आस्था और संस्कृति

महाशिवरात्रि से पहले काशी में विवाहोत्सव की धूम, 13 फरवरी को बाबा विश्वनाथ को लगेगी शगुन की हल्दी

यह एक हिंदू देवता, संभवतः भगवान दत्तात्रेय की मूर्ति की तस्वीर है, जिसमें उनके तीन चेहरे दिखाई दे रहे हैं। मूर्ति को पूरी तरह से पीले और नारंगी गेंदे के फूलों की मालाओं से सजाया गया है। भगवान का दाहिना हाथ 'आशीर्वाद मुद्रा' में है। पृष्ठभूमि में पीले रंग का कपड़ा है और बगल में एक चांदी का त्रिशूल दिखाई दे रहा है।
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महाशिवरात्रि से पहले काशी में विवाहोत्सव की धूम, 13 फरवरी को बाबा विश्वनाथ को लगेगी शगुन की हल्दी

वाराणसी |09 फरवरी 2026

महादेव–पार्वती विवाह की प्राचीन परंपराओं से सजेगी शिव की नगरी, 15 फरवरी को मनाई जाएगी महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि के पावन पर्व से पूर्व भगवान शिव की नगरी काशी में भक्तिमय उल्लास और विवाहोत्सव की तैयारियां जोरों पर हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर और उससे जुड़ी प्राचीन परंपराएं इस पर्व को विशेष और अद्वितीय बनाती हैं। इस वर्ष महाशिवरात्रि 15 फरवरी को पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी, जबकि काशी में इसकी तैयारियां पहले ही शुरू हो चुकी हैं।

वाराणसी, जिसे भगवान शंकर की नगरी कहा जाता है, यहां महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं बल्कि भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह का उत्सव माना जाता है। इसी परंपरा के अंतर्गत बाबा विश्वनाथ के विवाह से जुड़े कई मांगलिक अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं।

13 फरवरी को बाबा विश्वनाथ को लगेगी शगुन की हल्दी

प्राचीन परंपरा के अनुसार इस वर्ष 13 फरवरी को पूर्व महंत आवास पर भगवान काशी विश्वनाथ की पंचबदन प्रतिमा को विधि-विधान से शगुन की हल्दी लगाई जाएगी। यह अनुष्ठान बाबा के विवाहोत्सव की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है।

इस अवसर पर सभी धार्मिक अनुष्ठान शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार संपन्न किए जाएंगे। आयोजन में महिलाएं पारंपरिक मांगलिक गीत गाएंगी, वहीं बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा को हल्दी अर्पित करेंगे। यह रस्म बाबा के वैवाहिक मांगलिक कार्यक्रम का प्रतीक मानी जाती है।

विवाहोत्सव से जुड़ी परंपराओं का होगा निर्वहन

हल्दी समारोह के साथ ही बाबा विश्वनाथ के विवाह से जुड़ी अन्य रस्में भी चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएंगी। काशी में सदियों से चली आ रही ये परंपराएं भक्तों के लिए विशेष आस्था का केंद्र हैं। इन अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं की भागीदारी इसे और भी भव्य बना देती है।

महाशिवरात्रि पर काशी में रहेगा भक्तों का सैलाब

महाशिवरात्रि देश के लगभग सभी हिस्सों में मनाई जाती है, लेकिन काशी में इसकी रौनक सबसे अलग होती है। इस दिन शहर के विभिन्न क्षेत्रों से भव्य शिव बारात निकाली जाती हैं। प्रमुख धार्मिक स्थलों के साथ-साथ सभी शिवालयों को आकर्षक रोशनी और फूलों से सजाया जाता है।

महाशिवरात्रि के दिन रुद्राभिषेक, हवन-पूजन और विशेष आरतियों का आयोजन किया जाता है। सुबह से ही श्रद्धालुओं के मंदिरों में पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो देर रात तक जारी रहता है। काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं।

भक्तिमय माहौल में डूबी शिव की नगरी

महाशिवरात्रि के अवसर पर पूरी काशी हर-हर महादेव के जयघोष से गूंज उठती है। शिव-भक्ति, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम इस पर्व को और भी विशेष बना देता है। बाबा विश्वनाथ के विवाहोत्सव से लेकर महाशिवरात्रि तक काशी पूरी तरह शिवमय हो जाती है।

यह एक हिंदू देवता, संभवतः भगवान दत्तात्रेय की मूर्ति की तस्वीर है, जिसमें उनके तीन चेहरे दिखाई दे रहे हैं। मूर्ति को पूरी तरह से पीले और नारंगी गेंदे के फूलों की मालाओं से सजाया गया है। भगवान का दाहिना हाथ 'आशीर्वाद मुद्रा' में है। पृष्ठभूमि में पीले रंग का कपड़ा है और बगल में एक चांदी का त्रिशूल दिखाई दे रहा है।



मंदिरों का शहर जम्मू बाबा बर्फानी के रंग में रंग गया है। शुक्रवार को तड़के बम भोले के जयघोष के साथ पहल जत्था कश्मीर घाटी के लिए रवाना हुआ। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने जत्थे को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। पहले जत्थे में कुल 4603 तीर्थयात्री जम्मू के भगवती नगर आधार शिविर से रवाना हुए।

यह तीर्थयात्री बालटाल और पहलगाम आधार शिविर पहुंचेंगे। उसके बाद शनिवार सुबह तड़के पवित्र गुफा की ओर यात्रा आरंभ करेंगे।  इस बार यात्रा 52 दिन तक चलेगी। यात्रा 29 जून से शुरू होने जा रही है। 19 अगस्त तक बाबा बर्फानी के भक्त उनके दर्शन कर सकेंगे।

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