लखनऊ, 29 सितंबर 2026।
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए मंगलवार, 29 सितंबर से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। चुनाव 16 अक्टूबर को होना है। बीजेपी और समाजवादी पार्टी दोनों ने अपने-अपने स्तर पर उम्मीदवारों के चयन को लेकर तैयारियां तेज कर दी हैं।
बीजेपी में 8 सीटों के लिए 20 से ज्यादा नाम चर्चा में
उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की 10 सीटों में से बीजेपी मौजूदा विधानसभा संख्या बल के आधार पर 8 सीटों पर दावा कर रही है। इन सीटों के लिए पार्टी के भीतर 20 से ज्यादा नामों पर मंथन चल रहा है।
चर्चा में आने वाले नामों में बीजेपी की राष्ट्रीय महामंत्री स्मृति ईरानी, हरीश द्विवेदी, रेखा वर्मा, गीता शाक्य, राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया, प्रियंका रावत, कौशल किशोर, हरदीप सिंह पुरी, बृजलाल, प्रकाश पाल और दुर्विजय शाक्य समेत कई नेता शामिल बताए जा रहे हैं।
कुछ रिपोर्टों के अनुसार यूपी बीजेपी ने प्रत्येक सीट के लिए तीन-तीन नामों का पैनल केंद्रीय नेतृत्व को भेजा है। इस तरह करीब 24 नामों पर विचार की बात सामने आई है। अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व द्वारा किया जाना है।
स्मृति ईरानी का नाम क्यों चर्चा में?
पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी की राष्ट्रीय महामंत्री स्मृति ईरानी का नाम इस बार यूपी से राज्यसभा उम्मीदवार के तौर पर प्रमुखता से सामने आया है।
कुछ रिपोर्टों में उनके साथ हरीश द्विवेदी के नाम को भी संभावित उम्मीदवार के तौर पर बताया गया है। हालांकि अभी तक बीजेपी ने आधिकारिक तौर पर किसी भी नाम को अंतिम उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। इसलिए स्मृति ईरानी का राज्यसभा जाना फिलहाल चर्चा और संभावित उम्मीदवारों की सूची तक ही सीमित है।
इन नामों पर भी पार्टी में चर्चा
बीजेपी के संभावित पैनल में कई पुराने और नए चेहरों के नाम बताए जा रहे हैं। इनमें कुमार विश्वास, वरुण गांधी, संजीव बालियान, सत्यपाल सिंह, सुरेश राणा, बीएल वर्मा, गीता शाक्य, प्रकाश पाल, बृजलाल और हरदीप सिंह पुरी जैसे नाम भी अलग-अलग रिपोर्टों में सामने आए हैं।
पार्टी के सामने मौजूदा सदस्यों को दोबारा मौका देने के साथ-साथ नए चेहरों को प्रतिनिधित्व देने का सवाल भी है। उम्मीदवारों के चयन में क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व को भी ध्यान में रखे जाने की बात सामने आई है।
सपा उतार सकती है 3 उम्मीदवार
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी भी राज्यसभा चुनाव में तीन उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है। पार्टी के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में 101 विधायक हैं और कांग्रेस के दो विधायक भी उसके साथ बताए जा रहे हैं। इस तरह सपा-कांग्रेस के समर्थन वाले खेमे के पास 103 विधायकों का आंकड़ा बताया जा रहा है।
सपा की ओर से तीसरी सीट के लिए दावा संख्या बल के लिहाज से चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में चुनाव में अतिरिक्त वोटों और उम्मीदवारों के समर्थन का गणित महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि अंतिम तस्वीर नामांकन और चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद ही साफ होगी।
16 अक्टूबर को होगा मतदान
उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए मतदान 16 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है। नामांकन प्रक्रिया 29 सितंबर से शुरू हो गई है और उम्मीदवारों के नाम सामने आने के साथ मुकाबले की तस्वीर स्पष्ट होती जाएगी।
बीजेपी के सामने 8 सीटों के लिए उम्मीदवारों का चयन करने की चुनौती है, जबकि सपा तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारकर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में है। फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा बीजेपी के संभावित नामों को लेकर है और इनमें स्मृति ईरानी का नाम भी प्रमुखता से सामने आया है।

‘राहुल मियां’ पर राउत का नया दांव, बोले- नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी ‘मियां’
नई दिल्ली/मुंबई, 11 सितंबर 2026।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी को लेकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की ओर से की गई ‘राहुल मियां’ टिप्पणी अब राजनीतिक बहस का नया मुद्दा बन गई है। इस बयान को लेकर कांग्रेस की ओर से आपत्ति जताए जाने के बाद शिवसेना (यूबीटी) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने अलग अंदाज में प्रतिक्रिया दी। राउत ने कहा कि ‘मियां’ शब्द का अर्थ भाई या सम्मान के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए राहुल गांधी को ‘राहुल मियां’ कहे जाने में उन्हें कोई आपत्ति नजर नहीं आती।
राउत ने इसी बहस को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लेकर भी तंज कसा। उन्होंने सवालिया अंदाज में कहा कि अगर ‘मियां’ शब्द गलत है तो फिर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नाम के साथ भी इस शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति होनी चाहिए।
हल्द्वानी से शुरू हुआ ‘राहुल मियां’ विवाद
दरअसल, यह पूरा विवाद 9 सितंबर 2026 को उत्तराखंड के हल्द्वानी में भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन के एक राजनीतिक बयान के बाद शुरू हुआ। वंदे मातरम् को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच नबीन ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए उन्हें ‘राहुल मियां’ कहकर संबोधित किया।
इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक गलियारों में बयानबाजी तेज हो गई। कांग्रेस की ओर से इसे लेकर आपत्ति जताई गई और भाजपा की भाषा पर सवाल उठाए गए। इसके बाद संजय राउत ने इस मुद्दे को अलग नजरिए से उठाते हुए कहा कि ‘मियां’ शब्द अपने आप में कोई अपमानजनक शब्द नहीं है।
संजय राउत ने बताया ‘मियां’ का मतलब
संजय राउत ने कहा कि ‘मियां’ शब्द का इस्तेमाल भाई या सम्मान के भाव में किया जाता है। उनके मुताबिक अगर किसी व्यक्ति को ‘भाई’ कहकर संबोधित किया जा सकता है तो ‘मियां’ कहे जाने को लेकर विवाद खड़ा करने की जरूरत नहीं है।
राउत ने इसी संदर्भ में कहा कि ‘राहुल मियां’ का मतलब राहुल भाई समझा जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘मियां’ और ‘जनाब’ जैसे शब्द कई जगहों पर सम्मान के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं।
उनका कहना था कि केवल किसी शब्द के इस्तेमाल से यह मान लेना सही नहीं होगा कि उससे समाज में कड़वाहट पैदा हो जाएगी।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर भी राउत का तंज
‘राहुल मियां’ विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए संजय राउत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लेकर भी राजनीतिक तंज किया।
राउत ने कहा कि अगर राहुल गांधी को ‘राहुल मियां’ कहा जा सकता है तो इसी तरह ‘नरेंद्र मियां’ और ‘अमित मियां’ भी कहा जा सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेशों की यात्रा करते हैं, तो वहां उन्हें सम्मान के तौर पर ‘मियां’ कहकर संबोधित किए जाने की बात सामने आती है।
राउत ने सवाल उठाया कि अगर ‘मियां’ शब्द को गलत या आपत्तिजनक माना जा रहा है तो फिर इसके अर्थ को लेकर स्पष्टता होनी चाहिए। उनके मुताबिक इस शब्द को केवल राजनीतिक विवाद का विषय बनाने की जरूरत नहीं है।
वंदे मातरम् को लेकर पहले से गरम है सियासत
‘राहुल मियां’ विवाद ऐसे समय सामने आया है जब वंदे मातरम् को लेकर राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी चल रही है। इसी मुद्दे को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच पहले से ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।
नितिन नबीन ने इसी राजनीतिक बहस के दौरान राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए ‘राहुल मियां’ शब्द का इस्तेमाल किया था। इसके बाद बयान के शब्दों को लेकर विवाद खड़ा हुआ और विपक्ष की ओर से भाजपा पर निशाना साधा गया।
अब संजय राउत की प्रतिक्रिया ने इस विवाद को एक नया राजनीतिक मोड़ दे दिया है। उन्होंने सीधे तौर पर शब्द के अर्थ और उसके इस्तेमाल को लेकर भाजपा के रुख पर सवाल उठाया है।
बयान से ज्यादा अब शब्दों के अर्थ पर बहस
इस पूरे विवाद में खास बात यह है कि राजनीतिक चर्चा अब केवल राहुल गांधी को लेकर दिए गए बयान तक सीमित नहीं रही। बहस इस बात पर पहुंच गई है कि ‘मियां’ शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है और राजनीतिक संदर्भ में इसके इस्तेमाल को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए।
संजय राउत ने इसे सम्मान और भाईचारे से जोड़ते हुए भाजपा पर ही पलटवार किया है। वहीं, भाजपा की ओर से राहुल गांधी को ‘राहुल मियां’ कहे जाने के बाद कांग्रेस की आपत्ति ने इस शब्द को राजनीतिक बहस का हिस्सा बना दिया है।
महाराष्ट्र से उत्तराखंड तक पहुंचा विवाद
शुरुआत उत्तराखंड के हल्द्वानी से हुई, लेकिन कुछ ही समय में यह मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया। मुंबई में संजय राउत की प्रतिक्रिया के बाद भाजपा और विपक्ष के बीच चल रही राजनीतिक बयानबाजी में एक और मुद्दा जुड़ गया।
राउत के बयान को विपक्षी राजनीति में भाजपा पर पलटवार के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इस विवाद का केंद्र अब भी वही सवाल है कि राजनीतिक मंच से किसी नेता के नाम के साथ ‘मियां’ शब्द का इस्तेमाल किस संदर्भ में किया गया और उसका राजनीतिक संदेश क्या था।
‘राहुल मियां’ पर सियासत अभी थमी नहीं
‘राहुल मियां’ को लेकर शुरू हुआ विवाद अब केवल एक संबोधन का मामला नहीं रह गया है। एक तरफ भाजपा की ओर से राहुल गांधी की राजनीति और वंदे मातरम् जैसे मुद्दों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं विपक्ष इस तरह की भाषा को लेकर भाजपा पर पलटवार कर रहा है।
संजय राउत ने इस पूरे विवाद को शब्दों के अर्थ से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का उदाहरण सामने रखा है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इस बयान पर भाजपा की ओर से क्या प्रतिक्रिया सामने आती है और क्या यह मुद्दा आगे भी राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा बना रहता है।

हिजाब विवाद में आमने-सामने मायावती और ओवैसी, हाईकोर्ट के फैसले पर दोनों का अलग रुख
लखनऊ/प्रयागराज, 26 अगस्त 2026।
उत्तर प्रदेश में हिजाब और स्कूल यूनिफॉर्म को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। एक तरफ मायावती ने मामले को आपसी बातचीत से सुलझाने की सलाह दी है, वहीं दूसरी ओर ओवैसी ने हाईकोर्ट के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
क्या है पूरा मामला?
विवाद की शुरुआत स्कूल में हिजाब पहनने की अनुमति से जुड़े मामले से हुई। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां दो जजों की पीठ ने छात्रा की याचिका को खारिज कर दिया।
रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सकी कि हिजाब पहनना उसके धर्म का ऐसा अनिवार्य हिस्सा है, जिसके बिना उसकी धार्मिक आस्था प्रभावित होती है। इसी आधार पर स्कूल में हिजाब पहनने की अनुमति देने की मांग को स्वीकार नहीं किया गया।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद मामला सिर्फ कानूनी दायरे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय भी बन गया।
मायावती ने दी आपसी बातचीत की सलाह
बीएसपी प्रमुख मायावती ने इस विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X के जरिए दी। उन्होंने धार्मिक मामलों को लेकर संयम बरतने और विवाद को बातचीत से सुलझाने पर जोर दिया।
मायावती ने संविधान और बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान सभी जातियों और धर्मों को समान अधिकार देता है। उनके मुताबिक हर धर्म के लोगों को अपनी धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार जीवन जीने का अधिकार है।
मायावती का कहना है कि स्कूल यूनिफॉर्म, हिजाब या चादर जैसे मुद्दों को कोर्ट-कचहरी तक ले जाने के बजाय स्कूल प्रशासन और संबंधित पक्षों को आपस में बैठकर समाधान निकालना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों को राजनीतिक रंग देने से बचना चाहिए।
ओवैसी ने हाईकोर्ट के फैसले पर उठाए सवाल
वहीं एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से असहमति जताई है।
हैदराबाद में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ओवैसी ने कहा कि हिजाब से संबंधित धार्मिक आवश्यकता का फैसला अदालत कैसे कर सकती है। उन्होंने अदालत के फैसले को संविधान के अनुच्छेद 25 और 19 से जोड़ते हुए सवाल उठाया।
ओवैसी ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़ते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आचरण करने का अधिकार संविधान देता है।
ओवैसी बोले- इस्लाम में क्या जरूरी है, यह कोर्ट कैसे तय करेगा?
ओवैसी ने अपने बयान में इस बात पर जोर दिया कि किसी धार्मिक परंपरा का अनिवार्य हिस्सा क्या है, इसका फैसला अदालत द्वारा किए जाने पर सवाल उठता है।
उनका तर्क था कि धार्मिक स्वतंत्रता संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। इसी आधार पर उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले की आलोचना की और इसे चुनौती देने की बात कही।
मायावती और ओवैसी की राय अलग-अलग
हिजाब विवाद पर दोनों नेताओं का रुख अलग नजर आया है।
मायावती ने जहां विवाद को बातचीत के जरिए सुलझाने और संवेदनशील धार्मिक मुद्दों को राजनीतिक विवाद न बनाने की बात कही, वहीं ओवैसी ने सीधे अदालत के फैसले की संवैधानिकता पर सवाल उठाया।
इस तरह हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब राजनीतिक दलों के बीच भी इस मुद्दे को लेकर बयानबाजी शुरू हो गई है।
संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता बना बहस का केंद्र
इस पूरे विवाद में संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता प्रमुख मुद्दे बन गए हैं। एक ओर स्कूलों में यूनिफॉर्म और संस्थागत नियमों का सवाल है, तो दूसरी ओर धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों को लेकर बहस हो रही है।
यही वजह है कि हिजाब का मुद्दा अब केवल स्कूल ड्रेस कोड तक सीमित नहीं रहा। इसमें धार्मिक अधिकार, संवैधानिक स्वतंत्रता और संस्थानों के नियम जैसे कई पहलू शामिल हो गए हैं।
स्कूल यूनिफॉर्म बनाम धार्मिक पहचान
विवाद का एक अहम पहलू स्कूल यूनिफॉर्म भी है। शिक्षण संस्थान आम तौर पर सभी विद्यार्थियों के लिए एक समान ड्रेस कोड लागू करते हैं। दूसरी तरफ कुछ छात्र धार्मिक पहचान से जुड़े पहनावे को अपने अधिकार का हिस्सा मानते हैं।
इसी टकराव के बीच सवाल उठता है कि स्कूल के ड्रेस कोड और किसी छात्र की धार्मिक मान्यता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
यही मुद्दा अब अदालत और राजनीतिक मंच दोनों जगह चर्चा में है।
मायावती ने राजनीतिकरण से बचने की अपील की
मायावती ने अपने बयान में इस बात पर जोर दिया कि धार्मिक और सामाजिक मामलों को लेकर राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
उनका कहना है कि अगर स्कूल प्रशासन और संबंधित पक्ष बातचीत के जरिए समाधान निकालें तो मामला अनावश्यक रूप से बड़ा होने से बच सकता है।
मामला आगे भी गरमा सकता है
हाईकोर्ट के फैसले और नेताओं की प्रतिक्रियाओं के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। ओवैसी की ओर से फैसले को चुनौती देने की बात कही गई है, जबकि मायावती ने विवाद को बातचीत के जरिए खत्म करने का सुझाव दिया है।
ऐसे में आने वाले दिनों में इस मामले में कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर घटनाक्रम देखने को मिल सकता है।

सिग्नेचर कैंपेन बनाम पोस्टर वॉर, राम मंदिर मुद्दे पर बढ़ा सियासी तापमान
नई दिल्ली | 13 जुलाई 2026
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी के मामले को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। आम आदमी पार्टी (AAP) ने इस मुद्दे पर देशव्यापी सिग्नेचर कैंपेन शुरू करने का ऐलान किया है। वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अरविंद केजरीवाल पर पोस्टर जारी कर पलटवार करते हुए उन पर धार्मिक मुद्दों का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाया।
दिल्ली के रोहिणी स्थित जापानी पार्क में सुंदरकांड पाठ के आयोजन के दौरान AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने अभियान की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि यह अभियान राम भक्तों की भावनाओं को आवाज देने के लिए है। पार्टी का दावा है कि देशभर से लोगों के हस्ताक्षर जुटाकर प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपा जाएगा, जिसमें मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की जाएगी।
केजरीवाल ने आरोप लगाया कि राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े मामले में जिम्मेदार लोगों को बचाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि श्रद्धालुओं के दान में अनियमितता हुई है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए।
AAP के अभियान के जवाब में दिल्ली भाजपा ने अरविंद केजरीवाल को निशाने पर लेते हुए एक पोस्टर जारी किया। पोस्टर में उन्हें “चुनावी हिंदू” बताते हुए आरोप लगाया गया कि चुनावी माहौल में धार्मिक कार्यक्रमों और राम मंदिर के मुद्दे का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है। भाजपा नेताओं ने कहा कि यदि AAP वास्तव में आस्था के प्रति गंभीर होती, तो ऐसे कार्यक्रम पहले भी लगातार आयोजित किए जाते।
विवाद यहीं नहीं रुका। भाजपा के आरोपों का जवाब देते हुए केजरीवाल ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल को निशाना बनाना नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान करना और कथित अनियमितताओं पर जवाबदेही तय कराना है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होने तक अभियान जारी रखेगी।
राम मंदिर चढ़ावा विवाद अब जांच के साथ-साथ एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है। एक ओर AAP इसे जनआंदोलन का रूप देने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा इसे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति बता रही है। फिलहाल मामले की जांच जारी है और आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

जन्मदिन पर सियासी वार, ओम प्रकाश राजभर ने अखिलेश यादव को घेरा
लखनऊ (उत्तर प्रदेश) | 1 जुलाई 2026
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष Akhilesh Yadav के जन्मदिन के मौके पर उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री Om Prakash Rajbhar ने उन पर तीखा राजनीतिक हमला बोला। राजभर ने कहा कि अगर अखिलेश यादव वास्तव में जनता की समस्याओं को समझना चाहते हैं, तो उन्हें “एसी वाली राजनीति” छोड़कर गांवों की पगडंडियों पर जाना चाहिए और आम लोगों के बीच समय बिताना चाहिए।
लखनऊ में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि केवल सोशल मीडिया या प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए राजनीति करने से जनता का भरोसा नहीं जीता जा सकता। उन्होंने कहा कि नेताओं को गांव-गांव जाकर लोगों की समस्याएं सुननी चाहिए और उनके समाधान के लिए काम करना चाहिए।
राजभर ने दावा किया कि वर्तमान सरकार गांवों के विकास, गरीबों के कल्याण और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह केवल बयानबाजी कर रहा है, जबकि सरकार जमीन पर विकास कार्यों को आगे बढ़ा रही है।
उन्होंने अखिलेश यादव के जन्मदिन का जिक्र करते हुए कहा कि यह आत्ममंथन का भी अवसर होना चाहिए। राजभर ने कहा कि जनता के बीच जाकर उनकी वास्तविक समस्याओं को समझना ही एक जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
राजभर के इस बयान के बाद समाजवादी पार्टी की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि भाजपा और उसके सहयोगी दल जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के राजनीतिक बयान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव लगातार जनता के बीच सक्रिय हैं और प्रदेश के विभिन्न मुद्दों को मजबूती से उठा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों को देखते हुए सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी का दौर और तेज हो सकता है। दोनों पक्ष लगातार एक-दूसरे पर निशाना साधकर राजनीतिक बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

विधानसभा चुनाव में सिर्फ 822 वोट, अब 20 सांसदों वाली पार्टी बनी NCPI
नई दिल्ली, 15 जून 2026
भारतीय राजनीति में सोमवार को एक बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का फैसला किया। इस कदम के बाद अब तक लगभग अज्ञात रही NCPI अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है।
NCPI की स्थापना करीब छह वर्ष पहले हुई थी। पार्टी का आधार मुख्य रूप से त्रिपुरा और पूर्वोत्तर भारत में रहा है, जबकि इसका पंजीकृत कार्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में है। पार्टी का नेतृत्व शिउली कुंडू और उत्तिया कुंडू से जुड़ा माना जाता है।
2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में मिली थी सिर्फ 822 वोट
NCPI ने पहली बार 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाई थी। पार्टी ने दो सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसे कुल मिलाकर सिर्फ 822 वोट मिले। कैलाशहर सीट पर पार्टी को 286 वोट और चावमानु सीट पर 536 वोट प्राप्त हुए थे। दोनों उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी।
इसके बावजूद पार्टी ने खुद को पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय बनाए रखा और चुनाव आयोग में एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल (Registered Unrecognised Political Party) के रूप में दर्ज है। इसका चुनाव चिह्न “सात किरणों वाली पेन निब” बताया जाता है।
अचानक कैसे बढ़ी ताकत?
रविवार, 14 जून 2026 को तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र देकर NCPI में विलय की जानकारी दी। सांसदों ने लोकसभा में अलग ब्लॉक के रूप में बैठने की भी मांग की है।
इस विलय के बाद NCPI के पास सीधे 20 लोकसभा सांसद हो गए हैं। संख्या के लिहाज से यह पार्टी अब NDA के भीतर भाजपा के बाद दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी बन सकती है, जबकि लोकसभा में भी उसका कद अचानक कई स्थापित दलों से बड़ा हो गया है।
बेहद सीमित संसाधनों वाली पार्टी
रिपोर्टों के अनुसार NCPI को पंजीकरण के बाद से बहुत सीमित आर्थिक सहयोग मिला था। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में पार्टी को लगभग 1.13 लाख रुपये का चंदा मिलने का उल्लेख है। यही वजह है कि अब 20 सांसदों के साथ पार्टी का अचानक राष्ट्रीय स्तर पर उभरना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह भारतीय संसदीय राजनीति के सबसे असामान्य घटनाक्रमों में से एक है, जहां एक ऐसी पार्टी जिसने विधानसभा चुनाव में केवल 822 वोट हासिल किए थे, वह कुछ ही वर्षों में 20 सांसदों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली स्थिति में पहुंच गई है। आने वाले दिनों में लोकसभा अध्यक्ष का फैसला और संभावित कानूनी चुनौतियां इस पूरे मामले की दिशा तय करेंगी।

पवन खेड़ा की तपस्या पूरी हुई? कांग्रेस की मुखर आवाज बने तो तुरंत मिला राज्यसभा का इनाम
14 जून 2026
यह खबर कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची से जुड़ी है, जिसमें पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और मीडिया विभाग प्रमुख Pawan Khera को कर्नाटक से राज्यसभा उम्मीदवार बनाया गया है।
“पवन खेड़ा की तपस्या पूरी हुई” का मतलब क्या है?
यह वाक्य 2022 की एक घटना की ओर इशारा करता है। उस समय जब कांग्रेस ने राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची जारी की थी, तब पवन खेड़ा का नाम शामिल नहीं था। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा था:
“शायद मेरी तपस्या में कुछ कमी रह गई।”
यह टिप्पणी काफी चर्चित हुई थी। अब 2026 में उन्हें राज्यसभा का टिकट मिलने पर कई राजनीतिक विश्लेषक और मीडिया संस्थान इसे उनकी “तपस्या पूरी होना” बता रहे हैं।
कांग्रेस ने उन्हें क्यों चुना?
पवन खेड़ा पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस के सबसे आक्रामक और चर्चित प्रवक्ताओं में रहे हैं। टीवी डिबेट, प्रेस कॉन्फ्रेंस और भाजपा पर राजनीतिक हमलों में वे पार्टी का प्रमुख चेहरा बने रहे। पार्टी नेतृत्व ने इस बार ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दी है जो संगठन और सार्वजनिक संचार में सक्रिय रहे हैं।
राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची में और कौन-कौन?
कांग्रेस ने जिन प्रमुख नेताओं को उम्मीदवार बनाया है, उनमें शामिल हैं:
- Mallikarjun Kharge – कर्नाटक
- Pawan Khera – कर्नाटक
- Meenakshi Natarajan – मध्य प्रदेश
- Praveen Chakravarty – तमिलनाडु
- Neeraj Dangi – राजस्थान
- Pranav Jha – झारखंड
राजनीतिक महत्व
राजनीतिक हलकों में इसे केवल राज्यसभा टिकट नहीं, बल्कि पार्टी नेतृत्व द्वारा पवन खेड़ा की निष्ठा, मीडिया में उनकी भूमिका और राहुल गांधी-खड़गे नेतृत्व के प्रति उनके योगदान की मान्यता के रूप में देखा जा रहा है। कुछ रिपोर्टों में इसे “संगठनात्मक इनाम” भी बताया गया है।
संक्षेप में, खबर का सार यह है कि कांग्रेस के मुखर प्रवक्ता पवन खेड़ा, जिन्हें 2022 में राज्यसभा नहीं भेजा गया था, अब 2026 में राज्यसभा उम्मीदवार बनाए गए हैं और इसी कारण मीडिया इसे उनकी “तपस्या पूरी होना” कह रही है।

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Kerala को मिला नया मुख्यमंत्री, VD Satheesan संभालेंगे कमान
14 मई 2026
VD Satheesan को Kerala का नया मुख्यमंत्री घोषित किया गया है। Indian National Congress ने कई दौर की बैठकों और चर्चा के बाद उनके नाम पर अंतिम फैसला लिया। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में UDF alliance को बड़ी जीत मिली थी, जिसके बाद नई सरकार के गठन की प्रक्रिया चल रही थी।
मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी के भीतर कई वरिष्ठ नेताओं के नाम चर्चा में थे। इनमें KC Venugopal और Ramesh Chennithala के नाम भी शामिल थे। लगभग 10 दिनों तक चली अंदरूनी चर्चा के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने VD Satheesan को जिम्मेदारी सौंपने का फैसला किया।
इस फैसले के बाद Bharatiya Janata Party ने कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों पर निशाना साधा। BJP नेताओं ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री चयन में Indian Union Muslim League (IUML) का प्रभाव ज्यादा रहा और नई सरकार “remote controlled” तरीके से चल सकती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक IUML लगातार VD Satheesan के समर्थन में सक्रिय था और उसने जल्द फैसला लेने के लिए कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव भी बनाया। इससे Kerala की alliance politics को लेकर नई राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
2026 Kerala Assembly Election में UDF alliance ने 140 में से 102 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि LDF को बड़ा नुकसान हुआ। वहीं BJP केवल 3 सीटों तक सीमित रही। चुनाव परिणाम के बाद अब नई सरकार के गठन और कैबिनेट तैयारियों पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

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पश्चिम एशिया संकट पर ‘टीम इंडिया’ मोड में सरकार: पीएम मोदी आज करेंगे मुख्यमंत्रियों से बातचीत
नई दिल्ली | 05 मार्च 2026
पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब भारत पर भी दिखने लगा है। इसी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ महत्वपूर्ण बैठक बुलाने का फैसला किया है। इस पहल को ‘टीम इंडिया’ की भावना के तहत समन्वित रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
कोविड मॉडल पर रणनीति
सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार कोविड-19 महामारी के दौरान अपनाए गए समन्वय मॉडल को एक बार फिर लागू करने की तैयारी में है। उस दौरान केंद्र और राज्यों ने मिलकर संकट से निपटने के लिए साझा रणनीति बनाई थी, जिसे अब पश्चिम एशिया संकट के संदर्भ में अपनाने की योजना है।
राज्यों के साथ समन्वय पर जोर
प्रधानमंत्री मोदी इस बैठक में राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मौजूदा हालात की समीक्षा करेंगे। बैठक में ईंधन आपूर्ति, महंगाई, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता और सुरक्षा मुद्दों पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है।
‘टीम इंडिया’ की भावना
सरकार का मानना है कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय संकट से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच मजबूत तालमेल जरूरी है। ‘टीम इंडिया’ की अवधारणा के तहत सभी राज्य मिलकर एकजुट होकर काम करेंगे।
संभावित चुनौतियों पर चर्चा
बैठक में खासतौर पर निम्न मुद्दों पर चर्चा हो सकती है:
- पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति और कीमतों का प्रभाव
- आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता
- निर्यात-आयात पर असर
- देश के भीतर सुरक्षा और कानून व्यवस्था
आम जनता पर असर कम करने की कोशिश
सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि अंतरराष्ट्रीय हालात का असर देश की आम जनता पर न्यूनतम पड़े। इसके लिए पहले से तैयारी और समन्वित निर्णय लेने पर जोर दिया जा रहा है।
आगे की रणनीति तय होगी
इस बैठक के बाद केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय और मजबूत होने की उम्मीद है। साथ ही संकट से निपटने के लिए ठोस कार्ययोजना भी सामने आ सकती है।
कोलकाता में CM ममता बनर्जी का SIR के खिलाफ धरना, मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर नाम हटाने का आरोप
07 मार्च 2026
कोलकाता | पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुक्रवार को कोलकाता के केंद्रीय इलाके में धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह कदम उन्होंने राज्य की मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के कथित विरोध के रूप में उठाया है। मुख्यमंत्री के इस धरने ने विधानसभा चुनावों से पहले टीएमसी और चुनाव आयोग के बीच बढ़ते विवाद को और उग्र कर दिया है।
मुख्यमंत्री के आरोप
ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि राज्य की मतदाता सूची से लाखों लोगों के नाम “अनैतिक तरीके” से हटाए गए हैं। उन्होंने कहा, “यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। हमारे मतदाता बिना किसी गलती के चुनाव प्रक्रिया से वंचित हो रहे हैं। इसे तुरंत रोका जाना चाहिए।”
धरने के दौरान मुख्यमंत्री ने SIR (State Identification Register) और चुनाव आयोग के अधिकारियों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई राजनीतिक उद्देश्य से की जा रही है और टीएमसी के समर्थन वाले मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है।
धरना प्रदर्शन का स्वरूप
धरना स्थल पर बड़ी संख्या में टीएमसी कार्यकर्ता और पार्टी समर्थक जुटे हुए हैं। मुख्यमंत्री ने सड़क आंदोलन के माध्यम से अपनी ताकत दिखाने का प्रयास किया। उन्होंने धरने के दौरान कहा कि अगर उनके विरोध को नहीं सुना गया, तो वे आंदोलन को और बड़ा करेंगे और इसे पूरे राज्य में फैलाएंगे।
धरने के दौरान ट्रैफिक प्रभावित रहा और पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए। पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन सुनिश्चित करने के लिए धरना स्थल पर बल तैनात किया।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
ममता बनर्जी ने राजनीतिक करियर में कई बार सड़क आंदोलनों का सहारा लिया है। टीएमसी के विरोधी दलों का कहना है कि इस कदम से चुनावी माहौल को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। वहीं, TMC का कहना है कि यह धरना लोकतंत्र और मतदाता अधिकारों की रक्षा के लिए किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची विवाद राजनीतिक बहस का एक प्रमुख मुद्दा बन सकता है और यह टीएमसी और अन्य पार्टियों के बीच तनाव को और बढ़ा सकता है।
एआई समिट विवाद पर शशि थरूर का बयान: “बड़े आयोजनों में छोटी गड़बड़ियां सामान्य”, राहुल के आरोपों से अलग रुख
नई दिल्ली | 20 फरवरी 2026
शशि थरूर ने दिल्ली में चल रहे एआई समिट को लेकर उठे विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में छोटी-मोटी गड़बड़ियां होना असामान्य नहीं है। दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम के संदर्भ में उन्होंने कहा कि शुरुआती दिनों में समिट का आयोजन बेहद प्रभावशाली रहा और दुनिया भर के शीर्ष नेताओं की भागीदारी इसकी बड़ी सफलता रही।
थरूर की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब राहुल गांधी ने समिट को “पीआर तमाशा” बताते हुए इसकी आलोचना की थी। कांग्रेस के भीतर ही दो वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग रुख को राजनीतिक हलकों में अहम माना जा रहा है। थरूर ने कहा कि तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे जटिल विषयों पर वैश्विक स्तर का मंच तैयार करना आसान नहीं होता और इतने बड़े पैमाने पर कार्यक्रम में कुछ व्यवस्थागत समस्याएं आना स्वाभाविक है।
समिट से जुड़ा गलगोटिया यूनिवर्सिटी विवाद भी चर्चा में है, जिस पर उन्होंने सीधे टिप्पणी करने से बचते हुए कहा कि आयोजनों का मूल्यांकन समग्र प्रभाव से होना चाहिए, न कि अलग-थलग घटनाओं से। उन्होंने यह भी कहा कि कार्यक्रम में राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और कई देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि दुनिया एआई विकास में सहयोगात्मक और एकीकृत भविष्य की ओर बढ़ना चाहती है।
उधर, इसी दौरान थरूर की नई पुस्तक हिंदू धर्म को पुनर्परिभाषित करने वाले संत: श्री नारायण गुरु का जीवन, पाठ और विरासत का विमोचन भी हुआ, जिसमें केरल के समाज सुधारक श्री नारायण गुरु के जीवन और विचारों पर प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक का लोकार्पण सी.पी. राधाकृष्णन ने किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एआई समिट को लेकर कांग्रेस नेताओं के अलग-अलग बयान पार्टी के भीतर दृष्टिकोण की विविधता को दर्शाते हैं। वहीं, सरकार समर्थक दल इसे वैश्विक स्तर पर भारत की तकनीकी छवि मजबूत करने वाला कदम बता रहे हैं। फिलहाल समिट और उससे जुड़े विवाद दोनों ही राष्ट्रीय चर्चा का विषय बने हुए हैं।
यूपी बजट से पहले सपा का सरकार पर हमला, अखिलेश-शिवपाल ने कहा—‘ये विदाई बजट’
लखनऊ | 11 फरवरी 2026
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार आज विधानसभा में अपना अब तक का सबसे बड़ा बजट पेश करने जा रही है, लेकिन उससे पहले ही राज्य की राजनीति गर्मा गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) ने बजट पेश होने से ठीक पहले सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव, वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव और सांसद रामगोपाल यादव ने संयुक्त रूप से सरकार पर निशाना साधते हुए प्रस्तावित बजट को ‘विदाई बजट’ और ‘जुमलों का बजट’ करार दिया है।
सपा नेताओं का कहना है कि सरकार चुनाव से पहले जनता को लुभाने के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर सकती है, लेकिन पिछले वादों का हिसाब अब तक नहीं दिया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की समस्याएं बढ़ी हैं, जबकि सरकार केवल प्रचार पर ध्यान दे रही है।
उधर, सरकार की ओर से संकेत मिले हैं कि इस बार का बजट आकार और योजनाओं के लिहाज़ से ऐतिहासिक हो सकता है। सूत्रों के मुताबिक बजट में महिलाओं के लिए स्कूटी योजना, आंगनबाड़ी और संविदा कर्मियों के मानदेय में बढ़ोतरी, बुनियादी ढांचे के विकास, किसानों और युवाओं के लिए नई योजनाओं जैसी घोषणाएं शामिल हो सकती हैं। फिलहाल बजट पेश होने से पहले कैबिनेट बैठक में प्रस्तावों पर अंतिम मुहर लगाई जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बजट से पहले सपा का आक्रामक रुख आगामी चुनावी माहौल को देखते हुए रणनीतिक कदम है, ताकि सरकार पर दबाव बनाया जा सके और जनता के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जा सके। वहीं सत्तारूढ़ भाजपा का दावा है कि बजट विकास, निवेश और रोजगार को नई गति देगा।
अब सभी की निगाहें विधानसभा में पेश होने वाले बजट पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट होगा कि सरकार किन क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा फोकस करने जा रही है और विपक्ष के आरोपों का जवाब किस तरह देती है।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने चिनाब ब्रिज के उद्घाटन अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की. उन्होंने कहा कि हमारे प्रधानमंत्री ने वह कर दिखाया जो अंग्रेज भी नहीं कर सके. चिनाब ब्रिज प्रोजेक्ट को पूरा होते हुए देखना सबका सपना था, जिसे आज पीएम मोदी ने पूरा कर दिखाया है.
प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार को जम्मू कश्मीर के रियासी जिले में चिनाब नदी पर बने दुनिया के सबसे ऊंचे रेल ब्रिज पर तिरंगा लहराकर उद्घाटन किया. इसके बाद पीएम ने अंजी ब्रिज और कटर में कश्मीर की पहली ट्रेन वंदे भारत को हरी झंडी भी दिखाई.
‘अंग्रेजों ने नहीं, मोदी ने पूरा किया काम’
CM उमर अब्दुल्ला ने तारीफ करते हुए कहा कि जो काम अंग्रेज न कर सके, वो काम पीएम मोदी ने पूरा कर दिखाया. उन्होंने कहा कि जब ये प्रोजेक्ट शुरू हुआ तो मैं 8वीं क्लास में था. अब मैं 55 साल का हो गया हूं. इस प्रोजेक्ट से जम्मू-कश्मीर को बहुत फायदा होगा. स्थानीय लोगों को आने वाले दिनों में बहुत लाभ मिलने जा रहा है. चिनाब ब्रिज से प्रदेश के विकास में तेजी आएगी. उमर ने आगे कहा कि इसका ख्वाब कई दशकों तक देखा गया. अंग्रेजों तक ने यह सपना देखा. लेकिन, जो अंग्रेज के हाथों न पूरा हो सका वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल में संपन्न हुआ.
इससे राज्य करेगा तरक्की
उमर अब्दुल्ला ने कहा कि इस परियोजना से राज्य के विकास में तेजी आएगी. इससे राज्य के किसानों, विशेषकर सेब का व्यापार करने वालों लोगों को बहुत फायदा होगा. अब कश्मीर में पैदा होने वाले सेब देश के अलग-अलग हिस्से में आसानी पहुंच सकेंगे, जिससे देश की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगा. उन्होंने कहा कि इससे न केवल आमदनी बढ़ेगी बल्कि युवाओं को भी रोजगार मिलेगा.
जम्मू-कश्मीर को मिलीं दो नई ट्रेनें
पीएम ने कहा कि मुझे चिनाब ब्रिज और अंजी ब्रिज का उद्घाटन करने का मौका मिला, यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है. दो नई ट्रेनें जम्मू-कश्मीर को मिलीं. उन्होंने जम्मू-कश्मीर की जनता को संबोधित करते हुए कहा कि मैं इस विकास के लिए आप सबको बधाई देता हूं. यहां कई पीढ़ियां रेल कनेक्टिविटी का सपना देखते हुईं गुजर गईं. उन्होंने सीएम उमर की बातों का जिक्र करते हुए बोला कि उमर कहते है कि जब वे सातवीं-आठवीं क्लास में पढ़ते थे, तब से इस प्रोजेक्ट के पूरा होने का इंतजार कर रहे थे. इसके आगे उन्होंने कहा कि आज लाखों लोगों का सपना पूरा हुआ.
पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग भी उठाई
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शुक्रवार को एक सार्वजनिक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष राज्य को पुनः पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग की. उन्होंने कहा कि इस मंच पर चार लोग हैं जो 2014 में कटरा रेलवे स्टेशन के उद्घाटन के समय मौजूद थे. आप (प्रधानमंत्री मोदी) उस समय पहली बार प्रधानमंत्री बने थे. मनोज सिन्हा रेल राज्य मंत्री थे, और मैं राज्य का मुख्यमंत्री था.






