नई दिल्ली, 21 अगस्त 2026
वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच राजनीतिक विवाद लगातार तेज होता जा रहा है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भारतीय जनता पार्टी के आरोपों पर पलटवार करते हुए सवाल उठाया कि अगर कांग्रेस के ऐतिहासिक फैसलों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो क्या बीजेपी उस दौर के दूसरे नेताओं के फैसलों को भी नहीं मानेगी? उन्होंने खास तौर पर सरदार पटेल के फैसले का हवाला देते हुए बीजेपी से सवाल किया।
यह विवाद कांग्रेस की ओर से वंदे मातरम् के केवल दो स्टैंजा गाए जाने के फैसले को लेकर शुरू हुआ। बीजेपी ने कांग्रेस के इस फैसले को राष्ट्रगीत का अपमान बताते हुए तीखा हमला बोला है। वहीं कांग्रेस का कहना है कि दो स्टैंजा का चयन ऐतिहासिक परिस्थितियों और उस समय लिए गए निर्णयों से जुड़ा है।
इमरान मसूद ने क्या कहा?
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने आजतक से बातचीत में बीजेपी के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि मुसलमानों को भी अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चलने और अपनी बात रखने का अधिकार है।
उन्होंने कांग्रेस के दो स्टैंजा वाले फैसले का बचाव करते हुए कहा कि 1937 में इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी और उस समय रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह तथा सुभाष चंद्र बोस से विचार-विमर्श का भी संदर्भ सामने आता है।
मसूद ने बीजेपी के सामने सवाल रखा कि अगर पार्टी नेहरू और टैगोर के उस ऐतिहासिक संदर्भ को स्वीकार नहीं करना है, तो फिर सरदार पटेल के फैसले का क्या होगा? उनका तर्क था कि वंदे मातरम् के दो स्टैंजा को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार करने का फैसला उस समय की ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा था।
धार्मिक मान्यताओं का भी दिया हवाला
वंदे मातरम् को लेकर अपने बयान में इमरान मसूद ने धार्मिक मान्यताओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत और उसका उपदेश किया जा सकता है।
उनका कहना था कि किसी व्यक्ति की धार्मिक मान्यता और राष्ट्रीय भावना को एक-दूसरे के विरोध में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया कि राष्ट्रीय गीत के मुद्दे को राजनीतिक विवाद में बदला जा रहा है।
मसूद ने यह भी आरोप लगाया कि बीजेपी ने राष्ट्रीय गान के सम्मान को लेकर भी ऐसी राजनीति की है जिसमें राष्ट्रीय गीत को राष्ट्रीय गान से ऊपर रखने की कोशिश की जा रही है।
बीजेपी ने कांग्रेस को बताया ‘नई मुस्लिम लीग’
इमरान मसूद के बयान से पहले बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोला था।
नितिन नवीन ने कांग्रेस के केवल दो स्टैंजा गाने के फैसले को लेकर पार्टी को निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस आज ‘नई मुस्लिम लीग’ बन गई है और वंदे मातरम् के मुद्दे पर उसका रुख वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित है।
बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि वंदे मातरम् का अपमान उन हजारों स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों का अपमान है, जिन्होंने देश की आजादी के संघर्ष में इस गीत को प्रेरणा के रूप में अपनाया था।
उनका आरोप था कि कांग्रेस बार-बार राजनीतिक फायदे के लिए देश के स्वाभिमान से जुड़े मुद्दों पर समझौता करती रही है।
जेपी नड्डा ने भी साधा निशाना
बीजेपी सांसद जेपी नड्डा ने भी कांग्रेस के फैसले पर सवाल उठाया। उन्होंने 1937 के ऐतिहासिक निर्णय का हवाला देते हुए कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया।
नड्डा ने दावा किया कि उस समय वंदे मातरम् को दो हिस्सों में बांटने के निर्णय ने आगे चलकर दो-राष्ट्र सिद्धांत को मजबूती दी और देश के विभाजन का रास्ता तैयार करने वाली परिस्थितियों को बढ़ावा मिला।
उनके मुताबिक, वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर केंद्र सरकार इस ऐतिहासिक मुद्दे को नए सिरे से सामने ला रही है।
सरकार का फोकस वंदे मातरम् के पूर्ण गायन पर
जेपी नड्डा ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने वंदे मातरम् से जुड़े पुराने विवाद को दूर करने की दिशा में कदम उठाया है।
उनके अनुसार, सरकार ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की इस रचना के पूर्ण गायन और सरकारी समारोहों में इसके पूर्ण रूप से गाए जाने को कानूनी स्वरूप देने का निर्णय लिया है।
बीजेपी का तर्क है कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है।
कांग्रेस का तर्क ऐतिहासिक फैसले पर आधारित
दूसरी ओर कांग्रेस अपने फैसले को इतिहास से जोड़कर देख रही है। पार्टी का कहना है कि वंदे मातरम् के कुछ अंशों को लेकर आपत्तियों और उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए 1937 में एक निर्णय लिया गया था।
इमरान मसूद ने इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कहा कि आज उस निर्णय को केवल राजनीतिक नजरिए से देखना उचित नहीं है। उनके मुताबिक उस समय राष्ट्रीय नेताओं के बीच विचार-विमर्श के बाद यह व्यवस्था सामने आई थी।
राष्ट्रीय गीत बनाम राष्ट्रीय गान की बहस
इस विवाद के बीच राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् और राष्ट्रीय गान जन गण मन को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
वंदे मातरम् को भारत के राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है, जबकि जन गण मन राष्ट्रीय गान है। दोनों का स्वतंत्रता आंदोलन और भारतीय राष्ट्रीय पहचान के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
मसूद ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वह दोनों के बीच ऐसी राजनीतिक तुलना खड़ी कर रही है जिससे विवाद और बढ़ रहा है।
1937 का फैसला क्यों बना मुद्दा?
पूरे विवाद का एक बड़ा हिस्सा 1937 में लिए गए उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें वंदे मातरम् के कुछ हिस्सों को लेकर राजनीतिक और धार्मिक आपत्तियों के बीच इसके शुरुआती दो स्टैंजा को स्वीकार करने की बात सामने आई थी।
आज बीजेपी इसी ऐतिहासिक निर्णय को कांग्रेस की कथित तुष्टिकरण नीति से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस इसे उस समय की परिस्थितियों और राष्ट्रीय नेताओं के बीच हुई चर्चा का परिणाम बता रही है।
इसी ऐतिहासिक संदर्भ को लेकर इमरान मसूद ने बीजेपी से सवाल किया कि अगर आज उस फैसले पर सवाल उठाया जा रहा है, तो क्या उस समय के अन्य राष्ट्रीय नेताओं की भूमिका और निर्णयों को भी नकारा जाएगा?
वंदे मातरम् के 150 साल और बढ़ा विवाद
इस साल वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ से जुड़ी गतिविधियों के बीच इस मुद्दे को विशेष राजनीतिक महत्व मिल गया है।
केंद्र सरकार और बीजेपी इस अवसर को राष्ट्रगीत के इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका को सामने रखने के अवसर के रूप में देख रही है। वहीं विपक्षी दल इस मुद्दे को धार्मिक स्वतंत्रता और ऐतिहासिक निर्णयों के संदर्भ में देख रहे हैं।
इसी वजह से वंदे मातरम् का मुद्दा अब केवल सांस्कृतिक या ऐतिहासिक बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संसद और राजनीतिक मंचों पर भी प्रमुख मुद्दा बन गया है।
बीजेपी और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप
बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति के कारण वंदे मातरम् के पूर्ण गायन से दूरी बनाई है। पार्टी नेताओं ने इसे राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सम्मान से जोड़ते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा है।
कांग्रेस की ओर से जवाब में कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय भावना का सम्मान करते हुए भी धार्मिक स्वतंत्रता और ऐतिहासिक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इमरान मसूद ने बीजेपी पर पलटवार करते हुए यहां तक कहा कि बीजेपी को यह बताना चाहिए कि वह सरदार पटेल जैसे नेताओं के ऐतिहासिक फैसलों को किस नजर से देखती है।
मुद्दा अब राजनीतिक बहस का केंद्र
वंदे मातरम् को लेकर शुरू हुआ यह विवाद आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है। एक तरफ बीजेपी इसे राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सम्मान का मुद्दा बना रही है, जबकि कांग्रेस इसे इतिहास, धार्मिक मान्यताओं और संवैधानिक अधिकारों से जोड़ रही है।
इमरान मसूद के बयान ने विवाद को एक और राजनीतिक आयाम दे दिया है। उनके “क्या सरदार पटेल का फैसला भी नहीं मानेंगे?” वाले सवाल ने बीजेपी के ऐतिहासिक तर्कों पर कांग्रेस की ओर से सीधा पलटवार किया है।
फिलहाल दोनों प्रमुख राजनीतिक दल अपने-अपने तर्कों के साथ मैदान में हैं। वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के बीच यह विवाद केवल एक गीत के गायन तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि यह इतिहास, राष्ट्रवाद, धार्मिक स्वतंत्रता और राजनीति के बीच चल रही बड़ी बहस का हिस्सा बन गया है।
150 से ज्यादा सिविल सोसायटी प्रतिनिधियों की बैठक, राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग
श्रीनगर | 8 जुलाई 2026
जम्मू-कश्मीर में पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। मंगलवार को श्रीनगर स्थित Sher-i-Kashmir International Convention Centre (SKICC) में आयोजित एक बैठक में 150 से अधिक सिविल सोसायटी प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार से बिना किसी और देरी के जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग करते हुए सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया। बैठक में Farooq Abdullah और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah भी मौजूद रहे।
बैठक में शिक्षाविदों, व्यापारिक संगठनों, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और विभिन्न नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। पारित प्रस्ताव में केंद्र सरकार से अपने पूर्व आश्वासन को पूरा करते हुए जम्मू-कश्मीर को जल्द से जल्द पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की अपील की गई। प्रस्ताव में कहा गया कि राज्य का दर्जा बहाल होना लोकतांत्रिक व्यवस्था और लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप आवश्यक कदम है।
बैठक को संबोधित करते हुए फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि पूर्ण राज्य का दर्जा केंद्र सरकार का किया हुआ वादा है और अब इसे और अधिक समय तक टाला नहीं जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रभावी प्रशासन के लिए राज्य का दर्जा मिलना जरूरी है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बैठक के बाद कहा कि सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों से उपयोगी सुझाव प्राप्त हुए हैं और सभी ने एक स्वर में राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर के नागरिक समाज की सामूहिक आवाज को दर्शाता है और केंद्र सरकार को इस पर शीघ्र निर्णय लेना चाहिए।
यह बैठक 20 जुलाई को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन की तैयारियों का भी हिस्सा मानी जा रही है। नेशनल कॉन्फ्रेंस राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम कर रही है और विभिन्न राजनीतिक दलों व सामाजिक संगठनों का समर्थन जुटा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा बहाल करने की बहस को नई गति दे सकता है। हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय केंद्र सरकार के स्तर पर लिया जाना है और फिलहाल सरकार की ओर से इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

शुभेंदु के आरोपों पर FICCI का जवाब, कहा- सरकार ने ही बनाया था इंडस्ट्री पार्टनर
कोलकाता | 24 जून 2026
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद उद्योग संगठन FICCI (Federation of Indian Chambers of Commerce and Industry) ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि राज्य सरकार ने स्वयं उन्हें “नेशनल इंडस्ट्री पार्टनर” के रूप में चुना था। संगठन ने स्पष्ट किया कि उसकी भूमिका पूरी तरह पेशेवर और संस्थागत रही है तथा सभी गतिविधियां सरकार के साथ समन्वय में संचालित की गई थीं।
FICCI की ओर से जारी बयान में कहा गया कि संगठन वर्षों से देश के विभिन्न राज्यों के साथ निवेश, उद्योग और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए काम करता रहा है। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा भी उद्योग और निवेश से जुड़े आयोजनों के लिए FICCI को आधिकारिक रूप से नेशनल इंडस्ट्री पार्टनर नियुक्त किया गया था।
यह बयान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा हाल ही में लगाए गए उन आरोपों के जवाब में आया है, जिनमें उन्होंने उद्योग आयोजनों और निवेश प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए थे। FICCI ने कहा कि संगठन हमेशा पारदर्शिता, निष्पक्षता और संस्थागत प्रक्रियाओं के तहत कार्य करता है तथा उसका उद्देश्य केवल उद्योग और निवेश को बढ़ावा देना है।
संगठन ने यह भी कहा कि उसने राज्य में निवेश आकर्षित करने, उद्योग जगत और सरकार के बीच संवाद स्थापित करने तथा आर्थिक विकास को गति देने के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए हैं। इन सभी कार्यक्रमों में संबंधित सरकारी विभागों की भागीदारी और सहमति शामिल रही है।
इस मुद्दे पर राजनीतिक और औद्योगिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। उद्योग जगत के कई विशेषज्ञों का मानना है कि निवेश और औद्योगिक विकास के मामलों में सरकार और उद्योग संगठनों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है ताकि राज्य में निवेशकों का भरोसा बना रहे।
फिलहाल मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से FICCI के ताजा बयान पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, इस बयान के बाद मामला राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टिकोण से चर्चा का विषय बन गया है।

नेहरू से आगे निकले मोदी, 4399 दिनों का ऐतिहासिक रिकॉर्ड
नई दिल्ली, 10 जून 2026
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भारतीय राजनीति में एक नया इतिहास रच दिया है। 10 जून 2026 को उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru के लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल का रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिया। इस उपलब्धि के साथ मोदी भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार चुने गए प्रधानमंत्री बन गए हैं।
4399 दिनों का रिकॉर्ड
प्रधानमंत्री मोदी 26 मई 2014 से लगातार प्रधानमंत्री पद पर हैं। 10 जून 2026 को उनका कार्यकाल 4,399 दिनों तक पहुंच गया, जो नेहरू के निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में 4,398 दिनों के रिकॉर्ड से अधिक है।
भाजपा और NDA में जश्न
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर सत्तारूढ़ गठबंधन NDA और भाजपा ने विशेष कार्यक्रम आयोजित किए। पार्टी नेताओं ने इसे लोकतंत्र में जनता के लगातार विश्वास का प्रतीक बताया और मोदी के नेतृत्व को देश के विकास से जोड़ा।
12 साल की उपलब्धियां
मोदी सरकार ने अपने 12 वर्षों के कार्यकाल में बुनियादी ढांचे, डिजिटल सेवाओं, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, सामाजिक कल्याण योजनाओं और वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को प्रमुख उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया है। प्रधानमंत्री ने भी कहा कि सरकार “और अधिक गति तथा संकल्प के साथ” आगे बढ़ती रहेगी।
लेकिन अब शुरू होती है असली चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रिकॉर्ड बनाना बड़ी उपलब्धि है, लेकिन आने वाले वर्षों में मोदी सरकार के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं।
प्रमुख अग्निपरीक्षाएं:
1. अर्थव्यवस्था और रोजगार
युवा आबादी के लिए रोजगार सृजन और आर्थिक विकास की गति बनाए रखना सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
2. गठबंधन राजनीति का संतुलन
तीसरे कार्यकाल में भाजपा पूर्ण बहुमत से दूर है और NDA सहयोगियों की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
3. विकसित भारत 2047 का लक्ष्य
सरकार ने 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया है। इसके लिए निवेश, उद्योग, शिक्षा और तकनीकी क्षेत्र में तेज़ प्रगति आवश्यक होगी।
4. वैश्विक चुनौतियां
भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीच भारत की स्थिति मजबूत बनाए रखना भी बड़ी जिम्मेदारी होगी।
विपक्ष की नजर
जहां भाजपा इस रिकॉर्ड को ऐतिहासिक उपलब्धि बता रही है, वहीं विपक्ष सरकार की नीतियों, बेरोजगारी, महंगाई और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठा रहा है। इसलिए आने वाले वर्षों में मोदी सरकार के प्रदर्शन पर देश और दुनिया दोनों की नजर रहेगी।
निष्कर्ष
नेहरू का रिकॉर्ड पीछे छोड़ना प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक जीवन का एक ऐतिहासिक पड़ाव है। लेकिन राजनीति में रिकॉर्ड केवल इतिहास बनाते हैं, भविष्य नहीं। असली परीक्षा अब इस बात की होगी कि क्या मोदी सरकार अगले दो दशकों के लिए भारत के विकास और वैश्विक नेतृत्व के अपने विजन को जमीन पर उतार पाती है या नहीं।

Kerala Assembly Elections Result 2026: केरल में सरकार बनाने के लिए कितनी सीटों की जरूरत
04 मई 2026
केरल में वोटों की गिनती जारी है। सभी 140 सीटों पर कड़ी सुरक्षा के बीच मतगणना हो रही है। केरल में सरकार बनाने के लिए कुल 140 विधानसभा सीटों में से कम से कम 71 सीटों की ज़रूरत होती है। किसी पार्टी या गठबंधन को सत्ता में आने के लिए 71 सीटें जीतना जरुरी है। राज्य में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। केरल में बीजेपी का भी खाता खुलता दिख रहा है।
केरल में दस साल से है LDF की सरकार
केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) और कांग्रेस के नेतृत्व में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) बारी-बारी से सत्ता में आता रहा है। एकमात्र अपवाद 2021 के चुनाव में LDF अपनी सत्ता बचाने में कामयाब हुई थी। हालांकि इस बार कांग्रेस के नेतृत्व वाली UDF सत्ता में आती दिख रही है। केरल में पिछले 10 साल से लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार है और पिनाराई विजयन मुख्यमंत्री हैं। केरल ही पूरे देश में ऐसा राज्य है, जहां पर लेफ्ट पार्टियों की सरकार है।
केरल में हुई थी रिकॉर्ड वोटिंग
केरल में एक चरण में सभी 140 सीटों पर वोट डाले गए थे। चुनाव आयोग के मुताबिक, राज्य में कुल मतदान 79.63% तक मतदान हुए थे। एसआईआर के बाद भारी मतदान से किसको फायदा होगा यह तो दोपहर बाद ही पता चल पाएगा।
केरल का क्या है एग्जिट पोल
केरल को लेकर लगभग सभी एग्जिट पोल ने सत्ता से एलडीएफ की सत्ता से विदाई और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ की जीत की संभावना जताई है। ‘एक्सिस माय इंडिया’ के एग्जिट पोल में कहा गया है कि यूडीएफ को 78 से 90 सीटें मिल सकती हैं, वहीं एलडीएफ को 49 से 62 सीटें मिलने का अनुमान है। ‘पीपुल्स प्लस’ ने केरल में यूडीएफ को 75 से 85 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत मिलने की संभावना जताई है। उसका अनुमान है कि माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ को 55 से 65 सीटें ही मिलेंगी और वह सत्ता से बाहर हो जाएगा। ‘वोट वाइब’ के सर्वे में कहा गया है कि यूडीएफ को 70 से 80 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि एलडीएफ को 58 से 68 सीटें मिल सकती हैं।
‘पीपुल्स इनसाइट’ के सर्वेक्षण के अनुसार, यूडीएफ को 66 से 76 सीटें हासिल हो सकती हैं तथा एलडीएफ को 58 से 68 सीटें हासिल होने का अनुमान है। उसने भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को 10 से 14 सीटें मिलने का अनुमान जताया है। मैट्रिज के एग्जिट पोल में केरल में सत्तारूढ़ LDF को 60 से 65 सीटें मिल सकती हैं, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF को 70 से 75 सीटें मिलने का अनुमान है।
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महिला आरक्षण पर BJP–Congress आमने-सामने, भोपाल में कांग्रेस का बड़ा प्रदर्शन; विशेष सत्र से पहले सियासी गर्मी तेज
भोपाल, 26 अप्रैल 2026।

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5 राज्यों की सियासत में वोट प्रतिशत का खेल: बंगाल में 5% स्विंग से BJP को बढ़त, असम में मुस्लिम वोट बना बड़ा फैक्टर
नई दिल्ली | 30 मार्च, 2026
देश के पांच राज्यों में आगामी चुनावों को लेकर सियासी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार, छोटे-छोटे वोट प्रतिशत में बदलाव भी बड़े चुनावी नतीजे तय कर सकते हैं। खासतौर पर पश्चिम बंगाल और असम में स्थिति बेहद दिलचस्प मानी जा रही है।
बंगाल में 5% वोट स्विंग से बदल सकता है समीकरण
विश्लेषकों का मानना है कि अगर ममता बनर्जी की पार्टी के करीब 5% वोट खिसकते हैं, तो भारतीय जनता पार्टी राज्य में नंबर-1 पार्टी बन सकती है।
पिछले चुनावों में दोनों दलों के बीच वोट प्रतिशत का अंतर बहुत ज्यादा नहीं था, ऐसे में छोटा बदलाव भी बड़ा असर डाल सकता है।
असम में मुस्लिम वोट निर्णायक
वहीं असम में करीब 34% मुस्लिम मतदाता चुनावी परिणामों में अहम भूमिका निभा सकते हैं। यदि यह वोट बैंक एकजुट होकर मतदान करता है, तो हिमंत बिस्व सरमा के नेतृत्व वाली सरकार के लिए वापसी मुश्किल हो सकती है।
5 राज्यों में BJP की बड़ी परीक्षा
इन चुनावों में बीजेपी के लिए कई राज्यों में अपनी साख और विस्तार दोनों दांव पर हैं। पार्टी एक ओर सत्ता बचाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी ओर नए क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास भी कर रही है।
विपक्ष की रणनीति भी तेज
दूसरी तरफ विपक्षी दल भी वोट बैंक को एकजुट करने और स्थानीय मुद्दों को उभारने में जुटे हुए हैं। खासतौर पर क्षेत्रीय पार्टियां अपने-अपने राज्यों में मजबूत चुनौती पेश कर रही हैं।
छोटे बदलाव, बड़ा असर
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मौजूदा समय में चुनाव केवल बड़े मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि सूक्ष्म स्तर पर वोट शेयर के उतार-चढ़ाव पर भी निर्भर हो गए हैं। 3-5% वोट का इधर-उधर होना सरकार बनाने या गिराने में निर्णायक साबित हो सकता है।
नजरें चुनावी रणनीतियों पर
आने वाले समय में सभी दल अपने-अपने वोट बैंक को साधने के लिए नई रणनीतियां अपनाएंगे। जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय समीकरणों के साथ विकास के मुद्दे भी चुनावी बहस का केंद्र रहेंगे।
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को हटाने के लिए विपक्ष लाएगा प्रस्ताव, जानिए आगे की प्रक्रिया क्या होगी
नई दिल्ली | 09 मार्च 2026
नई दिल्ली | लोकसभा में आज विपक्षी दल स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव पेश करने जा रहे हैं। इस कदम से संसद में राजनीतिक माहौल गरमा गया है। विपक्ष ने सदन की कार्यवाही के पहले हिस्से में इस प्रस्ताव का नोटिस दिया था।
इस प्रस्ताव के मद्देनजर प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने सांसदों को सदन में उपस्थित रहने के लिए तीन लाइन व्हिप जारी किया है। भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों ने अपने सांसदों को महत्वपूर्ण मतदान के दौरान सदन में मौजूद रहने के निर्देश दिए हैं।
विपक्ष के आरोप
विपक्षी दलों का आरोप है कि स्पीकर सदन की कार्यवाही के संचालन में निष्पक्षता नहीं बरत रहे हैं और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्ष को पर्याप्त समय नहीं दिया जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए यह प्रस्ताव लाया गया है।
हालांकि, सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को निराधार बताया है और कहा है कि स्पीकर ने हमेशा नियमों के अनुसार सदन की कार्यवाही संचालित की है।
प्रस्ताव का आगे का प्रोसेस
लोकसभा में स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया संविधान और सदन के नियमों के तहत तय होती है।
- नोटिस देना:
किसी भी सांसद को स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव के लिए लिखित नोटिस देना होता है, जिसे निर्धारित संख्या में सांसदों का समर्थन होना चाहिए। - चर्चा की अनुमति:
नोटिस स्वीकार होने के बाद इस पर चर्चा के लिए दिन तय किया जाता है। उस दिन सदन में प्रस्ताव पर विस्तृत बहस होती है। - स्पीकर की भूमिका:
जब स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव पर चर्चा होती है, तो वे सदन की अध्यक्षता नहीं करते। इस दौरान कार्यवाही की अध्यक्षता किसी अन्य सदस्य या डिप्टी स्पीकर द्वारा की जाती है। - वोटिंग:
चर्चा के बाद प्रस्ताव पर मतदान होता है। यदि सदन के बहुमत सदस्य प्रस्ताव के पक्ष में वोट देते हैं, तो स्पीकर को पद छोड़ना पड़ता है।
राजनीतिक महत्व
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रस्ताव संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ते टकराव का संकेत है। हालांकि लोकसभा में संख्या बल के लिहाज से सत्तारूढ़ दल मजबूत स्थिति में है, इसलिए प्रस्ताव के पारित होने की संभावना कम मानी जा रही है।
फिर भी इस मुद्दे पर होने वाली बहस संसद के भीतर राजनीतिक रणनीति और विपक्ष की एकजुटता की परीक्षा मानी जा रही है।
INDI गठबंधन की कमान को लेकर सियासी हलचल: अय्यर के बयान से बढ़ी चर्चा, विपक्षी दलों में प्रतिक्रिया तेज
23 फरवरी 2026
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर के ताज़ा बयान ने विपक्षी राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने सुझाव दिया कि राहुल गांधी को INDI गठबंधन की कमान किसी अन्य वरिष्ठ नेता को सौंप देनी चाहिए ताकि गठबंधन को अधिक समय और सक्रिय नेतृत्व मिल सके। अय्यर का कहना है कि गठबंधन को मजबूत करने के लिए नेतृत्व ऐसा होना चाहिए जो सभी दलों को संतुलित समय दे सके और साझा रणनीति पर फोकस कर सके।
उन्होंने संभावित नेताओं के तौर पर ममता बनर्जी, एम. के. स्टालिन, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जैसे नामों का जिक्र किया। उनके मुताबिक ये नेता क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत जनाधार रखते हैं और गठबंधन को समय देकर उसे चुनावी तौर पर अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
कांग्रेस और सहयोगी दलों की प्रतिक्रिया
अय्यर के बयान पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर ही अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। पार्टी के कई नेताओं ने इसे उनका व्यक्तिगत विचार बताया और कहा कि गठबंधन के नेतृत्व का फैसला सामूहिक सहमति से होता है, न कि सार्वजनिक बयानबाज़ी से।
वहीं तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भी बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि विपक्षी एकता को लेकर सार्वजनिक मंचों पर ऐसे बयान देना राजनीतिक रूप से उचित नहीं है और इससे विपक्षी एकजुटता की छवि प्रभावित हो सकती है।
गठबंधन की रणनीति पर बढ़ी चर्चा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अय्यर की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब विपक्षी दल आगामी चुनावों को लेकर साझा रणनीति बनाने में जुटे हैं। ऐसे में नेतृत्व को लेकर उठी यह बहस संकेत देती है कि गठबंधन के भीतर नेतृत्व मॉडल और समन्वय तंत्र पर अभी भी चर्चा जारी है।
हालांकि, अभी तक गठबंधन के किसी आधिकारिक मंच से नेतृत्व परिवर्तन को लेकर कोई संकेत नहीं दिया गया है। सूत्रों के अनुसार, विपक्षी दल फिलहाल सीट-शेयरिंग, साझा एजेंडा और चुनावी रणनीति पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं, ताकि चुनावी मुकाबले में एकजुटता दिखाई जा सके।
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केंद्र में मोदी सरकार के 11 साल पूरे हो गए हैं। इसको लेकर भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की है। नड्डा ने कहा कि मोदी सरकार जनता के नेतृत्व वाली सरकार है। पिछले कुछ सालों में हमने पारदर्शिता लाई है और एक दूरदर्शी, फ्यूचर ओरिएंटेड प्रशासन बनाया है। इसीलिए हम विकसित भारत की बात करते हैं। यह अमृत काल है। पिछले 11 सालों ने वास्तव में विकसित और आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव रखी है।
इन सिद्धांतों पर किया गया काम
बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमने सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास के मूल सिद्धांत पर काम किया है। मोदी सरकार की योजनाओं से आम जनता को खासा लाभ हुआ है।
11 सालों में मोदी सरकार ने लिए ऐतिहासिक फैसले
इसके साथ ही नड्डा ने कहा, ‘एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 11 साल के शासन का पूरा लेखा-जोखा पेश करना मुश्किल है, लेकिन हमारी सरकार ने लगातार राष्ट्रहित में साहसिक और ऐतिहासिक फैसले लिए हैं। कुछ उदाहरण लें तो हमने अनुच्छेद 370 को हटाया और तीन तलाक को खत्म किया। हमने नया वक्फ अधिनियम बनाया और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित किया। हमने विधायी निकायों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण भी सुनिश्चित किया है।’
लोगों की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि
नड्डा ने कहा कि मोदी सरकार के तहत नेतृत्व में मजबूत भरोसे के कारण लोगों की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह वही देश है, जहां पहले शिक्षा मंत्रियों को एक साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने में भी संघर्ष करना पड़ता था। लेकिन आज हम सामूहिक रूप से राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) पर सहमत हुए हैं। जो कि हमारे इतिहास में सबसे व्यापक और सबसे समावेशी परामर्श प्रक्रियाओं में से एक का परिणाम है।
स्वच्छ भारत सबसे सफल आंदोलन बना
पार्टी अध्यक्ष ने आगे कहा, ‘एक समग्र दृष्टिकोण के कारण, हमने बिना किसी भ्रम या अराजकता के सुचारू रूप से एक नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति पेश की है। स्वच्छ भारत जैसी पहल सबसे सफल जन आंदोलनों में से एक बन गई है।’
जिम्मेदार व जवाबदेह वाली सरकार है
केंद्रीय मंत्री एवं पार्टी अध्यक्ष नड्डा ने कहा कि देश में 11 साल पहले, तुष्टिकरण व समाज को खंडित करके अपनी कुर्सी को सुरक्षित रखना राजनीतिक संस्कृति का तरीका बन गया था। लेकिन 2014 के बाद पीएम मोदी के नेतृत्व वाली जिम्मेदार व जवाबदेह सरकार आई, जिसने रिपोर्ट कार्ड की राजनीति शुरू की। हम जो काम कर रहे हैं, उसे जनता के सामने रखें। उन्होंने कहा कि पिछले 11 साल में पीएम मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने भारत की राजनीति की संस्कृति को बदला है।







