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अंतरिक्ष में भारत की नई ‘आंख’, ISRO ने सफलतापूर्वक लॉन्च किया EOS-05

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श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश | 4 सितंबर 2026

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने शुक्रवार तड़के अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की। ISRO ने GSLV-F17 रॉकेट के जरिए देश के अत्याधुनिक पृथ्वी अवलोकन उपग्रह EOS-05 को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। यह प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर के दूसरे लॉन्च पैड से हुआ। रॉकेट ने सुबह 2:55 बजे IST उड़ान भरी।

इस मिशन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि EOS-05 भारत का पहला इमेजिंग सैटेलाइट है जिसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से पृथ्वी की निगरानी के लिए तैयार किया गया है। करीब 2367 किलोग्राम वजनी यह उपग्रह पृथ्वी से लगभग 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षा में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है।

2:55 बजे श्रीहरिकोटा से हुआ सफल लॉन्च

GSLV-F17 ने शुक्रवार सुबह निर्धारित समय पर श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से उड़ान भरी। यह GSLV की 19वीं उड़ान थी। ISRO के मुताबिक रॉकेट ने EOS-05 को सफलतापूर्वक उसकी निर्धारित Sub-Geosynchronous Transfer Orbit में पहुंचाया।

करीब 18 मिनट बाद EOS-05 को रॉकेट से अलग कर उसकी ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया गया। इसके बाद उपग्रह को अपनी अंतिम जियोसिंक्रोनस कक्षा तक पहुंचने के लिए आगे की ऑर्बिट-रेजिंग प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

EOS-05 क्यों है इतना खास?

EOS-05 को सामान्य अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट से अलग इसलिए माना जा रहा है क्योंकि इसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से इमेजिंग के लिए तैयार किया गया है।

आमतौर पर पृथ्वी की तस्वीरें लेने वाले कई सैटेलाइट अपेक्षाकृत निचली कक्षाओं में घूमते हैं। वे पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों के ऊपर से गुजरते हैं और किसी खास क्षेत्र की तस्वीरें निश्चित अंतराल के बाद लेते हैं।

इसके मुकाबले जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में मौजूद सैटेलाइट पृथ्वी के घूमने की गति के साथ तालमेल बनाए रख सकता है। करीब 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई से EOS-05 किसी बड़े क्षेत्र की बार-बार और ज्यादा लगातार निगरानी करने की क्षमता देगा।

‘आसमान की आंख’ की तरह करेगा काम

EOS-05 की क्षमता को भारत के लिए एक नई तरह की ‘स्पेस आई’ के रूप में देखा जा रहा है। इसका इस्तेमाल पृथ्वी की लगातार निगरानी से जुड़े कई महत्वपूर्ण कामों में किया जा सकता है।

इससे मौसम की निगरानी, चक्रवातों पर नजर, बाढ़, जंगलों में आग, कृषि और पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी में मदद मिल सकती है। इसके अलावा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों की निगरानी में भी इस तरह की क्षमता उपयोगी हो सकती है।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि किसी बड़े क्षेत्र की स्थिति में तेजी से बदलाव होने पर उसके बारे में ज्यादा लगातार इमेजरी और जानकारी उपलब्ध कराई जा सकेगी।

2367 किलोग्राम का भारी सैटेलाइट

EOS-05 का वजन लगभग 2367 किलोग्राम है। इसे GSLV-F17 के जरिए अंतरिक्ष में पहुंचाया गया। ISRO के अनुसार GSLV-F17 तीन चरणों वाला रॉकेट है, जिसमें ठोस, तरल और स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।

इस मिशन में GSLV-F17 ने चार मीटर व्यास वाले कंपोजिट ओगिव पेलोड फेयरिंग कॉन्फिगरेशन का इस्तेमाल किया। यह रॉकेट EOS-05 को सीधे अंतिम जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में नहीं ले गया, बल्कि पहले उसे Sub-GTO में स्थापित किया गया।

पहले की नाकामी के बाद बड़ी वापसी

EOS-05 मिशन को ISRO के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह 2021 में असफल हुए GSLV-F10/EOS-03 मिशन के बाद उसी तरह की जियो-इमेजिंग क्षमता को आगे बढ़ाने वाला मिशन है।

12 अगस्त 2021 को GSLV-F10 के जरिए EOS-03 को लॉन्च किया गया था, लेकिन क्रायोजेनिक अपर स्टेज में तकनीकी समस्या के कारण मिशन सफल नहीं हो पाया था। ISRO के आधिकारिक रिकॉर्ड में उस मिशन को असफल बताया गया है।

अब GSLV-F17 और EOS-05 की सफल उड़ान को उस चुनौती के बाद एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।

भारत की निगरानी क्षमता को मिलेगा नया आयाम

EOS-05 के सफल प्रक्षेपण से भारत की पृथ्वी अवलोकन क्षमता में एक नया आयाम जुड़ने की उम्मीद है। कम ऊंचाई वाली कक्षाओं में मौजूद सैटेलाइट जहां किसी क्षेत्र की तस्वीरें समय-समय पर उपलब्ध कराते हैं, वहीं जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से काम करने वाला EOS-05 बड़े क्षेत्र को अधिक लगातार देखने में सक्षम होगा।

इससे प्राकृतिक आपदाओं के समय स्थिति का आकलन करने, मौसम संबंधी घटनाओं पर नजर रखने और कृषि तथा पर्यावरण से जुड़े बदलावों को समझने में मदद मिल सकती है।

मिशन के बाद अब क्या होगा?

EOS-05 को लॉन्च के तुरंत बाद उसकी अंतिम कक्षा में नहीं रखा गया है। GSLV-F17 ने इसे पहले Sub-Geosynchronous Transfer Orbit में पहुंचाया है।

अब उपग्रह को अपनी ऑनबोर्ड प्रणोदन प्रणाली की मदद से धीरे-धीरे अंतिम जियोसिंक्रोनस कक्षा की ओर ले जाया जाएगा। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद EOS-05 अपने निर्धारित ऑपरेशनल ऑर्बिट से पृथ्वी की इमेजिंग शुरू करेगा।

ISRO के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मिशन?

यह मिशन केवल एक सैटेलाइट लॉन्च करने तक सीमित नहीं है। EOS-05 भारत के लिए एक ऐसी इमेजिंग क्षमता का रास्ता खोलता है, जिसमें किसी बड़े क्षेत्र को लगातार और ज्यादा बार देखा जा सकता है।

ISRO के लिए यह मिशन GSLV की विश्वसनीयता, स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक और उन्नत पृथ्वी अवलोकन क्षमताओं के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। ISRO ने इसे भारत की Earth Observation क्षमता को मजबूत करने वाला मिशन बताया है।

आगे की तैयारी पर भी रहेगी नजर

EOS-05 के सफल प्रक्षेपण के बाद अब वैज्ञानिकों का ध्यान उपग्रह को उसकी अंतिम कक्षा में स्थापित करने और उसके सिस्टम को सक्रिय करने पर रहेगा। इसके बाद प्राप्त होने वाली इमेजरी और डेटा का इस्तेमाल अलग-अलग पृथ्वी अवलोकन संबंधी जरूरतों में किया जा सकेगा।

यह मिशन भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में उस दिशा को भी मजबूत करता है, जिसमें सैटेलाइट तकनीक का इस्तेमाल केवल तस्वीरें लेने के लिए नहीं बल्कि मौसम, कृषि, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण और रणनीतिक निगरानी जैसे क्षेत्रों में अधिक प्रभावी तरीके से किया जा सके।

ISRO के आधिकारिक मिशन रिकॉर्ड में GSLV-F17/EOS-05 को 4 सितंबर 2026 को लॉन्च किए गए मिशन के रूप में दर्ज किया गया है।

‘नॉटी बॉय’ GSLV की सफल उड़ान

GSLV को लंबे समय से उसकी कुछ पिछली असफलताओं के कारण मीडिया में ‘नॉटी बॉय’ जैसे उपनाम से भी संबोधित किया जाता रहा है। ऐसे में GSLV-F17 की सफल उड़ान ने ISRO के वैज्ञानिकों के लिए इस मिशन को और खास बना दिया।

GSLV-F17 ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उड़ान भरी और EOS-05 को उसकी लक्षित ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंचाया। यह सफलता भारत की भारी उपग्रहों को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट तक पहुंचाने की क्षमता के लिए भी महत्वपूर्ण है।


सिख कैदियों की रिहाई की मांग पर पंजाब बंद, जालंधर से अमृतसर तक थमी रफ्तार; चप्पे-चप्पे पर पुलिस

चंडीगढ़/जालंधर/अमृतसर, 21 अगस्त 2026

सिख कैदियों की रिहाई की मांग को लेकर कौमी इंसाफ मोर्चा की ओर से बुलाए गए पंजाब बंद का शुक्रवार को राज्य के कई हिस्सों में व्यापक असर देखने को मिला। सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक बुलाए गए बंद के दौरान जालंधर, अमृतसर, मोहाली समेत कई शहरों में बाजारों और यातायात पर असर पड़ा। किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए पुलिस ने संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी।

कौमी इंसाफ मोर्चा पिछले करीब तीन वर्षों से मोहाली में उन सिख कैदियों की रिहाई की मांग को लेकर धरना दे रहा है, जो लंबे समय से जेलों में बंद हैं। संगठन का कहना है कि कई कैदी अपनी सजा पूरी करने के बावजूद जेल में हैं और उन्हें रिहा किया जाना चाहिए। इसी मांग को लेकर मोर्चे ने राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया।

सुबह से ही दिखने लगा बंद का असर

शुक्रवार सुबह बंद शुरू होने के साथ ही पंजाब के अलग-अलग शहरों में इसका असर नजर आने लगा। कई जगह बाजारों के शटर बंद रहे और सड़कों पर सामान्य दिनों की तुलना में कम आवाजाही दिखाई दी।

जालंधर में कौमी इंसाफ मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने गुरु नानक मिशन चौक के बीचों-बीच धरना दिया। प्रदर्शन के कारण इलाके में यातायात प्रभावित हुआ और पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई।

अमृतसर में भी बंद का असर देखने को मिला। शहर के कई इलाकों में दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर इसका प्रभाव पड़ा। प्रशासन ने संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके।

आखिर क्यों बुलाया गया पंजाब बंद?

इस बंद का मुख्य मुद्दा लंबे समय से जेल में बंद बंदी सिंहों यानी सिख कैदियों की रिहाई है। कौमी इंसाफ मोर्चा का आरोप है कि कई ऐसे कैदी हैं जो अपनी सजा पूरी कर चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद उनकी रिहाई नहीं हुई है।

मोर्चा पिछले कई वर्षों से इस मुद्दे को लेकर आंदोलन कर रहा है। संगठन का धरना मोहाली में लंबे समय से जारी है और अब इस मांग को राज्य के बड़े हिस्से तक पहुंचाने के लिए पंजाब बंद का आह्वान किया गया।

इसके अलावा संगठन की ओर से जगतार सिंह हवारा को पैरोल देने और 15 अगस्त को चंडीगढ़ में हुए प्रदर्शन के दौरान दर्ज मामलों को वापस लेने जैसी मांगें भी उठाई जा रही हैं।

जालंधर में धरना, यातायात पर असर

जालंधर बंद के प्रमुख केंद्रों में शामिल रहा। गुरु नानक मिशन चौक पर प्रदर्शनकारियों के धरने के कारण यातायात व्यवस्था प्रभावित हुई।

पुलिस ने इलाके में स्थिति पर नजर रखी और लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की। प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे और बंद के समर्थन में नारे लगाए गए।

जालंधर से जुड़े अन्य बाजार क्षेत्रों में भी बंद का असर दिखाई दिया। कई दुकानदारों ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में अपने प्रतिष्ठान बंद रखे।

अमृतसर में भी सुरक्षा कड़ी

अमृतसर जैसे संवेदनशील और प्रमुख शहर में प्रशासन ने बंद से पहले ही सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर दी थी। पुलिस की तैनाती प्रमुख बाजारों, चौराहों और यातायात वाले स्थानों पर की गई।

बंद के दौरान कई जगह वाहनों की आवाजाही प्रभावित हुई। पुलिस लगातार स्थिति पर नजर रखती रही ताकि प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से हो सके।

अमृतसर में बंद का असर बाजारों के साथ-साथ सार्वजनिक परिवहन पर भी देखने को मिला।

स्कूल-कॉलेज भी रहे प्रभावित

पंजाब बंद का असर केवल बाजारों और सड़कों तक सीमित नहीं रहा। राज्य के कई निजी स्कूल भी शुक्रवार को बंद रहे।

राज्य के 7,500 से ज्यादा निजी स्कूलों का प्रतिनिधित्व करने वाले फेडरेशन ऑफ प्राइवेट स्कूल्स एंड एसोसिएशन ऑफ पंजाब ने 21 अगस्त को स्कूलों में छुट्टी की घोषणा की थी। हालांकि सरकार की ओर से सभी स्कूलों को बंद करने का कोई औपचारिक आदेश नहीं दिया गया था।

छात्रों को परेशानी से बचाने के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी ने भी 21 अगस्त को होने वाली कुछ परीक्षाओं का कार्यक्रम बदल दिया। रिपोर्ट के अनुसार इन परीक्षाओं को बाद की तारीख में आयोजित करने का निर्णय लिया गया।

पुलिस ने क्यों बढ़ाई तैनाती?

बंद के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती रही। प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ने और प्रमुख चौराहों पर धरने की संभावना को देखते हुए पुलिस बल की तैनाती बढ़ाई गई।

चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर समेत कई संवेदनशील स्थानों पर भी सुरक्षा बढ़ाई गई। पुलिस और प्रशासन की कोशिश रही कि प्रदर्शन के कारण आम लोगों को कम से कम परेशानी हो और किसी तरह की हिंसक स्थिति पैदा न हो।

पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने की अपील की और यातायात को सामान्य बनाए रखने की कोशिश की।

चंडीगढ़-मोहाली में भी नजर

पंजाब बंद का असर चंडीगढ़ और मोहाली के आसपास भी महसूस किया गया। खासकर चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत रखी गई।

यह इलाका इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि कौमी इंसाफ मोर्चा का लंबे समय से चल रहा धरना मोहाली में है। प्रशासन को आशंका थी कि प्रदर्शनकारी बड़ी संख्या में चंडीगढ़ की ओर बढ़ सकते हैं।

इसलिए पुलिस ने पहले से बैरिकेडिंग और सुरक्षा व्यवस्था की तैयारी कर रखी थी।

15 अगस्त के प्रदर्शन का भी जुड़ा है मामला

कौमी इंसाफ मोर्चा की वर्तमान मांगों के पीछे हाल में हुए प्रदर्शन का मुद्दा भी है। संगठन की ओर से 15 अगस्त को चंडीगढ़ में प्रदर्शन किया गया था।

उस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति बनी थी। इसके बाद संगठन ने दर्ज किए गए मामलों को वापस लेने और अपने आंदोलन से जुड़े लोगों पर कार्रवाई रोकने की मांग भी उठाई।

इसी घटनाक्रम के बाद 21 अगस्त को पंजाब बंद का आह्वान किया गया।

बंद को मिला संगठनों का समर्थन

कौमी इंसाफ मोर्चा के आह्वान को कई सिख संगठनों ने समर्थन दिया। इसके कारण बंद का प्रभाव कई शहरों में व्यापक हुआ।

प्राइवेट स्कूल संगठनों के अलावा कुछ परिवहन संगठनों की ओर से भी बंद को समर्थन मिलने की खबर सामने आई। इससे आम जनजीवन और यातायात पर इसका प्रभाव और बढ़ गया।

सरकार ने नहीं दिया था राज्यव्यापी बंद का आदेश

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पंजाब बंद सरकार द्वारा घोषित बंद नहीं था। यह कौमी इंसाफ मोर्चा की ओर से किया गया आह्वान था।

इसी वजह से सभी सरकारी संस्थानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों के लिए बंद रहना अनिवार्य नहीं था। इसके बावजूद अलग-अलग संगठनों और व्यापारियों के समर्थन के कारण कई स्थानों पर बाजार और संस्थान बंद रहे।

बंदियों की रिहाई बना बड़ा राजनीतिक-सामाजिक मुद्दा

सिख कैदियों की रिहाई का मुद्दा पंजाब में लंबे समय से संवेदनशील राजनीतिक और सामाजिक विषय रहा है। प्रदर्शनकारी उन कैदियों की रिहाई की मांग कर रहे हैं जिन्हें वे ‘बंदी सिंह’ के रूप में संदर्भित करते हैं।

मोर्चे का कहना है कि जिन लोगों की सजा पूरी हो चुकी है, उन्हें जेल में रखने का कोई औचित्य नहीं है। वहीं जिन मामलों में गंभीर आपराधिक या आतंकी आरोप और सजाएं जुड़ी हैं, उनमें रिहाई का सवाल कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।

इसी वजह से इस मुद्दे पर सरकार, प्रशासन और प्रदर्शनकारी संगठनों के बीच लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं।

दोपहर 2 बजे तक रहा बंद का समय

कौमी इंसाफ मोर्चा ने शुक्रवार को सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक पंजाब बंद का आह्वान किया था। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने बाजार बंद रखने और लोगों से आंदोलन का समर्थन करने की अपील की।

सुबह से दोपहर तक कई इलाकों में इसका असर दिखाई दिया। इसके बाद धीरे-धीरे बाजार और यातायात सामान्य होने की उम्मीद रही।

प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती

पंजाब बंद ने प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती खड़ी की। एक ओर प्रदर्शनकारियों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने का अधिकार था, वहीं दूसरी ओर आम लोगों के लिए सड़क, परिवहन और व्यापार को सामान्य बनाए रखना जरूरी था।

इसी वजह से पुलिस ने संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त बल तैनात किया और प्रमुख स्थानों पर निगरानी रखी।

अब प्रशासन की नजर इस बात पर है कि बंद के बाद आंदोलनकारी संगठन अपनी अगली रणनीति क्या तय करते हैं।

आगे क्या?

21 अगस्त के बंद के बाद अब सबकी नजर कौमी इंसाफ मोर्चा की अगली कार्रवाई पर रहेगी। अगर सिख कैदियों की रिहाई और अन्य मांगों पर सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता है, तो संगठन आंदोलन को आगे बढ़ाने का फैसला कर सकता है।

फिलहाल पंजाब में बंद का असर जालंधर से लेकर अमृतसर और अन्य शहरों तक देखने को मिला। बाजारों की गतिविधियां प्रभावित हुईं, कई शिक्षण संस्थान बंद रहे और यातायात पर असर पड़ा। वहीं कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस की भारी तैनाती की गई।

पंजाब बंद ने एक बार फिर सिख कैदियों की रिहाई के लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे को राज्य की राजनीति और सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।


भारी बारिश से हिमाचल बेहाल, कई जिलों का सड़क संपर्क टूटा

शिमला | 10 जुलाई 2026

हिमाचल प्रदेश में लगातार हो रही भारी मॉनसूनी बारिश ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। राज्य के विभिन्न हिस्सों में भूस्खलन, पेड़ गिरने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं के कारण 75 सड़कें बंद हो गई हैं। कई क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति और पेयजल व्यवस्था भी बाधित हुई है, जिससे लोगों की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं।

राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र (SEOC) की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक असर मंडी, कुल्लू, कांगड़ा, चंबा, किन्नौर और सिरमौर जिलों में देखने को मिला है। पहाड़ों से लगातार मलबा और चट्टानें गिरने के कारण कई प्रमुख सड़क मार्गों पर यातायात पूरी तरह ठप हो गया है। प्रशासन और लोक निर्माण विभाग की टीमें जेसीबी मशीनों की मदद से मलबा हटाकर रास्ते खोलने में जुटी हैं।

भारी बारिश के चलते कई स्थानों पर बड़े पेड़ उखड़कर सड़कों और बिजली लाइनों पर गिर गए, जिससे अनेक इलाकों में बिजली आपूर्ति बाधित हो गई। पेयजल योजनाएं भी प्रभावित हुई हैं और कई गांवों में लोगों को पानी की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। बिजली और जलापूर्ति बहाल करने के लिए संबंधित विभाग युद्धस्तर पर काम कर रहे हैं।

किन्नौर जिले में तेज बारिश और फ्लैश फ्लड के कारण एक लोहे का पुल बह जाने से एक गांव का संपर्क पूरी तरह कट गया। स्थानीय प्रशासन राहत और बचाव कार्य में जुटा है तथा प्रभावित क्षेत्रों में आवश्यक सामग्री पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है।

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने प्रदेश के कई जिलों में अगले 24 से 48 घंटे तक भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। प्रशासन ने लोगों और पर्यटकों से अनावश्यक यात्रा से बचने, नदी-नालों और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों से दूर रहने तथा मौसम संबंधी सलाह का पालन करने की अपील की है।

राज्य सरकार ने जिला प्रशासन को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। राहत एवं बचाव दल संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात हैं और हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि मौसम सामान्य होते ही बंद सड़कों को चरणबद्ध तरीके से खोलने का प्रयास किया जाएगा।


भीषण गर्मी से बेहाल दिल्ली, जुलाई की शुरुआत में मिलेगी बारिश की राहत

नई दिल्ली | 29 जून 2026

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और आसपास के एनसीआर क्षेत्र में मानसून की देरी के कारण भीषण गर्मी और उमस का दौर जारी है। रविवार को भी दिल्ली-एनसीआर के लोगों को तेज धूप, गर्म हवाओं और उमस का सामना करना पड़ा। मौसम विभाग के अनुसार, अगले एक-दो दिनों तक अधिकतम तापमान 40 से 41 डिग्री सेल्सियस के आसपास रह सकता है, जबकि उमस के कारण वास्तविक महसूस होने वाला तापमान इससे कहीं अधिक हो सकता है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्तर भारत की ओर बढ़ने की प्रक्रिया धीमी रही है। हालांकि मौसम विभाग का कहना है कि अगले 5 से 6 दिनों में मानसून के दिल्ली-एनसीआर तक पहुंचने के लिए परिस्थितियां अनुकूल बन रही हैं। यदि मौसमी सिस्टम सक्रिय रहा तो जुलाई के पहले सप्ताह में राजधानी में अच्छी बारिश देखने को मिल सकती है।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि फिलहाल आसमान में आंशिक बादल छाए रह सकते हैं, लेकिन गर्मी से तत्काल राहत मिलने की संभावना कम है। दिन के समय तेज धूप और उमस लोगों की परेशानी बढ़ाएगी। कुछ इलाकों में गरज-चमक के साथ हल्की बौछारें पड़ सकती हैं, लेकिन व्यापक बारिश की संभावना जुलाई की शुरुआत में अधिक है।

दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद और फरीदाबाद में गर्मी के कारण बिजली की मांग भी लगातार बढ़ रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों को दोपहर के समय अनावश्यक रूप से घर से बाहर न निकलने, पर्याप्त मात्रा में पानी पीने और लू से बचाव के उपाय अपनाने की सलाह दी है।

मौसम विभाग का अनुमान है कि 1 से 4 जुलाई के बीच दिल्ली-एनसीआर में गरज-चमक के साथ बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। इससे तापमान में गिरावट आएगी और लोगों को लंबे समय से जारी भीषण गर्मी से राहत मिलने की उम्मीद है।


रेगिस्तान में बरसात: राजस्थान में सामान्य से 154% ज्यादा बारिश, साल 2019 के बाद तेजी से बदल रहा है थार का चेहरा

दिनांक: 12 जून, 2026

जयपुर: अपनी तपती रेत और सूखे के लिए मशहूर भारत के सबसे शुष्क राज्य राजस्थान के मौसम चक्र में एक ऐतिहासिक और चौंकाने वाला बदलाव देखने को मिल रहा है। थार रेगिस्तान के इलाकों में इस साल जून के शुरुआती पखवाड़े में ही सामान्य से 154 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की जा चुकी है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, साल 2019 के बाद से पश्चिमी राजस्थान के पर्यावरण और मानसून के पैटर्न में जो बदलाव शुरू हुआ था, वह अब एक स्थाई रूप लेता दिख रहा है। रेगिस्तान में हो रही यह रिकॉर्ड तोड़ बारिश वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय बन गई है।

क्यों बरस रहे हैं रेगिस्तान में ‘बादल’?

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संगठनों की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस अभूतपूर्व बदलाव के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण काम कर रहे हैं:

  1. मानसून रेखा का पश्चिम की ओर खिसकना: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में ‘इंडियन समर मानसून’ का रुख धीरे-धीरे पश्चिम की ओर शिफ्ट हो रहा है। इसके चलते अरब सागर से उठने वाली नमी से भरी हवाएं अब सीधे थार रेगिस्तान के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र (Thermal Low) बनाकर भारी बारिश कर रही हैं।

  2. पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) का असर: इस साल जून की शुरुआत में आए तीव्र पश्चिमी विक्षोभ ने मानसूनी हवाओं के साथ मिलकर एक ऐसा वेदर सिस्टम तैयार किया, जिससे मरुस्थलीय जिलों—बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर और बीकानेर—में बादलों की सघन आवाजाही बढ़ गई है।

2019 के बाद बदल रहा है थार का भूगोल: ‘ग्रीनिंग ऑफ थार’

नासा (NASA) और आईआईटी गांधीनगर के संयुक्त सैटेलाइट अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले कुछ वर्षों में थार रेगिस्तान के वनस्पति क्षेत्र (Greening) में करीब 28 से 38 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है।

  • कृषि का विस्तार: इंदिरा गांधी नहर परियोजना से सिंचाई और भूजल के अत्यधिक दोहन के साथ-साथ बढ़ती मानसूनी बारिश ने रेगिस्तान की बंजर जमीनों को हरियाली में बदल दिया है।

  • फसलों के पैटर्न में बदलाव: जहाँ कभी सिर्फ बाजरा और ग्वार जैसी कम पानी वाली फसलें होती थीं, अब वहाँ मानसूनी और रबी सीजन में अन्य व्यावसायिक फसलें भी लहलहा रही हैं।

क्या यह बदलाव वरदान है या चेतावनी?

रेगिस्तान में हरियाली और पानी का आना पहली नजर में एक सुखद संकेत लगता है, लेकिन पर्यावरणविदों ने इसे लेकर रेड फ्लैग (चेतावनी) भी जारी किया है:

फ्लैश फ्लड (अचानक बाढ़) का खतरा: रेगिस्तान की मिट्टी सख्त और रेतीली होती है, जो भारी मात्रा में पानी को तुरंत सोख नहीं पाती। अचानक होने वाली इस मूसलाधार बारिश से जैसलमेर और बाड़मेर जैसे निचले इलाकों में जलभराव और अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।

इसके साथ ही, मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव पारंपरिक मरुस्थलीय जैव विविधता (Biodiversity) और वहाँ के स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है, क्योंकि जो जीव अत्यधिक शुष्क माहौल के अनुकूल थे, उन्हें अब इस अत्यधिक नमी से तालमेल बिठाने में दिक्कत आ रही है।

फिलहाल, राजस्थान का यह नया ‘वेदर हॉटस्पॉट’ रूप देश के नीति निर्माताओं को बदलते मौसम के अनुकूल नई योजनाएं बनाने पर मजबूर कर रहा है।


उत्तर प्रदेश में आंधी-तूफान और बारिश से भारी तबाही, 104 लोगों की मौत

15 मई 2026

Uttar Pradesh में तेज आंधी, बारिश और thunderstorms ने बड़े स्तर पर तबाही मचाई है। राज्यभर में अलग-अलग घटनाओं में 104 लोगों की मौत की खबर सामने आई है। कई जिलों में बिजली गिरने, पेड़ गिरने और मकान ढहने जैसी घटनाएं दर्ज की गईं। सबसे ज्यादा असर पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश के इलाकों में देखा गया।

India Meteorological Department (IMD) ने Noida, Ghaziabad, Lucknow और Kanpur समेत कई जिलों में yellow alert जारी किया है। मौसम विभाग ने लोगों को खराब मौसम के दौरान अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह दी है।

मौसम विभाग के अनुसार अगले 24 से 48 घंटों तक तेज हवाएं, बारिश, lightning और thunderstorms जारी रह सकते हैं। स्थिति को देखते हुए disaster management teams को alert mode पर रखा गया है।

तेज बारिश और ओलावृष्टि का असर किसानों पर भी पड़ा है। गेहूं, आम और सब्जियों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आई हैं। कई किसानों ने सरकार से मुआवजे की मांग की है।

आंधी-तूफान की वजह से कई इलाकों में बिजली आपूर्ति बाधित हुई, ट्रैफिक जाम की स्थिति बनी और ट्रेन व local transport सेवाएं भी प्रभावित रहीं। NCR क्षेत्र में कई पेड़ और बड़े hoardings गिरने की घटनाएं भी दर्ज की गई हैं।


मुंबई: वर्ली में गैस कालाबाजारी का भंडाफोड़, चॉल में छिपा था सिलेंडरों का जखीरा; पुलिस का बड़ा एक्शन

मुंबई | 14 मार्च, 2026

देशभर में एलपीजी आपूर्ति की किल्लत के बीच मुंबई पुलिस और राशन वितरण विभाग (Food Distribution Department) ने एक संयुक्त कार्रवाई में वर्ली इलाके में चल रहे अवैध गैस रिफिलिंग और ब्लैक मार्केटिंग रैकेट का पर्दाफाश किया है। प्रशासन को सूचना मिली थी कि संकट के इस समय में सिलेंडरों को रिहायशी इलाकों में जमा कर उन्हें मनमानी कीमतों पर बेचा जा रहा है।

छापेमारी की बड़ी बातें

  • लोकेशन: वर्ली नाका के पास गणपतराव कदम मार्ग पर स्थित ‘सूरज वल्लभदास चॉल’ में यह छापेमारी की गई।

  • बरामदगी: ऑपरेशन के दौरान भारी मात्रा में घरेलू और कमर्शियल सिलेंडर जब्त किए गए।

    • HP गैस: 5 किलो वाले 6 भरे और 58 खाली सिलेंडर।

    • सुपर गैस: 4 किलो वाले 64 भरे और 12 किलो वाले 19 भरे सिलेंडर।

    • अन्य: विभिन्न साइज के 25 खाली सिलेंडर।

  • साजिश: गिरोह बड़े सिलेंडरों से छोटे सिलेंडरों में गैस रिफिल कर उन्हें दोगुने-तिगुने दामों पर जरूरतमंदों और छोटे दुकानदारों को बेचता था।

इन लोगों पर दर्ज हुई FIR

वर्ली पुलिस स्टेशन ने इस मामले में निमेश अरविंद जैन और उस टेम्पो के मालिक के खिलाफ केस दर्ज किया है जिसका इस्तेमाल सिलेंडरों की सप्लाई के लिए किया जा रहा था। इन पर आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act), 1955 और एलपीजी (आपूर्ति और वितरण विनियमन) आदेश, 2000 की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है।

क्यों बढ़ी कालाबाजारी?

राजनीतिक और वैश्विक कारणों (पश्चिम एशिया संघर्ष) की वजह से पिछले कुछ दिनों से देश में रसोई गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसी का फायदा उठाकर जमाखोर सक्रिय हो गए हैं।

अधिकारियों की चेतावनी: “रिहायशी चॉल जैसे घने इलाकों में गैस सिलेंडरों का अवैध भंडारण न केवल अपराध है, बल्कि एक बड़े हादसे को न्यौता देना भी है। कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाएगी।”

सरकार का रुख


भारत की नई रक्षा रणनीति: ‘बेबी ब्रह्मोस’ जैसे किफायती हथियारों पर जोर, लंबी जंग की तैयारी

नई दिल्ली |  13 फरवरी 2026

वैश्विक संघर्षों के बदलते स्वरूप को देखते हुए भारत अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव कर रहा है। रक्षा सूत्रों के अनुसार अब फोकस सिर्फ महंगी और सीमित संख्या वाली मिसाइलों पर नहीं, बल्कि कम लागत वाले, उच्च तकनीक से लैस और बड़ी संख्या में उपलब्ध हथियारों पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूसयूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य के युद्ध लंबे समय तक चल सकते हैं और उनमें हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होगा।

‘मिनी लेकिन मारक’ हथियारों पर जोर

हाल में पिनाका रॉकेट सिस्टम के हवाई संस्करण का परीक्षण इसी नई रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञ इसे अनौपचारिक तौर पर “बेबी ब्रह्मोस” की अवधारणा से जोड़कर देख रहे हैं—यानी ऐसे छोटे आकार के हथियार जो सटीकता और मारक क्षमता में मजबूत हों, लेकिन लागत बहुत कम हो। बताया जा रहा है कि इनकी कीमत पारंपरिक हाई-एंड मिसाइलों की तुलना में कई गुना कम हो सकती है, जिससे इन्हें बड़े भंडार में रखा जा सकेगा।

सेना प्रमुख ने बताई जरूरत

उपेन्द्र द्विवेदी, जो वर्तमान में भारतीय सेना के प्रमुख हैं, ने हाल ही में कहा कि आधुनिक युद्ध “हाई-डेंसिटी वारफेयर” की ओर बढ़ रहे हैं। उनके अनुसार यदि किसी देश के पास किफायती लेकिन तकनीकी रूप से उन्नत हथियारों का पर्याप्त स्टॉक हो, तो वह लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में भी अपनी बढ़त बनाए रख सकता है।

रणनीतिक बदलाव का कारण

रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि आधुनिक युद्ध अब सिर्फ ताकतवर हथियारों की गुणवत्ता पर नहीं, बल्कि उनकी संख्या, उपलब्धता और लगातार उपयोग की क्षमता पर भी निर्भर करते हैं। लंबे युद्ध में महंगे हथियार जल्दी खत्म हो सकते हैं या उन्हें फिर से तैयार करने में समय लगता है। ऐसे में कम लागत वाले, तेज उत्पादन वाले हथियार निर्णायक साबित हो सकते हैं।

आत्मनिर्भरता और उत्पादन पर जोर

सरकार की “मेक इन इंडिया” रक्षा नीति के तहत स्वदेशी हथियार प्रणालियों के विकास और उत्पादन पर भी जोर बढ़ा है। इससे न केवल लागत घटती है बल्कि युद्धकाल में विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता भी कम होती है।

विशेषज्ञों का निष्कर्ष:
भारत की यह रणनीति संकेत देती है कि आने वाले समय में युद्ध केवल तकनीकी श्रेष्ठता से नहीं, बल्कि संसाधनों के स्मार्ट प्रबंधन और बड़े पैमाने पर तैनाती की क्षमता से तय होंगे। “बेबी ब्रह्मोस” जैसी अवधारणाएं इसी सोच का हिस्सा मानी जा रही हैं, जो भविष्य की लड़ाइयों के लिए नई सुरक्षा नीति का आधार बन सकती हैं।

 


 78 साल बाद बदलेगा सत्ता का केंद्र: PM मोदी आज नए ‘सेवा तीर्थ’ कार्यालय में शिफ्ट, साउथ ब्लॉक में आखिरी कैबिनेट बैठक

नई दिल्ली |  13 फरवरी 2026

देश की प्रशासनिक व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को नए प्रधानमंत्री कार्यालय परिसर ‘सेवा तीर्थ’ में शिफ्ट होंगे। यह कदम केंद्र सरकार के नए प्रशासनिक ढांचे की दिशा में एक बड़ा परिवर्तन माना जा रहा है। समाचार एजेंसी ANI के अनुसार, प्रधानमंत्री दोपहर करीब 1:30 बजे सेवा तीर्थ बिल्डिंग कॉम्पलेक्स के नाम का औपचारिक अनावरण करेंगे, जबकि शाम करीब 6 बजे सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन-1 व 2 का उद्घाटन करने के बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम को संबोधित करेंगे।

नई इमारतों में केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों के कार्यालय भी स्थापित किए जाएंगे। अभी तक प्रधानमंत्री कार्यालय और विभिन्न मंत्रालयों के दफ्तर नई दिल्ली स्थित ऐतिहासिक नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक में संचालित होते रहे हैं। ये दोनों इमारतें करीब 78 वर्षों तक देश की सत्ता और प्रशासन का मुख्य केंद्र रही हैं और स्वतंत्र भारत की कई महत्वपूर्ण नीतियों व फैसलों की साक्षी रही हैं।

शुक्रवार इन ऐतिहासिक इमारतों के लिए खास दिन है, क्योंकि यह सरकारी कामकाज का आखिरी दिन होगा। नए परिसर में स्थानांतरण से पहले प्रधानमंत्री मोदी साउथ ब्लॉक में केंद्रीय कैबिनेट की विशेष बैठक करेंगे, जो शाम 4 बजे निर्धारित है। यह बैठक ब्रिटिश कालीन सचिवालय भवन में आयोजित होने वाली आखिरी कैबिनेट बैठक होगी, जिससे इस इमारत के प्रशासनिक अध्याय का औपचारिक समापन हो जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि सेवा तीर्थ परिसर में स्थानांतरण से मंत्रालयों के बीच समन्वय, डिजिटल प्रशासन और कार्यक्षमता में सुधार होगा। साथ ही यह कदम आधुनिक बुनियादी ढांचे और केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था की दिशा में सरकार की दीर्घकालिक योजना का हिस्सा माना जा रहा है।

इस ऐतिहासिक बदलाव के साथ भारत की शासन व्यवस्था एक नए युग में प्रवेश करने जा रही है, जबकि नॉर्थ और साउथ ब्लॉक देश के राजनीतिक इतिहास की अमूल्य धरोहर के रूप में याद किए जाते रहेंगे।


भारत में सैटेलाइट सर्विस को लेकर पिछले काफी समय से चर्चा चल रही है। अब ऐसा लग रहा है कि भारत में जल्द ही सैटेलाइट इंटरनेट की सर्विस शुरू होने वाली है। दरअसल सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार एलन मस्क की स्टारलिंक को भारत सरकार की तरफ से लाइसेंस दे दिया गया है। स्टारलिंक को लाइसेंस मिलने के बाद अब यह कहा जा सकता है कि सैटेलाइट इंटरनेट का इंतजार अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। मस्क की कंपनी को पिछले महीने लेटर ऑप इंटेंट मिला था। अब एक कदम और आगे बढ़ाते हुए सरकार की तरफ से इसे GMPCS लाइसेंस भी मिल गया है।

Starlink बनी अप्रूवल पाने वाली तीसरी कंपनी

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक भारत सरकार के दूरसंचार विभाग की तरफ से शुक्रवार को स्टारलिंक को देश में सर्विस शुरू करने के लिए लाइसेंस दिया गया है। भारत सरकार की तरफ से स्टारलिंक को लाइसेंस मिलना कंपनी के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। आपको बता दें कि सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस के लिए भारत सरकार की तरफ से अप्रूवल पाने वाली स्टारलिंक तीसरी कंपनी है। सरकार ने इसससे पहले जियो और एयरटेल को भी लाइसेंस दे रखा है। सरकार की तरफ से लाइसेंस मिलने से पहले केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधियां ने कहा था कि स्टारलिंक सैटकॉम को जल्द लाइसेंस दिया जा सकता है।

सर्विस शुरू करने से एक कदम है दूर

GMPCS लाइसेंस मिलने के बाद अब स्टारलिंक के सामने सिर्फ एक चुनौती है। कंपनी को भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस शुरू करने के लिए IN-SPACe से अंतिम अप्रूवल हासिल करना होगा। इस अप्रूवल के मिलने बाद यूजर्स सैटेलाइट बेस्ड इंटरनेट सर्विस का इस्तेमाल कर पाएंगे। हालांकि अभी इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है कि इस अंतिम अप्रूवल के पूरा होने में कितना समय लगेगा।

आपको बता दें कि भारत में स्टारलिंक की एंट्री के लिए एलन मस्क 2022 से लगातार कोशिश कर रहे हैं। आखिरकार अब कंपनी का इंतजार खत्म हो गया है। भारत में सैटैलाइट इंटरनेट के लिए अमेजन की कुइपर कंपनी भी कोशिश में लगी हुई है। कंपनी ने इसके लिए भारत सरकार के पास आवेदन भी किया है।

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