शिमला | 10 जुलाई 2026
हिमाचल प्रदेश में लगातार हो रही भारी मॉनसूनी बारिश ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। राज्य के विभिन्न हिस्सों में भूस्खलन, पेड़ गिरने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं के कारण 75 सड़कें बंद हो गई हैं। कई क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति और पेयजल व्यवस्था भी बाधित हुई है, जिससे लोगों की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं।
राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र (SEOC) की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक असर मंडी, कुल्लू, कांगड़ा, चंबा, किन्नौर और सिरमौर जिलों में देखने को मिला है। पहाड़ों से लगातार मलबा और चट्टानें गिरने के कारण कई प्रमुख सड़क मार्गों पर यातायात पूरी तरह ठप हो गया है। प्रशासन और लोक निर्माण विभाग की टीमें जेसीबी मशीनों की मदद से मलबा हटाकर रास्ते खोलने में जुटी हैं।
भारी बारिश के चलते कई स्थानों पर बड़े पेड़ उखड़कर सड़कों और बिजली लाइनों पर गिर गए, जिससे अनेक इलाकों में बिजली आपूर्ति बाधित हो गई। पेयजल योजनाएं भी प्रभावित हुई हैं और कई गांवों में लोगों को पानी की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। बिजली और जलापूर्ति बहाल करने के लिए संबंधित विभाग युद्धस्तर पर काम कर रहे हैं।
किन्नौर जिले में तेज बारिश और फ्लैश फ्लड के कारण एक लोहे का पुल बह जाने से एक गांव का संपर्क पूरी तरह कट गया। स्थानीय प्रशासन राहत और बचाव कार्य में जुटा है तथा प्रभावित क्षेत्रों में आवश्यक सामग्री पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने प्रदेश के कई जिलों में अगले 24 से 48 घंटे तक भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। प्रशासन ने लोगों और पर्यटकों से अनावश्यक यात्रा से बचने, नदी-नालों और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों से दूर रहने तथा मौसम संबंधी सलाह का पालन करने की अपील की है।
राज्य सरकार ने जिला प्रशासन को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। राहत एवं बचाव दल संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात हैं और हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि मौसम सामान्य होते ही बंद सड़कों को चरणबद्ध तरीके से खोलने का प्रयास किया जाएगा।

भीषण गर्मी से बेहाल दिल्ली, जुलाई की शुरुआत में मिलेगी बारिश की राहत
नई दिल्ली | 29 जून 2026
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और आसपास के एनसीआर क्षेत्र में मानसून की देरी के कारण भीषण गर्मी और उमस का दौर जारी है। रविवार को भी दिल्ली-एनसीआर के लोगों को तेज धूप, गर्म हवाओं और उमस का सामना करना पड़ा। मौसम विभाग के अनुसार, अगले एक-दो दिनों तक अधिकतम तापमान 40 से 41 डिग्री सेल्सियस के आसपास रह सकता है, जबकि उमस के कारण वास्तविक महसूस होने वाला तापमान इससे कहीं अधिक हो सकता है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्तर भारत की ओर बढ़ने की प्रक्रिया धीमी रही है। हालांकि मौसम विभाग का कहना है कि अगले 5 से 6 दिनों में मानसून के दिल्ली-एनसीआर तक पहुंचने के लिए परिस्थितियां अनुकूल बन रही हैं। यदि मौसमी सिस्टम सक्रिय रहा तो जुलाई के पहले सप्ताह में राजधानी में अच्छी बारिश देखने को मिल सकती है।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि फिलहाल आसमान में आंशिक बादल छाए रह सकते हैं, लेकिन गर्मी से तत्काल राहत मिलने की संभावना कम है। दिन के समय तेज धूप और उमस लोगों की परेशानी बढ़ाएगी। कुछ इलाकों में गरज-चमक के साथ हल्की बौछारें पड़ सकती हैं, लेकिन व्यापक बारिश की संभावना जुलाई की शुरुआत में अधिक है।
दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद और फरीदाबाद में गर्मी के कारण बिजली की मांग भी लगातार बढ़ रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों को दोपहर के समय अनावश्यक रूप से घर से बाहर न निकलने, पर्याप्त मात्रा में पानी पीने और लू से बचाव के उपाय अपनाने की सलाह दी है।
मौसम विभाग का अनुमान है कि 1 से 4 जुलाई के बीच दिल्ली-एनसीआर में गरज-चमक के साथ बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। इससे तापमान में गिरावट आएगी और लोगों को लंबे समय से जारी भीषण गर्मी से राहत मिलने की उम्मीद है।

रेगिस्तान में बरसात: राजस्थान में सामान्य से 154% ज्यादा बारिश, साल 2019 के बाद तेजी से बदल रहा है थार का चेहरा
दिनांक: 12 जून, 2026
जयपुर: अपनी तपती रेत और सूखे के लिए मशहूर भारत के सबसे शुष्क राज्य राजस्थान के मौसम चक्र में एक ऐतिहासिक और चौंकाने वाला बदलाव देखने को मिल रहा है। थार रेगिस्तान के इलाकों में इस साल जून के शुरुआती पखवाड़े में ही सामान्य से 154 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की जा चुकी है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, साल 2019 के बाद से पश्चिमी राजस्थान के पर्यावरण और मानसून के पैटर्न में जो बदलाव शुरू हुआ था, वह अब एक स्थाई रूप लेता दिख रहा है। रेगिस्तान में हो रही यह रिकॉर्ड तोड़ बारिश वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय बन गई है।
क्यों बरस रहे हैं रेगिस्तान में ‘बादल’?
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संगठनों की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस अभूतपूर्व बदलाव के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण काम कर रहे हैं:
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मानसून रेखा का पश्चिम की ओर खिसकना: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में ‘इंडियन समर मानसून’ का रुख धीरे-धीरे पश्चिम की ओर शिफ्ट हो रहा है। इसके चलते अरब सागर से उठने वाली नमी से भरी हवाएं अब सीधे थार रेगिस्तान के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र (Thermal Low) बनाकर भारी बारिश कर रही हैं।
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पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) का असर: इस साल जून की शुरुआत में आए तीव्र पश्चिमी विक्षोभ ने मानसूनी हवाओं के साथ मिलकर एक ऐसा वेदर सिस्टम तैयार किया, जिससे मरुस्थलीय जिलों—बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर और बीकानेर—में बादलों की सघन आवाजाही बढ़ गई है।
2019 के बाद बदल रहा है थार का भूगोल: ‘ग्रीनिंग ऑफ थार’
नासा (NASA) और आईआईटी गांधीनगर के संयुक्त सैटेलाइट अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले कुछ वर्षों में थार रेगिस्तान के वनस्पति क्षेत्र (Greening) में करीब 28 से 38 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है।
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कृषि का विस्तार: इंदिरा गांधी नहर परियोजना से सिंचाई और भूजल के अत्यधिक दोहन के साथ-साथ बढ़ती मानसूनी बारिश ने रेगिस्तान की बंजर जमीनों को हरियाली में बदल दिया है।
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फसलों के पैटर्न में बदलाव: जहाँ कभी सिर्फ बाजरा और ग्वार जैसी कम पानी वाली फसलें होती थीं, अब वहाँ मानसूनी और रबी सीजन में अन्य व्यावसायिक फसलें भी लहलहा रही हैं।
क्या यह बदलाव वरदान है या चेतावनी?
रेगिस्तान में हरियाली और पानी का आना पहली नजर में एक सुखद संकेत लगता है, लेकिन पर्यावरणविदों ने इसे लेकर रेड फ्लैग (चेतावनी) भी जारी किया है:
फ्लैश फ्लड (अचानक बाढ़) का खतरा: रेगिस्तान की मिट्टी सख्त और रेतीली होती है, जो भारी मात्रा में पानी को तुरंत सोख नहीं पाती। अचानक होने वाली इस मूसलाधार बारिश से जैसलमेर और बाड़मेर जैसे निचले इलाकों में जलभराव और अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।
इसके साथ ही, मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव पारंपरिक मरुस्थलीय जैव विविधता (Biodiversity) और वहाँ के स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है, क्योंकि जो जीव अत्यधिक शुष्क माहौल के अनुकूल थे, उन्हें अब इस अत्यधिक नमी से तालमेल बिठाने में दिक्कत आ रही है।
फिलहाल, राजस्थान का यह नया ‘वेदर हॉटस्पॉट’ रूप देश के नीति निर्माताओं को बदलते मौसम के अनुकूल नई योजनाएं बनाने पर मजबूर कर रहा है।

उत्तर प्रदेश में आंधी-तूफान और बारिश से भारी तबाही, 104 लोगों की मौत
15 मई 2026
मुंबई | 14 मार्च, 2026
देशभर में एलपीजी आपूर्ति की किल्लत के बीच मुंबई पुलिस और राशन वितरण विभाग (Food Distribution Department) ने एक संयुक्त कार्रवाई में वर्ली इलाके में चल रहे अवैध गैस रिफिलिंग और ब्लैक मार्केटिंग रैकेट का पर्दाफाश किया है। प्रशासन को सूचना मिली थी कि संकट के इस समय में सिलेंडरों को रिहायशी इलाकों में जमा कर उन्हें मनमानी कीमतों पर बेचा जा रहा है।
छापेमारी की बड़ी बातें
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लोकेशन: वर्ली नाका के पास गणपतराव कदम मार्ग पर स्थित ‘सूरज वल्लभदास चॉल’ में यह छापेमारी की गई।
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बरामदगी: ऑपरेशन के दौरान भारी मात्रा में घरेलू और कमर्शियल सिलेंडर जब्त किए गए।
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HP गैस: 5 किलो वाले 6 भरे और 58 खाली सिलेंडर।
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सुपर गैस: 4 किलो वाले 64 भरे और 12 किलो वाले 19 भरे सिलेंडर।
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अन्य: विभिन्न साइज के 25 खाली सिलेंडर।
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साजिश: गिरोह बड़े सिलेंडरों से छोटे सिलेंडरों में गैस रिफिल कर उन्हें दोगुने-तिगुने दामों पर जरूरतमंदों और छोटे दुकानदारों को बेचता था।
इन लोगों पर दर्ज हुई FIR
वर्ली पुलिस स्टेशन ने इस मामले में निमेश अरविंद जैन और उस टेम्पो के मालिक के खिलाफ केस दर्ज किया है जिसका इस्तेमाल सिलेंडरों की सप्लाई के लिए किया जा रहा था। इन पर आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act), 1955 और एलपीजी (आपूर्ति और वितरण विनियमन) आदेश, 2000 की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है।
क्यों बढ़ी कालाबाजारी?
राजनीतिक और वैश्विक कारणों (पश्चिम एशिया संघर्ष) की वजह से पिछले कुछ दिनों से देश में रसोई गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसी का फायदा उठाकर जमाखोर सक्रिय हो गए हैं।
अधिकारियों की चेतावनी: “रिहायशी चॉल जैसे घने इलाकों में गैस सिलेंडरों का अवैध भंडारण न केवल अपराध है, बल्कि एक बड़े हादसे को न्यौता देना भी है। कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाएगी।”
सरकार का रुख
भारत की नई रक्षा रणनीति: ‘बेबी ब्रह्मोस’ जैसे किफायती हथियारों पर जोर, लंबी जंग की तैयारी
नई दिल्ली | 13 फरवरी 2026
वैश्विक संघर्षों के बदलते स्वरूप को देखते हुए भारत अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव कर रहा है। रक्षा सूत्रों के अनुसार अब फोकस सिर्फ महंगी और सीमित संख्या वाली मिसाइलों पर नहीं, बल्कि कम लागत वाले, उच्च तकनीक से लैस और बड़ी संख्या में उपलब्ध हथियारों पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस–यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य के युद्ध लंबे समय तक चल सकते हैं और उनमें हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होगा।
‘मिनी लेकिन मारक’ हथियारों पर जोर
हाल में पिनाका रॉकेट सिस्टम के हवाई संस्करण का परीक्षण इसी नई रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञ इसे अनौपचारिक तौर पर “बेबी ब्रह्मोस” की अवधारणा से जोड़कर देख रहे हैं—यानी ऐसे छोटे आकार के हथियार जो सटीकता और मारक क्षमता में मजबूत हों, लेकिन लागत बहुत कम हो। बताया जा रहा है कि इनकी कीमत पारंपरिक हाई-एंड मिसाइलों की तुलना में कई गुना कम हो सकती है, जिससे इन्हें बड़े भंडार में रखा जा सकेगा।
सेना प्रमुख ने बताई जरूरत
उपेन्द्र द्विवेदी, जो वर्तमान में भारतीय सेना के प्रमुख हैं, ने हाल ही में कहा कि आधुनिक युद्ध “हाई-डेंसिटी वारफेयर” की ओर बढ़ रहे हैं। उनके अनुसार यदि किसी देश के पास किफायती लेकिन तकनीकी रूप से उन्नत हथियारों का पर्याप्त स्टॉक हो, तो वह लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में भी अपनी बढ़त बनाए रख सकता है।
रणनीतिक बदलाव का कारण
रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि आधुनिक युद्ध अब सिर्फ ताकतवर हथियारों की गुणवत्ता पर नहीं, बल्कि उनकी संख्या, उपलब्धता और लगातार उपयोग की क्षमता पर भी निर्भर करते हैं। लंबे युद्ध में महंगे हथियार जल्दी खत्म हो सकते हैं या उन्हें फिर से तैयार करने में समय लगता है। ऐसे में कम लागत वाले, तेज उत्पादन वाले हथियार निर्णायक साबित हो सकते हैं।
आत्मनिर्भरता और उत्पादन पर जोर
सरकार की “मेक इन इंडिया” रक्षा नीति के तहत स्वदेशी हथियार प्रणालियों के विकास और उत्पादन पर भी जोर बढ़ा है। इससे न केवल लागत घटती है बल्कि युद्धकाल में विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता भी कम होती है।
विशेषज्ञों का निष्कर्ष:
भारत की यह रणनीति संकेत देती है कि आने वाले समय में युद्ध केवल तकनीकी श्रेष्ठता से नहीं, बल्कि संसाधनों के स्मार्ट प्रबंधन और बड़े पैमाने पर तैनाती की क्षमता से तय होंगे। “बेबी ब्रह्मोस” जैसी अवधारणाएं इसी सोच का हिस्सा मानी जा रही हैं, जो भविष्य की लड़ाइयों के लिए नई सुरक्षा नीति का आधार बन सकती हैं।
78 साल बाद बदलेगा सत्ता का केंद्र: PM मोदी आज नए ‘सेवा तीर्थ’ कार्यालय में शिफ्ट, साउथ ब्लॉक में आखिरी कैबिनेट बैठक
नई दिल्ली | 13 फरवरी 2026
देश की प्रशासनिक व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को नए प्रधानमंत्री कार्यालय परिसर ‘सेवा तीर्थ’ में शिफ्ट होंगे। यह कदम केंद्र सरकार के नए प्रशासनिक ढांचे की दिशा में एक बड़ा परिवर्तन माना जा रहा है। समाचार एजेंसी ANI के अनुसार, प्रधानमंत्री दोपहर करीब 1:30 बजे सेवा तीर्थ बिल्डिंग कॉम्पलेक्स के नाम का औपचारिक अनावरण करेंगे, जबकि शाम करीब 6 बजे सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन-1 व 2 का उद्घाटन करने के बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम को संबोधित करेंगे।
नई इमारतों में केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों के कार्यालय भी स्थापित किए जाएंगे। अभी तक प्रधानमंत्री कार्यालय और विभिन्न मंत्रालयों के दफ्तर नई दिल्ली स्थित ऐतिहासिक नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक में संचालित होते रहे हैं। ये दोनों इमारतें करीब 78 वर्षों तक देश की सत्ता और प्रशासन का मुख्य केंद्र रही हैं और स्वतंत्र भारत की कई महत्वपूर्ण नीतियों व फैसलों की साक्षी रही हैं।
शुक्रवार इन ऐतिहासिक इमारतों के लिए खास दिन है, क्योंकि यह सरकारी कामकाज का आखिरी दिन होगा। नए परिसर में स्थानांतरण से पहले प्रधानमंत्री मोदी साउथ ब्लॉक में केंद्रीय कैबिनेट की विशेष बैठक करेंगे, जो शाम 4 बजे निर्धारित है। यह बैठक ब्रिटिश कालीन सचिवालय भवन में आयोजित होने वाली आखिरी कैबिनेट बैठक होगी, जिससे इस इमारत के प्रशासनिक अध्याय का औपचारिक समापन हो जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि सेवा तीर्थ परिसर में स्थानांतरण से मंत्रालयों के बीच समन्वय, डिजिटल प्रशासन और कार्यक्षमता में सुधार होगा। साथ ही यह कदम आधुनिक बुनियादी ढांचे और केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था की दिशा में सरकार की दीर्घकालिक योजना का हिस्सा माना जा रहा है।
इस ऐतिहासिक बदलाव के साथ भारत की शासन व्यवस्था एक नए युग में प्रवेश करने जा रही है, जबकि नॉर्थ और साउथ ब्लॉक देश के राजनीतिक इतिहास की अमूल्य धरोहर के रूप में याद किए जाते रहेंगे।
भारत में सैटेलाइट सर्विस को लेकर पिछले काफी समय से चर्चा चल रही है। अब ऐसा लग रहा है कि भारत में जल्द ही सैटेलाइट इंटरनेट की सर्विस शुरू होने वाली है। दरअसल सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार एलन मस्क की स्टारलिंक को भारत सरकार की तरफ से लाइसेंस दे दिया गया है। स्टारलिंक को लाइसेंस मिलने के बाद अब यह कहा जा सकता है कि सैटेलाइट इंटरनेट का इंतजार अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। मस्क की कंपनी को पिछले महीने लेटर ऑप इंटेंट मिला था। अब एक कदम और आगे बढ़ाते हुए सरकार की तरफ से इसे GMPCS लाइसेंस भी मिल गया है।
Starlink बनी अप्रूवल पाने वाली तीसरी कंपनी
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक भारत सरकार के दूरसंचार विभाग की तरफ से शुक्रवार को स्टारलिंक को देश में सर्विस शुरू करने के लिए लाइसेंस दिया गया है। भारत सरकार की तरफ से स्टारलिंक को लाइसेंस मिलना कंपनी के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। आपको बता दें कि सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस के लिए भारत सरकार की तरफ से अप्रूवल पाने वाली स्टारलिंक तीसरी कंपनी है। सरकार ने इसससे पहले जियो और एयरटेल को भी लाइसेंस दे रखा है। सरकार की तरफ से लाइसेंस मिलने से पहले केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधियां ने कहा था कि स्टारलिंक सैटकॉम को जल्द लाइसेंस दिया जा सकता है।
सर्विस शुरू करने से एक कदम है दूर
GMPCS लाइसेंस मिलने के बाद अब स्टारलिंक के सामने सिर्फ एक चुनौती है। कंपनी को भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस शुरू करने के लिए IN-SPACe से अंतिम अप्रूवल हासिल करना होगा। इस अप्रूवल के मिलने बाद यूजर्स सैटेलाइट बेस्ड इंटरनेट सर्विस का इस्तेमाल कर पाएंगे। हालांकि अभी इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है कि इस अंतिम अप्रूवल के पूरा होने में कितना समय लगेगा।
आपको बता दें कि भारत में स्टारलिंक की एंट्री के लिए एलन मस्क 2022 से लगातार कोशिश कर रहे हैं। आखिरकार अब कंपनी का इंतजार खत्म हो गया है। भारत में सैटैलाइट इंटरनेट के लिए अमेजन की कुइपर कंपनी भी कोशिश में लगी हुई है। कंपनी ने इसके लिए भारत सरकार के पास आवेदन भी किया है।





