नई दिल्ली, 11 सितंबर 2026।
गणेश चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश की आराधना और घर में सुख-समृद्धि की कामना के साथ मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने घरों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करते हैं और निर्धारित अवधि तक विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान कई परिवार गणपति स्थापना से पहले वास्तु और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दिशा, प्रतिमा के स्वरूप और पूजा स्थान का विशेष ध्यान रखते हैं।
वास्तु संबंधी मान्यताओं के अनुसार गणपति की प्रतिमा को सही स्थान और दिशा में स्थापित करना शुभ माना जाता है। खास तौर पर यह सवाल अक्सर सामने आता है कि घर में बप्पा को किस दिशा में विराजमान किया जाए, उनका मुख किस ओर हो और मूर्ति की सूंड किस दिशा में मुड़ी हो।
गणपति स्थापना के लिए कौन सी दिशा शुभ मानी जाती है?
वास्तु मान्यताओं के अनुसार घर में गणपति की स्थापना के लिए उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण को महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा घर के पूर्वी हिस्से में भी पूजा स्थान बनाया जा सकता है।
मान्यता है कि ईशान कोण पूजा-पाठ और आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए शुभ क्षेत्र माना जाता है। इसलिए यदि घर में अलग पूजा कक्ष है तो वहां स्वच्छ और व्यवस्थित स्थान पर गणेश प्रतिमा स्थापित की जा सकती है।
हालांकि अलग-अलग वास्तु परंपराओं में प्रतिमा के मुख की दिशा को लेकर मत अलग मिलते हैं। इसलिए परिवार की धार्मिक परंपरा और स्थानीय आचार-विचार को भी ध्यान में रखना उचित माना जाता है।
बप्पा का मुख किस दिशा में रखें?
गणपति स्थापना को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा प्रतिमा के मुख की दिशा को लेकर होती है। कुछ वास्तु मान्यताओं में घर के लिए गणेश प्रतिमा को उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके रखने की सलाह दी जाती है। वहीं कुछ परंपराओं में प्रतिमा का मुख पश्चिम या दक्षिण की ओर रखने और पूजा करने वाले व्यक्ति का मुख पूर्व या उत्तर की ओर रखने की बात कही जाती है।
इसलिए केवल दिशा के एक नियम को अंतिम मानने के बजाय घर की संरचना, पूजा स्थान और पारिवारिक परंपरा के अनुसार स्थापना करना बेहतर माना जाता है।
वास्तु संबंधी मान्यताओं में उत्तर दिशा को समृद्धि से और पूर्व दिशा को सूर्य तथा सकारात्मक शुरुआत से जोड़ा जाता है। इसी कारण इन दिशाओं को पूजा के लिए विशेष महत्व दिया जाता है।
घर के लिए कैसी गणेश प्रतिमा चुनें?
गणेश चतुर्थी पर घर में स्थापना के लिए प्रतिमा चुनते समय उसके स्वरूप को लेकर भी कई धार्मिक मान्यताएं हैं।
वास्तु मान्यताओं के अनुसार घर में शांत और प्रसन्न मुद्रा वाले गणपति की प्रतिमा को शुभ माना जाता है। प्रतिमा सुंदर, पूर्ण और किसी भी प्रकार से खंडित नहीं होनी चाहिए।
कई परंपराओं में चार भुजाओं वाले गणेश जी की प्रतिमा को पूजा के लिए उपयुक्त माना जाता है। प्रतिमा में भगवान गणेश के साथ उनका वाहन मूषक भी हो, इसे भी शुभ माना जाता है।
गणेश जी की सूंड किस तरफ होनी चाहिए?
गणेश चतुर्थी पर प्रतिमा खरीदते समय सूंड की दिशा पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।
वास्तु और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बाईं ओर मुड़ी सूंड वाले गणपति, जिन्हें वाममुखी गणपति कहा जाता है, को सामान्य गृहस्थ पूजा के लिए शुभ माना जाता है। ऐसी प्रतिमा को सुख, शांति और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है।
वहीं दाईं ओर मुड़ी सूंड वाली प्रतिमा को लेकर अलग धार्मिक मान्यताएं हैं और कई परंपराओं में इसे विशेष पूजा-विधि से जोड़ा जाता है। इसलिए सामान्य घर की स्थापना के लिए प्रतिमा चुनते समय धार्मिक जानकार या अपने परिवार की परंपरा का मार्गदर्शन लेना उचित हो सकता है।
मूर्ति के साथ मूषक का होना क्यों माना जाता है जरूरी?
भगवान गणेश का वाहन मूषक माना जाता है। इसी वजह से कई धार्मिक परंपराओं में गणेश प्रतिमा के साथ मूषक की प्रतिमा को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
घर में गणपति की प्रतिमा खरीदते समय भक्त यह देखते हैं कि मूषक भी प्रतिमा के साथ मौजूद हो। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे गणेश जी का स्वरूप पूर्ण माना जाता है।
गणेश जी की मूर्ति किस रंग की हो?
गणेश प्रतिमा के रंग को लेकर भी धार्मिक और वास्तु मान्यताएं प्रचलित हैं।
मान्यताओं के अनुसार सफेद रंग की गणेश प्रतिमा को शांति और समृद्धि से जोड़ा जाता है। वहीं सिंदूरी रंग को सौभाग्य से, पीले रंग को शांति एवं पवित्रता से और हरे रंग को समृद्धि तथा विलासिता से जोड़कर देखा जाता है।
हालांकि प्रतिमा का रंग चुनना पूरी तरह धार्मिक परंपरा और श्रद्धा का विषय है। घर में स्थापना के लिए सबसे जरूरी बात प्रतिमा का श्रद्धापूर्वक और स्वच्छ स्थान पर स्थापित किया जाना माना जाता है।
गणपति की प्रतिमा कहां नहीं रखनी चाहिए?
वास्तु मान्यताओं के अनुसार गणपति की प्रतिमा को घर के ऐसे स्थान पर नहीं रखना चाहिए जहां लगातार अव्यवस्था रहती हो।
कुछ वास्तु परंपराओं में घर के दक्षिण-पश्चिम हिस्से, सीढ़ियों के नीचे या बीम के ठीक नीचे देव प्रतिमा स्थापित करने से बचने की सलाह दी जाती है। पूजा स्थल के आसपास जूते-चप्पल, कूड़ेदान या अनावश्यक सामान नहीं रखना चाहिए।
पूजा स्थल जितना स्वच्छ और शांत हो, धार्मिक दृष्टि से उतना ही बेहतर माना जाता है।
गणपति स्थापना के लिए चौकी कैसी हो?
वास्तु संबंधी मान्यताओं में गणेश प्रतिमा को सीधे जमीन पर रखने के बजाय ऊंची चौकी पर स्थापित करने की सलाह दी जाती है।
लकड़ी की चौकी पर लाल, पीले या केसरिया रंग का स्वच्छ कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर गणपति की प्रतिमा स्थापित की जा सकती है। स्थापना स्थल को पहले साफ करना और पूजा के दौरान वहां स्वच्छता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमा को दें प्राथमिकता
गणेश चतुर्थी के दौरान प्रतिमा की सामग्री पर भी ध्यान देना जरूरी है। पर्यावरण की दृष्टि से मिट्टी या प्राकृतिक सामग्री से बनी गणेश प्रतिमा को प्राथमिकता देना बेहतर माना जाता है।
ऐसी प्रतिमाओं के विसर्जन से पर्यावरण पर अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ता है। श्रद्धालुओं को स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन व्यवस्था और पर्यावरण संबंधी नियमों का पालन करना चाहिए।
पूजा स्थल पर क्या रखें?
गणपति स्थापना के बाद पूजा स्थल को साफ और व्यवस्थित रखना चाहिए। भगवान गणेश को दूर्वा, लाल फूल और मोदक अर्पित करने की परंपरा है।
कई परिवार गणेश चतुर्थी के दौरान सुबह और शाम आरती करते हैं। कुछ परिवार अपनी परंपरा के अनुसार गणेश मंत्र, गणेश अथर्वशीर्ष या अन्य स्तोत्रों का पाठ भी करते हैं।
पूजा के दौरान श्रद्धा और स्वच्छता को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है।
स्थापना के समय इन बातों का रखें ध्यान
गणेश चतुर्थी पर बप्पा को घर लाते समय कुछ सामान्य बातों का ध्यान रखना उपयोगी माना जाता है—
- स्थापना के लिए स्वच्छ और शांत स्थान चुनें।
- संभव हो तो ईशान कोण या पूर्व दिशा के पूजा क्षेत्र का उपयोग करें।
- घर की परंपरा के अनुसार मूर्ति के मुख की दिशा तय करें।
- सामान्य गृहस्थ पूजा के लिए वाममुखी यानी बाईं ओर मुड़ी सूंड वाली प्रतिमा को शुभ माना जाता है।
- प्रतिमा खंडित या टूटी हुई नहीं होनी चाहिए।
- गणेश जी के साथ मूषक का होना धार्मिक मान्यता के अनुसार शुभ माना जाता है।
- प्रतिमा को सीधे जमीन पर रखने के बजाय चौकी पर स्थापित करें।
- पूजा स्थल के आसपास जूते-चप्पल और अनावश्यक सामान न रखें।
- मिट्टी या पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमा को प्राथमिकता दें।
- विसर्जन के दौरान स्थानीय प्रशासन के निर्देशों और पर्यावरण नियमों का पालन करें।
वास्तु से ज्यादा महत्वपूर्ण है श्रद्धा
गणेश चतुर्थी पर वास्तु के नियमों को लेकर अलग-अलग परंपराओं में अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं। इसलिए दिशा को लेकर किसी एक नियम को लेकर भ्रमित होने की जरूरत नहीं है।
गणपति स्थापना का मूल उद्देश्य भगवान गणेश की श्रद्धापूर्वक पूजा करना और परिवार के सुख-शांति की कामना करना है। यदि घर में पहले से कोई पारंपरिक पूजा स्थान है तो परिवार की परंपरा और धार्मिक विधि के अनुसार स्थापना करना सबसे उचित माना जा सकता है।
वास्तु संबंधी दिशाएं धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा हैं और इनके प्रभाव को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
गणेश चतुर्थी 2026 पर क्यों खास है स्थापना की तैयारी?
गणेश चतुर्थी के दौरान कुछ दिनों के लिए घर में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इस वजह से परिवार पहले से पूजा स्थान तैयार करता है और प्रतिमा के लिए उपयुक्त जगह तय करता है।
ऐसे में स्थापना से पहले दिशा, प्रतिमा का स्वरूप, सूंड की दिशा, चौकी और पूजा सामग्री की तैयारी कर लेना भक्तों के लिए सुविधाजनक रहता है।

11 दिसंबर को शनि होंगे मार्गी, 5 राशियों को मिलेगा बंपर लाभ; अटके काम होंगे पूरे!
नई दिल्ली | 31 अगस्त 2026।
ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव को कर्मफलदाता और न्याय का देवता माना जाता है। शनि की चाल में बदलाव का असर सभी राशियों पर अलग-अलग तरह से पड़ने की मान्यता है। अब 11 दिसंबर 2026 को शनि अपनी वक्री अवस्था समाप्त करके मार्गी होने जा रहे हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार शनि के मार्गी होने से कई लोगों के जीवन में लंबे समय से चली आ रही रुकावटें कम हो सकती हैं और अटके हुए काम दोबारा गति पकड़ सकते हैं।
क्या होता है शनि का मार्गी होना?
ज्योतिष की भाषा में जब कोई ग्रह अपनी वक्री यानी उल्टी चाल को समाप्त करके सीधी गति में आता है, तो उसे मार्गी होना कहा जाता है।
मान्यता है कि शनि के वक्री रहने के दौरान व्यक्ति को काम में देरी, संघर्ष, मानसिक दबाव और विभिन्न प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। वहीं शनि के मार्गी होने के बाद इन परिस्थितियों में सुधार आने और मेहनत का बेहतर परिणाम मिलने की संभावना मानी जाती है।
11 दिसंबर को शनि के मार्गी होने के बाद करियर, आर्थिक मामलों और लंबे समय से अटके कामों को लेकर कुछ राशियों के लिए सकारात्मक समय शुरू होने की ज्योतिषीय संभावना जताई गई है।
शनि के मार्गी होने से किन राशियों को लाभ?
ज्योतिषीय गणना के आधार पर वृषभ, तुला, मकर, कुंभ और मीन राशि के जातकों के लिए शनि का मार्गी होना विशेष रूप से शुभ बताया गया है। इन राशियों के करियर, धन, संपत्ति और पारिवारिक जीवन में सकारात्मक बदलाव आने की संभावना जताई गई है।
1. वृषभ राशि
वृषभ राशि के जातकों के लिए शनि का मार्गी होना लाभकारी माना जा रहा है।
ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इस दौरान भाग्य का साथ मिल सकता है। कार्यक्षेत्र में वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग मिलने की संभावना है और पहले किए गए निवेश या संपत्ति से जुड़े मामलों में लाभ हो सकता है।
जो लोग लंबे समय से किसी आर्थिक अवसर की तलाश में हैं, उनके लिए भी समय अनुकूल रहने की उम्मीद जताई गई है।
2. तुला राशि
तुला राशि के जातकों के लिए भी शनि की सीधी चाल शुभ मानी जा रही है।
इस अवधि में जमीन, मकान या वाहन खरीदने के योग बनने की बात कही गई है। भौतिक सुख-सुविधाओं में बढ़ोतरी हो सकती है और दांपत्य जीवन में भी मधुरता आने की संभावना है।
परिवार में लंबे समय से चल रही किसी परेशानी का समाधान निकलने की उम्मीद भी जताई गई है।
3. मकर राशि
मकर राशि के स्वामी स्वयं शनिदेव हैं। ऐसे में शनि का मार्गी होना इस राशि के जातकों के लिए विशेष महत्व रखता है।
ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार नौकरी और कारोबार में आ रही बाधाएं कम हो सकती हैं। आय के नए स्रोत बन सकते हैं और आर्थिक स्थिति मजबूत होने की संभावना है।
इसके साथ ही लंबे समय से चला आ रहा मानसिक तनाव और काम का दबाव भी कम हो सकता है।
4. कुंभ राशि
कुंभ राशि पर भी शनिदेव का स्वामित्व है। इसलिए शनि की सीधी चाल को इस राशि के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कार्यस्थल पर मेहनत की सराहना हो सकती है। नई जिम्मेदारी मिलने, पद में बदलाव या प्रमोशन जैसे अवसर बन सकते हैं।
इसके अलावा लंबे समय से रुके हुए कामों के पूरे होने की संभावना भी ज्योतिषीय भविष्यवाणी में जताई गई है।
5. मीन राशि
मीन राशि के जातकों के लिए शनि के मार्गी होने को राहत देने वाला बताया गया है।
आर्थिक मोर्चे पर अटका हुआ पैसा वापस मिलने और व्यापार में नए सौदों से फायदा होने की संभावना जताई गई है।
परिवार में सुख-शांति बढ़ने और स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों में सुधार आने की भी ज्योतिषीय मान्यता है।
शनि मार्गी होने के बाद क्या हो सकता है बदलाव?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि कर्म और अनुशासन से जुड़े ग्रह माने जाते हैं। इसलिए शनि की सीधी चाल को मेहनत करने वालों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
लंबे समय से रुके हुए प्रोजेक्ट आगे बढ़ सकते हैं, करियर में ठहराव कम हो सकता है और आर्थिक मामलों में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिल सकता है।
हालांकि, ज्योतिषीय परिणाम व्यक्ति की पूरी जन्मकुंडली, दशा और ग्रहों की स्थिति पर भी निर्भर माने जाते हैं। इसलिए केवल राशि के आधार पर किसी व्यक्ति के भविष्य का निश्चित परिणाम बताना उचित नहीं होगा।
धन और करियर के लिए कैसा रहेगा समय?
शनि के मार्गी होने के बाद पांचों राशियों के लिए आर्थिक और करियर से जुड़े मामलों में सकारात्मक परिणाम की उम्मीद जताई गई है।
नौकरीपेशा लोगों को नई जिम्मेदारी या प्रमोशन मिल सकता है। वहीं कारोबार करने वालों के लिए नए अवसर और सौदे सामने आ सकते हैं।
पहले किए गए निवेश या संपत्ति से जुड़े मामलों में भी लाभ की संभावना बताई गई है।
अटके हुए काम पकड़ सकते हैं रफ्तार
शनि के वक्री होने के दौरान जिन कामों में देरी या बाधा की स्थिति बनी हुई थी, उनके मार्गी होने के बाद उनमें गति आने की ज्योतिषीय मान्यता है।
खासकर मकर और कुंभ राशि के जातकों के लिए लंबे समय से रुके कार्य पूरे होने की संभावना बताई गई है।
हालांकि, किसी भी काम की सफलता के लिए प्रयास, योजना और सही निर्णय जरूरी रहेंगे।
शनि मार्गी काल में कौन से उपाय करें?
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार शनि की कृपा पाने के लिए शनिवार के दिन कुछ उपाय किए जा सकते हैं।
शनि मंत्र का जाप
शनिवार को “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का 108 बार जाप करने की सलाह दी गई है।
पीपल के नीचे दीपक
शनिवार की शाम पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने की मान्यता है।
दान-पुण्य
जरूरतमंदों को काले तिल, उड़द की दाल, काले कपड़े या जूते-चप्पल का दान करने की सलाह दी जाती है।
क्या सभी राशियों पर पड़ेगा असर?
शनि की चाल में परिवर्तन का प्रभाव ज्योतिष के अनुसार सभी 12 राशियों पर माना जाता है। हालांकि, इस रिपोर्ट में पांच राशियों—वृषभ, तुला, मकर, कुंभ और मीन—के लिए विशेष लाभ की संभावना बताई गई है।
बाकी राशियों के लिए परिणाम उनकी कुंडली में शनि की स्थिति और अन्य ग्रहों के प्रभाव के आधार पर अलग हो सकते हैं।
निष्कर्ष
11 दिसंबर 2026 को शनिदेव वक्री अवस्था समाप्त करके मार्गी होंगे। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार उनकी सीधी चाल से कई लोगों के जीवन में रुके हुए काम आगे बढ़ सकते हैं और करियर तथा आर्थिक मामलों में सुधार की संभावना बन सकती है।
खास तौर पर वृषभ, तुला, मकर, कुंभ और मीन राशि के जातकों के लिए यह परिवर्तन शुभ बताया गया है। हालांकि ये सभी बातें ज्योतिषीय मान्यताओं और भविष्यवाणियों पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें निश्चित वैज्ञानिक भविष्यवाणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

तकनीक का दुस्साहस: AI से महाकाल मंदिर का फर्जी VIP पास बनाकर पहुंचे तीन युवक; सुरक्षा घेरे में हुए बेनकाब
उज्जैन | 15 जुलाई, 2026
विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में सुरक्षा और प्रवेश व्यवस्था को चुनौती देते हुए एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। भोपाल से आए तीन युवक, जिसमें एक मुख्य आरोपी और दो नाबालिग शामिल हैं, ‘ChatGPT’ और अन्य AI टूल की मदद से तैयार किए गए फर्जी ‘गर्भगृह दर्शन पास’ के जरिए मंदिर के प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश करते हुए पकड़े गए हैं [1.1.2, 1.2.4]।
QR कोड स्कैन होते ही खुला फर्जीवाड़े का राज
घटना मंगलवार की है, जब भोपाल के कोलार रोड निवासी भरत उइके (19) अपने दो नाबालिग साथियों के साथ मंदिर परिसर पहुंचा [1.1.2, 1.2.4]। युवकों ने ‘शीघ्र दर्शन’ लाइन से प्रवेश करने का प्रयास किया। उनके पास मौजूद मोबाइल में दिखाए गए पास को देखकर निजी सुरक्षाकर्मी को संदेह हुआ [1.2.4]। जब मंदिर समिति के कंप्यूटर ऑपरेटर ने पास पर अंकित QR कोड को स्कैन किया, तो वह फर्जी पाया गया [1.1.1, 1.2.4]।
फर्जी पास में थी हूबहू जानकारी
आरोपियों द्वारा तैयार किए गए उस नकली पास में QR कोड, आधार फोटो, एंट्री पास, नाम, मोबाइल नंबर, विजिट का प्रकार, पेमेंट टाइप, तारीख-समय, ट्रांजेक्शन आईडी और रजिस्ट्रेशन नंबर जैसी सभी जानकारियां दर्ज थीं [1.2.4]। पहली नजर में यह पास पूरी तरह असली लग रहा था, जिससे सुरक्षा प्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं [1.1.2, 1.2.4]।
ढाई साल से बंद है गर्भगृह में प्रवेश
पकड़े जाने के बाद सुरक्षाकर्मियों ने तीनों को महाकाल थाना पुलिस के हवाले कर दिया [1.1.2, 1.2.4]। पुलिस पूछताछ में पता चला कि उन्होंने AI टूल की मदद से वीआईपी पास जैसा दिखने वाला फॉर्मेट तैयार किया था [1.1.2]। गौरतलब है कि महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में सामान्य श्रद्धालुओं का प्रवेश जून 2022 से ही पूरी तरह प्रतिबंधित है [1.3.1]। इसी प्रतिबंधित व्यवस्था के कारण सुरक्षाकर्मियों का शक और गहरा गया और वे पकड़े गए [1.2.4]।
सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
इस घटना ने संवेदनशील धार्मिक स्थलों पर डिजिटल सत्यापन प्रणाली (Digital Verification System) को लेकर चिंता बढ़ा दी है [1.1.2]। विशेषज्ञों का मानना है कि AI जैसी आधुनिक तकनीकों के दुरुपयोग को रोकने के लिए मंदिर की मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक ‘स्मार्ट’ और सुरक्षित बनाने की तत्काल आवश्यकता है [1.1.2]। फिलहाल मंदिर समिति की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है [1.2.4]।
महाकाल मंदिर की दर्शन व्यवस्था, मंदिर समिति द्वारा सुरक्षा में किए जा रहे बदलावों और इस मामले की कानूनी अपडेट्स के लिए हमारी वेबसाइट के ‘सिटी क्राइम डेस्क’ को लगातार फॉलो करते रहें।
यह वीडियो उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में होने वाली दर्शन व्यवस्था और उससे जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों को समझने में मदद करेगा।

वट सावित्री पूर्णिमा 2026: पढ़ें पवित्र व्रत कथा, मिलेगा अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद
नई दिल्ली | 29 जून 2026
हिंदू धर्म में ज्येष्ठ पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस दिन वट सावित्री पूर्णिमा व्रत रखा जाता है, जिसे विशेष रूप से सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, वट वृक्ष और माता सावित्री की पूजा करने तथा व्रत कथा का श्रवण या पाठ करने से जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
क्या है वट सावित्री व्रत का महत्व?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास माना जाता है। इसलिए इस दिन वट वृक्ष की पूजा और उसकी परिक्रमा करने का विशेष महत्व है। श्रद्धालु वट वृक्ष के तने पर कच्चा सूत या रक्षा सूत्र बांधकर अपने परिवार की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु की कामना करते हैं।
वट सावित्री व्रत कथा
धार्मिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत तेजस्वी और पतिव्रता थीं। उन्होंने स्वयंवर में सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। महर्षि नारद ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि सत्यवान की आयु बहुत कम है और विवाह के एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी।
सावित्री ने यह भविष्यवाणी जानने के बावजूद सत्यवान से विवाह किया और पूरे समर्पण के साथ उनका साथ निभाया। नियत समय आने पर जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काटते समय मूर्छित होकर गिर पड़े, तब यमराज उनके प्राण लेकर जाने लगे।
सावित्री अपने पति के पीछे-पीछे यमराज के साथ चल पड़ीं। उनकी अटूट निष्ठा, बुद्धिमत्ता और धर्म के प्रति समर्पण से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें कई वरदान दिए। अंत में सावित्री ने अपने पति सत्यवान के जीवन का वरदान मांग लिया। यमराज ने उनकी पतिव्रता शक्ति से प्रसन्न होकर सत्यवान को पुनर्जीवन प्रदान कर दिया।
इसी घटना की स्मृति में वट सावित्री व्रत मनाया जाता है। यह व्रत पति-पत्नी के अटूट प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
पूजा विधि
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और माता सावित्री का पूजन करें।
- वट वृक्ष को जल, दूध, रोली, अक्षत, पुष्प और फल अर्पित करें।
- कच्चा सूत लपेटते हुए सात या 108 परिक्रमा करें।
- वट सावित्री व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें।
- अंत में परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की प्रार्थना करें।
क्या मिलेगा इस व्रत से?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है, परिवार में समृद्धि आती है और भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत करने वालों की मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है।
नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों में व्रत की परंपराएं और पूजा-विधि अलग-अलग हो सकती हैं।
वास्तु के अनुसार इस समय लगाएं झाड़ू, घर में बनी रहेगी सुख-समृद्धि
8 जून 2026
वास्तु शास्त्र में झाड़ू को केवल सफाई का साधन नहीं, बल्कि मां लक्ष्मी का प्रतीक भी माना गया है। मान्यता है कि घर में झाड़ू का सही उपयोग सकारात्मक ऊर्जा और आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देता है, जबकि कुछ गलतियां धन हानि और आर्थिक परेशानियों का कारण बन सकती हैं।
झाड़ू लगाने का सही समय
वास्तु के अनुसार सुबह सूर्योदय के बाद और दिन के समय झाड़ू लगाना शुभ माना जाता है। इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मक वातावरण बना रहता है। शाम के समय या सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाने से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इसे लक्ष्मी के आगमन का समय माना जाता है।
गलती नंबर 1: सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाना
वास्तु मान्यताओं के अनुसार सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाने से घर की सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा बाहर चली जाती है। हालांकि यदि किसी विशेष परिस्थिति में सफाई जरूरी हो तो कचरे को घर के बाहर न फेंकें और सुबह उसका निपटान करें।
गलती नंबर 2: झाड़ू को खुले में रखना
झाड़ू को हमेशा ऐसी जगह रखना चाहिए जहां वह लोगों की नजर में न आए। मुख्य द्वार, पूजा घर या रसोई के बीच में झाड़ू रखना वास्तु दोष का कारण माना जाता है।
गलती नंबर 3: झाड़ू पर पैर लगाना या खड़ा रखना
झाड़ू को लक्ष्मी का प्रतीक मानकर उसका सम्मान करने की सलाह दी जाती है। झाड़ू पर पैर लगाना, उसे फेंकना या खड़ा करके रखना शुभ नहीं माना जाता। इसे हमेशा जमीन पर लिटाकर सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए।
झाड़ू खरीदने का शुभ दिन
वास्तु मान्यताओं के अनुसार शनिवार, अमावस्या या कृष्ण पक्ष के कुछ दिनों में झाड़ू खरीदना शुभ माना जाता है। नई झाड़ू का उपयोग भी शुभ मुहूर्त में करने की परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है।
ध्यान रखें
ये सभी बातें धार्मिक और वास्तु मान्यताओं पर आधारित हैं। इनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक रूप से उपलब्ध नहीं है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग इन्हें परंपरा और आस्था के रूप में मानते हैं।

31 मई से फिर खुलेंगे भीमाशंकर मंदिर के द्वार, पुनर्विकास और सुरक्षा कार्य अंतिम चरण में
10 मई 2026 | पुणे, महाराष्ट्र
Bhimashankar Temple को आगामी 31 मई 2026 से श्रद्धालुओं के लिए दोबारा खोलने की घोषणा की गई है। मंदिर प्रशासन और संबंधित अधिकारियों ने बताया कि मंदिर परिसर में चल रहे संरक्षण, पुनर्विकास और आधारभूत संरचना उन्नयन कार्य अब अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं।
भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल भीमाशंकर मंदिर जनवरी 2026 के पहले सप्ताह से बंद था। लगभग चार महीनों तक श्रद्धालुओं के लिए दर्शन व्यवस्था बंद रखी गई थी ताकि बड़े स्तर पर विकास और सुरक्षा संबंधी कार्य पूरे किए जा सकें।
श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए किए गए विकास कार्य
अधिकारियों के अनुसार मंदिर क्षेत्र में तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या और आगामी 2027 नासिक कुंभ मेले को ध्यान में रखते हुए कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम किया गया है।
प्रशासन को उम्मीद है कि कुंभ मेले के दौरान Trimbakeshwar Temple आने वाले बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी भीमाशंकर पहुंचेंगे। इसी कारण भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया है।
मंदिर परिसर में किए गए प्रमुख कार्य
पुनर्विकास परियोजना के अंतर्गत कई बड़े बदलाव किए गए हैं। इनमें:
- तीर्थ मार्गों की मरम्मत और मजबूतीकरण
- नए viewing corridors का निर्माण
- विश्राम स्थलों और सुविधा केंद्रों का विकास
- प्रवेश और निकास प्रबंधन प्रणाली
- मंदिर परिसर का सौंदर्यीकरण और उन्नयन
जैसे कार्य शामिल हैं।
नया भव्य सभामंडप बनाया जा रहा
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर परिसर में एक नया भव्य सभामंडप भी विकसित किया जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि इससे बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर तरीके से व्यवस्थित किया जा सकेगा।
पर्यावरणीय संतुलन पर विशेष ध्यान
भीमाशंकर मंदिर पश्चिमी घाट के संरक्षित वन क्षेत्र में स्थित है। इसी कारण विकास कार्यों के दौरान पर्यावरणीय संवेदनशीलता को प्राथमिकता दी जा रही है।
अधिकारियों के अनुसार परियोजना में प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने और वन क्षेत्र पर न्यूनतम प्रभाव सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
स्थानीय परिवारों पर पड़ सकता है असर
पुनर्विकास योजना के चलते लगभग 103 स्थानीय परिवार प्रभावित हो सकते हैं। प्रशासन ने मंदिर से करीब 500 मीटर दूर पुनर्वास के लिए जमीन चिन्हित की है।
अधिकारियों का कहना है कि प्रभावित परिवारों को विश्वास में लेकर आगे की प्रक्रिया पूरी की जा रही है।
₹288 करोड़ से अधिक की विकास योजना
कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार भीमाशंकर विकास योजना की कुल लागत ₹288 करोड़ से अधिक बताई जा रही है। इस परियोजना का उद्देश्य धार्मिक पर्यटन, सुरक्षा और सुविधाओं को आधुनिक स्तर तक पहुंचाना है।
स्थानीय व्यापारियों और किसानों पर असर
मंदिर बंद रहने का असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा। आसपास के आदिवासी किसान, स्ट्रॉबेरी विक्रेता और छोटे दुकानदार श्रद्धालुओं की संख्या कम होने से आर्थिक रूप से प्रभावित हुए।
स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि मंदिर खुलने के बाद क्षेत्र में फिर से व्यापारिक गतिविधियां बढ़ने की उम्मीद है।
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई जारी
Forest Department Maharashtra ने मंदिर क्षेत्र के आसपास कई अवैध निर्माण हटाए हैं और रास्तों को साफ कराया है ताकि श्रद्धालुओं की आवाजाही और विकास कार्यों में बाधा न आए।
महाशिवरात्रि पर भी बंद रहा मंदिर
इस वर्ष महाशिवरात्रि 2026 के दौरान भी मंदिर श्रद्धालुओं के लिए बंद रखा गया था क्योंकि निर्माण और सुरक्षा संबंधी कार्य जारी थे। हालांकि स्थानीय चर्चाओं और सोशल मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मंदिर तक जाने वाले रास्ते खुले रहे और लोग ट्रैकिंग तथा राइडिंग के लिए क्षेत्र तक पहुंचते रहे।
धार्मिक विरासत और सुरक्षा पर फोकस
भीमाशंकर मंदिर से जुड़ी यह परियोजना धार्मिक विरासत संरक्षण, तीर्थयात्री सुरक्षा, कुंभ तैयारी, पर्यावरण संतुलन और स्थानीय आजीविका जैसे कई महत्वपूर्ण पहलुओं से जुड़ी हुई है। प्रशासन का कहना है कि मंदिर खुलने के बाद श्रद्धालुओं को पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित और सुव्यवस्थित दर्शन व्यवस्था उपलब्ध होगी।
Kharmas 2024: खरमास कब होगा समाप्त? इस पूरे 1 महीने भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां, होगा अशुभ, इन कार्यों को करने से मिलेगा शुभ फल
Kharmas 2024: इस साल खरमास 15 दिसंबर से शुरू हो चुका है. खरमास में कोई भी शुभ कार्य करने से मनाही होती है. इस साल 15 दिसंबर से लेकर 14 जनवरी 2025 को खरमास समाप्त होगा. तब तक कोई भी मांगलिक कार्य जैसे शादी-ब्याह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि नहीं की जाती है. अगर कोई करता है, तो उसे शुभ नहीं अशुभ फल की प्राप्ति हो सकती है. आप चाहते हैं कि आपके साथ कोई अनहोनी ना हो तो जान लें कि खरमास में क्या करना चाहिए और क्या करने से बचना चाहिए.
खरमास क्या है? (What is Kharmas)
ज्योतिषाचार्य डॉ. कृष्ण कुमार भार्गव कहते हैं कि सूर्य देव जब धनु राशि में प्रवेश करते हैं तब धनु संक्रांति होती है. इसी राशि परिवर्तन और धनु संक्रांति पड़ने से खरमास महीने की शुरुआत हो जाती है. इस दौरान भगवान सूर्य धनु राशि में ही रहते हैं. इसी के बाद मकर संक्रांति मनाई जाएगी. खरमास के समाप्त होते ही आप सभी मांगलिक और शुभ कार्यों को कर सकते हैं. शादी-ब्याह भी की जाएगी. जब धनु राशि से मकर राशि में भगवान सूर्य प्रवेत करते हैं तो मकर संक्रांति सेलिब्रेट किया जाता है.
खरमास में क्या करना चाहिए (kharmas me kya karna chahiye)
खरमास के महीने में पूजा-पाठ प्रतिदिन करते रहना चाहिए. मंत्रों का जाप करना चाहिए. इन शुभ कार्यों को करने से आपको कई लाभ हो सकते हैं. प्रतिदिन सूरज भगवान की पूजा करने से विशेष लाभ होगा. जल से अर्घ्य दें, सूर्य मंत्रों का जाप करें. इस पूरे महीने आप कृष्ण भगवान, विष्णु भगवान की भी पूजा करनी चाहिए. आपके जीवन में मौजूद सभी दुख-दर्द, परेशानी दूर होंगी और इच्छाओं की पूर्ति होगी. बृहस्पति ग्रह का प्रभाव कम होने से आप इनकी भी पूजा और मंत्रों का जाप कर सकते हैं. आपके बिगड़े कार्य होंगे पूरे. यदि आप खरमास में तुलसी मां की पूजा करें और शाम में तुलसी पौधे के पास दीपक जलाते हैं तो घर में सुख-समृद्धि आती है. घर में शांति बरकरार रहती है. इस पूरे महीने आपको बिस्तर का त्याग कर देना चाहिए और फर्श पर गद्दे बिछाकर सोएं. स्टील, कांच आदि बर्तनों में भोजन करने की बजाय पत्तलों में खाना भी शुभ माना गया है.
खरमास में क्या नहीं करना चाहिए? ( kharmas me kya nahi karna chahiye)
– आप चाहते हैं कि आपके घर सुख-समृद्धि आए, बरकत हो, तरक्की हासिल हो तो आप खरमास महीने में कोई भी शुभ कार्य करने से बचें. कोई भी नए व्यापार की शुरुआत न करें. किसी से बिजनेस डील न करें. शादी-ब्याह, घर खरीदना, गृह प्रवेश, मुंडन, जमीन, वाहन, रत्न, गहने, कपड़े आदि खरीदने से परहेज करें.
– जनेऊ संस्कार से भी बचना चाहिए. यदि आप शादी-ब्याह कर लेते हैं तो हो सकता है कि आगे चलकर आपके जीवन में परेशानियां उत्पन्न हो जाएं. आपके रिश्ते में खटास आ जाए. दांपत्य जीवन में नेगेटिव प्रभाव देखने को मिल पाता है. बेहतर है कि आप कोई भी मांगलिक कार्य खरमास समाप्त होने के बाद ही करें.
– खरमास के दौरान तामसिक भोजन भी नहीं करना चाहिए. ऐसे में मांस-मछली, प्याज, लहसुन, शराब, धूम्रपान करने से बिल्कुल भी परहेज करें.
– बेटी की शादी हुई है और खरमास पड़ गया है तो उसे इस दौरान अपने घर से विदा करने से भी बचना चाहिए. विदाई का शुभ कार्य खरमास लगने से पूर्व या समाप्त होने के बाद ही करें.
-यदि आपके घर कोई दुखियारा, गरीब, जरूतमंद या भिखारी आकर कुछ मांगता है तो उसे बुरा और अपशब्द करने से भी बचना चाहिए. डांटकर भगाने से बचें. ऐसा करना आपके लिए अशुभ होगा.




