग हिस्सों में गणपति उत्सव को लेकर तैयारियां पूरी हो चुकी हैं।

महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में सार्वजनिक गणेश पंडाल सजाए गए हैं। वहीं मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, कर्नाटक और अन्य राज्यों में भी घरों और सार्वजनिक स्थानों पर गणपति स्थापना की जा रही है।

गणेश उत्सव के दौरान धार्मिक आयोजनों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। कई स्थानों पर स्थानीय प्रशासन की ओर से सुरक्षा, यातायात और विसर्जन व्यवस्था को लेकर विशेष तैयारियां की जाती हैं।

श्रद्धालुओं के लिए जरूरी समय एक नजर में

जानकारी समय/तारीख
गणेश चतुर्थी 14 सितंबर 2026, सोमवार
गणपति स्थापना का मुख्य मुहूर्त 11:02 AM – 1:31 PM*
मुहूर्त की अवधि करीब 2 घंटे 29 मिनट
अभिजीत मुहूर्त करीब 11:52 AM – 12:41 PM*
अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर 2026
मुख्य 10 दिवसीय उत्सव का समापन 25 सितंबर 2026

* ये समय दिल्ली के अनुसार हैं; शहर के अनुसार कुछ मिनट का अंतर संभव है।

खबर की मुख्य बातें

  • खबर की तारीख: 14 सितंबर 2026
  • पर्व: गणेश चतुर्थी 2026
  • दिन: सोमवार
  • मुख्य संदर्भ: पूरे भारत में गणपति स्थापना
  • दिल्ली में स्थापना मुहूर्त: सुबह 11:02 बजे से दोपहर 1:31 बजे तक
  • मुहूर्त की अवधि: करीब ढाई घंटे
  • अभिजीत मुहूर्त: करीब 11:52 बजे से 12:41 बजे तक
  • गणेश विसर्जन/अनंत चतुर्दशी: 25 सितंबर 2026
  • महत्वपूर्ण नोट: पूजा और राहुकाल के समय शहर के अनुसार बदल सकते हैं

निष्कर्ष

गणेश चतुर्थी 2026 आज यानी 14 सितंबर को देशभर में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। गणपति स्थापना के लिए मध्याह्न काल को विशेष महत्व दिया गया है और दिल्ली के अनुसार सुबह 11:02 बजे से दोपहर 1:31 बजे तक करीब ढाई घंटे का शुभ समय उपलब्ध है।

श्रद्धालु अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार स्थापना का सटीक समय जरूर जांचें, क्योंकि सूर्योदय, सूर्यास्त और मध्याह्न की गणना के कारण मुहूर्त में स्थान के हिसाब से अंतर हो सकता है। गणेश उत्सव का प्रमुख समापन 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन होगा।

गणपति बप्पा मोरया!


श्रीकृष्ण के ये 4 रहस्य शायद ही जानते होंगे आप, जन्माष्टमी पर जानें अनसुनी कथाएं

नई दिल्ली | 2 सितंबर 2026

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह उनके जीवन, उनकी लीलाओं, उनके प्रेम और उनके द्वारा दिए गए गहरे संदेशों को याद करने का भी पावन अवसर है। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाए जाने वाले इस पर्व को लेकर देशभर में श्रद्धालुओं के बीच खास उत्साह रहता है। इस अवसर पर मंदिरों से लेकर घरों तक कान्हा के जन्मोत्सव की तैयारियां की जाती हैं।

भगवान श्रीकृष्ण का जीवन जितना व्यापक है, उतनी ही रोचक उनसे जुड़ी कथाएं और लोकमान्यताएं भी हैं। महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता में उनके विराट स्वरूप से लेकर बाल कृष्ण की माखन चोरी तक आपने कई कथाएं सुनी होंगी, लेकिन उनके जीवन से जुड़े कुछ ऐसे प्रसंग भी हैं जिनके बारे में बहुत कम चर्चा होती है।

जन्माष्टमी के अवसर पर आइए जानते हैं श्रीकृष्ण से जुड़ी ऐसी ही चार अनसुनी और रहस्यमयी पौराणिक कथाएं, जिनमें प्रेम, भक्ति, कृतज्ञता और समर्पण के गहरे संदेश छिपे बताए जाते हैं।

1. कान्हा को लड़की की तरह क्यों सजाती थीं माता यशोदा?

भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप की तस्वीरें और कथाएं सभी ने देखी और सुनी हैं। माखन चुराते नटखट कान्हा, गले में मोरपंख और हाथ में बांसुरी उनकी सबसे लोकप्रिय छवियों में शामिल हैं। लेकिन एक प्रचलित मान्यता ऐसी भी है जिसके अनुसार माता यशोदा कभी-कभी बाल कृष्ण को लड़की की तरह सजाया करती थीं।

पौराणिक कथा के अनुसार, जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और उन्हें गोकुल में माता यशोदा के पास पहुंचाया गया, तब कंस लगातार उन्हें मारने की कोशिश कर रहा था। कंस ने श्रीकृष्ण को समाप्त करने के लिए पूतना, बकासुर समेत कई राक्षसों को भेजा था।

ऐसी परिस्थितियों में अपने लाडले कान्हा को नकारात्मक शक्तियों और बुरी नजर से बचाने के लिए माता यशोदा उन्हें कभी-कभी लड़की की तरह सजाती थीं, ताकि कोई उन्हें आसानी से पहचान न सके।

इसी मान्यता को कई जगहों पर बच्चों को बुरी नजर से बचाने की पारंपरिक प्रथाओं से भी जोड़ा जाता है। जैसे बच्चों को काला टीका लगाने की परंपरा है, वैसे ही कुछ स्थानों पर बच्चों को अलग रूप में सजाने की लोकपरंपरा भी देखने को मिलती है।

2. श्रीकृष्ण बंदरों को माखन क्यों खिलाते थे?

भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी की कथा सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। कान्हा घर-घर जाकर माखन चुराते और अपने सखाओं के साथ उसे बांटकर खाते थे। लेकिन एक प्रचलित कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण माखन बंदरों को भी खिलाया करते थे।

इसके पीछे एक बेहद रोचक धार्मिक मान्यता बताई जाती है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण को अपने पिछले अवतार भगवान राम का स्मरण था। त्रेता युग में भगवान राम की सीता माता की खोज और रावण के खिलाफ युद्ध में वानर सेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

हनुमान जी सहित वानर सेना ने भगवान राम की सहायता की थी। इसी वजह से एक प्रचलित मान्यता में कहा जाता है कि भगवान कृष्ण वानरों के प्रति विशेष स्नेह रखते थे और उन्हें माखन खिलाया करते थे।

इस कथा को भगवान विष्णु के अलग-अलग अवतारों के बीच प्रेम और कृतज्ञता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

3. जब श्रीकृष्ण समुद्र की गहराइयों में पहुंचे

श्रीकृष्ण और समुद्र से जुड़ी कथाओं में एक और बेहद रोचक प्रसंग मिलता है। भगवान कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम ने उज्जैन में महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की थी।

इसी आश्रम में श्रीकृष्ण की मित्रता सुदामा से भी हुई थी। शिक्षा पूरी होने के बाद जब श्रीकृष्ण ने अपने गुरु से गुरुदक्षिणा मांगने का आग्रह किया तो महर्षि सांदीपनि ने पहले कुछ भी मांगने से इनकार कर दिया।

लेकिन श्रीकृष्ण के बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने अपनी इच्छा बताई। उनके पुत्र के समुद्र तट पर जाने के बाद लापता होने की कथा सामने आती है।

प्रचलित कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण अपने गुरु के पुत्र की तलाश में समुद्र की गहराइयों तक पहुंचे। वहां उनका सामना एक असुर से हुआ। कुछ पौराणिक संस्करणों में इस असुर का नाम पंचजन बताया गया है और आगे यमलोक का भी उल्लेख मिलता है।

कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण ने अपने गुरु के पुत्र को वापस लाने का प्रयास किया और अंततः अपनी गुरुदक्षिणा पूरी की। इस प्रसंग को गुरु के प्रति सम्मान और अपने वचन को पूरा करने की भावना से जोड़ा जाता है।

4. राधा रानी ने श्रीकृष्ण के लिए अपने पैरों की धूल क्यों भेजी?

श्रीकृष्ण और राधा का प्रेम भारतीय भक्ति परंपरा में निस्वार्थ प्रेम और पूर्ण समर्पण का प्रतीक माना जाता है। उनसे जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा में राधा के प्रेम की इसी भावना को दर्शाया गया है।

कथा के अनुसार, एक बार श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। चारों ओर उत्सव का माहौल था, लेकिन श्रीकृष्ण स्वयं उस समारोह में शामिल नहीं हुए।

जब माता रुक्मिणी ने उनसे इसका कारण पूछा तो श्रीकृष्ण ने कहा कि उनके सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है। कथा में आगे बताया जाता है कि श्रीकृष्ण ने कहा कि यदि कोई ऐसा व्यक्ति, जो उनसे सच्चा प्रेम करता है, अपने पैरों की धूल उनके सिर पर लगा दे तो उनका दर्द ठीक हो सकता है।

यह सुनकर वहां मौजूद लोग हैरान रह गए।

रुक्मिणी और सत्यभामा श्रीकृष्ण से प्रेम करती थीं, लेकिन भगवान के सिर पर अपने पैरों की धूल रखने को उन्होंने अपने लिए उचित नहीं समझा। नारद मुनि भी इस कार्य के लिए तैयार नहीं हुए, क्योंकि उन्हें डर था कि ऐसा करने से उन्हें पाप लग सकता है।

इसके बाद यह बात वृंदावन तक पहुंची। जब राधा रानी और गोपियों को श्रीकृष्ण की परेशानी का पता चला तो उन्होंने बिना किसी संकोच के अपनी चरण रज देने का फैसला किया।

राधा और गोपियों ने नहीं सोचा पाप-पुण्य का डर

प्रचलित कथा के अनुसार, राधा रानी ने अपनी साड़ी का पल्लू जमीन पर बिछाया और गोपियों से उस पर चलने या नृत्य करने को कहा। इससे उनके पैरों की धूल कपड़े पर जमा हो गई।

इसके बाद यह धूल भरा कपड़ा नारद मुनि के माध्यम से श्रीकृष्ण तक पहुंचाया गया। कथा के अनुसार, जब वह कपड़ा श्रीकृष्ण के सिर पर रखा गया तो उनका दर्द दूर हो गया।

इस प्रसंग का सबसे बड़ा संदेश यही बताया जाता है कि सच्चे प्रेम में स्वार्थ, भय और परिणाम की चिंता नहीं होती।

राधा रानी और गोपियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण श्रीकृष्ण का सुख था। उन्हें इस बात की चिंता नहीं थी कि ऐसा करने से उन्हें क्या मिलेगा या कोई दंड मिलेगा या नहीं। इसी वजह से इस कथा को निस्वार्थ प्रेम और पूर्ण समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

श्रीकृष्ण की कथाओं में छिपे हैं जीवन के गहरे संदेश

श्रीकृष्ण की ये कथाएं केवल धार्मिक प्रसंगों तक सीमित नहीं हैं। इनमें जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेश भी देखने को मिलते हैं।

पहली कथा में अपने प्रिय की रक्षा और बुरी शक्तियों से बचाने की भावना दिखाई देती है। दूसरी कथा कृतज्ञता और पुराने संबंधों को याद रखने का संदेश देती है। तीसरी कथा गुरु के प्रति सम्मान और वचन निभाने की सीख देती है।

वहीं राधा और गोपियों से जुड़ी कथा प्रेम की उस भावना को सामने रखती है जिसमें व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर केवल अपने प्रिय के सुख के बारे में सोचता है।

जन्माष्टमी पर क्यों खास हैं ये कथाएं?

जन्माष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव माना जाता है, लेकिन इस दिन केवल उनके जन्म की कथा सुनना ही महत्वपूर्ण नहीं है। उनके जीवन और लीलाओं से जुड़े प्रसंगों को याद करना भी इस पर्व की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है।

कृष्ण की बाल लीलाओं में जहां आनंद और सरलता दिखाई देती है, वहीं उनके जीवन के दूसरे प्रसंग कर्तव्य, नीति, प्रेम, त्याग और समर्पण का संदेश देते हैं।

इसी वजह से जन्माष्टमी का पर्व हर आयु वर्ग के लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। बच्चों के लिए यह नटखट कान्हा की कहानियों का पर्व है, जबकि बड़े लोगों के लिए यह श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन और उनके संदेशों को याद करने का अवसर है।

2026 की जन्माष्टमी पर याद करें कान्हा की ये चार कथाएं

श्रीकृष्ण से जुड़ी ये चार कथाएं अलग-अलग पौराणिक मान्यताओं और प्रचलित कथाओं पर आधारित हैं। इनमें ऐतिहासिक प्रमाण की बात नहीं, बल्कि धार्मिक परंपरा और लोकविश्वास का महत्व है।

इस जन्माष्टमी पर जब मंदिरों में कान्हा के जयकारे गूंजेंगे और आधी रात को श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाएगा, तब इन कथाओं को याद करने का अर्थ केवल उनके चमत्कारों को जानना नहीं, बल्कि उनके संदेशों को अपने जीवन में समझना भी है।

प्रेम हो तो राधा जैसा, कृतज्ञता हो तो कृष्ण जैसी और कर्तव्य निभाने का संकल्प हो तो कान्हा के जीवन से सीख लेने जैसा—यही जन्माष्टमी की इन कथाओं का सबसे गहरा संदेश माना जा सकता है।


साल में एक दिन खुलता है नागचंद्रेश्वर मंदिर, नागराज तक्षक से जुड़ी है सदियों पुरानी मान्यता

उज्जैन, 17 अगस्त 2026।

मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में नाग पंचमी के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। महाकाल मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल पर स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर इस दिन विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसकी सबसे खास बात यह है कि मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए साल में सिर्फ एक बार और लगभग 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं।

नाग पंचमी के दिन मध्यरात्रि 12 बजे मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। इसके बाद अगले 24 घंटे तक श्रद्धालु भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन कर सकते हैं। विशेष पूजा और महाआरती के बाद अगले दिन रात 12 बजे मंदिर के कपाट फिर एक साल के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर है मंदिर

नागचंद्रेश्वर मंदिर श्री महाकालेश्वर मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। यहां भगवान शिव नागराज के स्वरूप में विराजमान माने जाते हैं। मंदिर में स्थापित प्रतिमा भगवान शिव और नागराज के विशेष स्वरूप को दर्शाती है।

नाग पंचमी के दिन इस मंदिर के दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं। मंदिर के साल में सिर्फ एक दिन खुलने की परंपरा के कारण यहां दर्शन को बेहद दुर्लभ माना जाता है।

नागराज तक्षक से जुड़ी है पौराणिक कथा

धार्मिक मान्यता के अनुसार, नागराज तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अमरता का वरदान दिया।

मान्यता है कि वरदान मिलने के बाद तक्षक ने भगवान शिव से उनके सानिध्य में रहने की इच्छा व्यक्त की। भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उन्हें महाकाल वन में रहने की अनुमति दी। साथ ही यह आशीर्वाद दिया कि उनकी साधना और एकांत में कोई बाधा न आए।

इसी धार्मिक मान्यता के कारण नागचंद्रेश्वर मंदिर को नागराज तक्षक से जोड़कर देखा जाता है।

क्यों सिर्फ 24 घंटे खुलते हैं कपाट?

मंदिर के साल में केवल एक दिन खुलने की परंपरा धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। नाग पंचमी को नागराज की पूजा का विशेष दिन माना जाता है। इसी अवसर पर श्रद्धालुओं को नागचंद्रेश्वर के दर्शन का अवसर मिलता है।

मध्यरात्रि में कपाट खुलने के बाद मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना शुरू होती है। श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं और दर्शन का सिलसिला लगातार जारी रहता है।

तीन समय होती है विशेष पूजा

नाग पंचमी के दिन मंदिर में त्रिकाल पूजा की परंपरा है। यानी दिन में तीन अलग-अलग समय पर विशेष पूजा की जाती है।

पहली पूजा: रात 12 बजे कपाट खुलने के तुरंत बाद महानिर्वाणी अखाड़े के संतों द्वारा पूजा की जाती है।

दूसरी पूजा: दोपहर 12 बजे प्रशासन की ओर से अधिकारियों द्वारा पूजा की जाती है।

तीसरी पूजा: शाम करीब 7:30 बजे महाकाल मंदिर की संध्या आरती के बाद मंदिर समिति की ओर से पुरोहित-पुजारियों द्वारा पूजा संपन्न की जाती है।

इसके बाद रात 12 बजे विशेष महाआरती होती है और फिर मंदिर के कपाट अगले नाग पंचमी तक बंद कर दिए जाते हैं।

दर्शन के लिए उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब

नाग पंचमी के दिन नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट खुलने के साथ ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं। इस बार 17 अगस्त को नाग पंचमी और सावन के तीसरे सोमवार का संयोग होने के कारण महाकाल मंदिर क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।

इसी भारी भीड़ के बीच महाकाल मंदिर परिसर में हरसिद्धि मंदिर के पास बैरिकेडिंग वाले हिस्से में दबाव बढ़ने से कुछ समय के लिए अफरा-तफरी जैसी स्थिति की खबर सामने आई। हालांकि, महाकालेश्वर मंदिर समिति ने सोशल मीडिया पर चल रही भगदड़ की खबरों को असत्य बताया।

सर्प दोष से मुक्ति की भी मान्यता

नागचंद्रेश्वर मंदिर को लेकर श्रद्धालुओं में कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। माना जाता है कि भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन और पूजा करने से व्यक्ति को सर्प दोष से मुक्ति मिलती है।

इसी विश्वास के चलते नाग पंचमी पर यहां दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं।


घर की पहली रोटी गाय को और आखिरी कुत्ते को देने की परंपरा क्यों है?

नई दिल्ली | 3 जुलाई 2026

भारतीय संस्कृति में भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि पुण्य और सेवा का माध्यम भी माना गया है। इसी परंपरा के तहत घर में बनी पहली रोटी गाय और आखिरी रोटी कुत्ते को खिलाने की प्रथा सदियों से चली आ रही है। वास्तु शास्त्र और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है तथा सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।

पहली रोटी गाय को क्यों खिलाई जाती है?

धार्मिक मान्यता के अनुसार गाय में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास माना जाता है। इसलिए पहली रोटी गाय को अर्पित करना भगवान का भोग लगाने के समान माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार इससे घर में समृद्धि, अन्न की कभी कमी न होना और परिवार में सुख-शांति बनी रहने की मान्यता है।

आखिरी रोटी कुत्ते को खिलाने का महत्व

हिंदू मान्यताओं में कुत्ते को भगवान भैरव का वाहन माना जाता है। आखिरी रोटी कुत्ते को खिलाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और शनि तथा राहु-केतु से जुड़े दोषों में राहत मिलने की धार्मिक मान्यता है। इसे जीव सेवा और करुणा का प्रतीक भी माना जाता है।

वास्तु शास्त्र क्या कहता है?

वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार—

  • पहली रोटी गाय को खिलाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
  • आखिरी रोटी कुत्ते को देने से परिवार पर आने वाले संकट कम होने की मान्यता है।
  • भोजन बनाने के बाद पशु-पक्षियों के लिए अन्न निकालना दान और सेवा का प्रतीक माना जाता है।
  • नियमित रूप से ऐसा करने से घर में सौहार्द और मानसिक शांति बनी रहती है।

धार्मिक दृष्टि से क्या है मान्यता?

शास्त्रों के अनुसार, सभी जीवों में ईश्वर का अंश माना गया है। इसलिए भोजन का कुछ भाग पशु-पक्षियों को अर्पित करना दया, सेवा और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है। कई लोग पहली रोटी गाय, अंतिम रोटी कुत्ते और कुछ अन्न पक्षियों तथा चींटियों के लिए भी निकालते हैं।

क्या इससे वास्तव में लाभ होता है?

धार्मिक और वास्तु ग्रंथों में इससे जुड़े कई शुभ फलों का उल्लेख मिलता है, लेकिन इन मान्यताओं का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसे आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विश्वास के रूप में देखा जाता है। यदि कोई व्यक्ति इस परंपरा का पालन करता है, तो पशुओं की सुरक्षा और स्वच्छता का भी ध्यान रखना चाहिए।


सोमवती अमावस्या पर करें कथा पाठ, भगवान शिव की कृपा से दूर होंगी बाधाएं

15 जून 2026

हिंदू धर्म में सोमवती अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। जब अमावस्या तिथि सोमवार के दिन पड़ती है, तब उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और पितरों की पूजा-अर्चना का विधान है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत, स्नान, दान और कथा श्रवण करने से सुख-समृद्धि, सौभाग्य और मनोकामनाओं की प्राप्ति होती है। वर्ष 2026 में सोमवती अमावस्या 15 जून, सोमवार को मनाई जा रही है।

सोमवती अमावस्या व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक ब्राह्मण परिवार में एक कन्या थी। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि विवाह के बाद उसके पति की अल्पायु होगी। यह सुनकर परिवार चिंतित हो गया। एक संत ने उपाय बताते हुए कहा कि यदि कन्या सिंहल द्वीप में रहने वाली पुण्यात्मा महिला सोना धोबिन का आशीर्वाद प्राप्त कर ले, तो उसका वैधव्य दोष दूर हो सकता है।

कन्या और उसकी मां लंबी यात्रा कर सोना धोबिन के पास पहुंचीं और उसकी सेवा करने लगीं। कई वर्षों की सेवा से प्रसन्न होकर सोना धोबिन ने उन्हें आशीर्वाद दिया। समय आने पर कन्या का विवाह हुआ, लेकिन विवाह के दौरान वर की मृत्यु हो गई।

तब सोना धोबिन ने अपने वर्षों के पुण्य का फल उस नवविवाहिता को अर्पित कर दिया। उसके पुण्य प्रभाव से युवक पुनः जीवित हो उठा। कहा जाता है कि इस पुण्यदान के कारण स्वयं सोना धोबिन के पति की मृत्यु हो गई।

इसके बाद सोना धोबिन ने भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करते हुए पीपल वृक्ष की 108 परिक्रमा की तथा सोमवती अमावस्या का व्रत किया। उसके व्रत और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसके पति को भी पुनर्जीवन प्रदान कर दिया। तभी से सोमवती अमावस्या के व्रत और पीपल पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।

क्या है धार्मिक महत्व?

मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने, पितरों का तर्पण करने तथा पीपल वृक्ष की परिक्रमा करने से परिवार में सुख-शांति आती है। इस दिन किया गया दान-पुण्य कई गुना फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु पितृ दोष से मुक्ति और मनोकामना पूर्ति के लिए भी यह व्रत रखते हैं।

पूजा और व्रत का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवती अमावस्या पर प्रातः स्नान कर भगवान शिव का जलाभिषेक करना, बेलपत्र अर्पित करना, पितरों का तर्पण करना और जरूरतमंदों को दान देना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत कथा का पाठ या श्रवण करने से अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि और शिव कृपा प्राप्त होती है।


मेघालय में हनुमान मंदिर में तोड़फोड़ और चोरी, CCTV कैमरे क्षतिग्रस्त

10 मई 2026 | शिलांग, मेघालय

Hanuman Temple Garikhana में शनिवार देर रात अज्ञात बदमाशों द्वारा तोड़फोड़ और चोरी की घटना सामने आई है। घटना के बाद इलाके में तनाव और नाराजगी का माहौल है। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

जानकारी के अनुसार यह घटना 10 मई 2026 की रात करीब 1 बजे शिलांग के गरिखाना इलाके स्थित हनुमान मंदिर में हुई। आरोपियों ने मंदिर परिसर में घुसकर मूर्तियां, चांदी के गहने, पूजा सामग्री और दानपात्र में रखी नकदी चोरी कर ली।

मंदिर में घुसकर की तोड़फोड़

एफआईआर के अनुसार बदमाश मंदिर के साइड एंट्रेंस को तोड़कर अंदर घुसे। इसके बाद उन्होंने मंदिर परिसर में तोड़फोड़ की और कई धार्मिक वस्तुओं को नुकसान पहुंचाया।

मंदिर के अंदर रखे पीतल के बर्तन, दीपक, पूजा की थालियां और जल पात्र भी चोरी कर लिए गए। घटना के बाद मंदिर परिसर अस्त-व्यस्त स्थिति में मिला।

कई मूर्तियां चोरी होने की सूचना

पुलिस के अनुसार चोर भगवान कृष्ण, राधा जी और भगवान हनुमान की छोटी प्रतिमाएं अपने साथ ले गए। हालांकि गर्भगृह में स्थापित मुख्य मूर्ति को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया गया।

CCTV कैमरे तोड़े, आग लगाने की कोशिश

घटना के दौरान आरोपियों ने सबूत मिटाने के उद्देश्य से मंदिर परिसर में लगे CCTV कैमरों को भी नुकसान पहुंचाया। कुछ कैमरों में आग लगाने की कोशिश किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।

हालांकि मंदिर के कैमरे क्षतिग्रस्त कर दिए गए थे, लेकिन आसपास के घरों में लगे CCTV कैमरों में कुछ संदिग्ध व्यक्तियों की गतिविधियां रिकॉर्ड हुई हैं। पुलिस ने फुटेज कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी है।

पुलिस जांच में जुटी

मामले की जांच Lumdiengjri Police Station द्वारा की जा रही है। पुलिस ने क्षेत्र में गश्त बढ़ा दी है और संदिग्धों की तलाश जारी है।

अधिकारियों के अनुसार घटना से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जा रही है और आसपास के लोगों से भी पूछताछ की जा रही है।

स्थानीय लोगों में नाराजगी

घटना के बाद गरिखाना और झालूपारा इलाके के लोगों में भारी नाराजगी देखने को मिली। स्थानीय निवासियों ने धार्मिक स्थल की सुरक्षा व्यवस्था और रात के समय पुलिस गश्त को लेकर सवाल उठाए हैं।

लोगों का कहना है कि मंदिर जैसे संवेदनशील धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया जाना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।

यह घटना धार्मिक स्थल पर हमला, चोरी और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा संवेदनशील मामला बन गई है, जिस पर पुलिस और प्रशासन की नजर बनी हुई है।

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