5 राज्यों की सियासत में वोट प्रतिशत का खेल: बंगाल में 5% स्विंग से BJP को बढ़त, असम में मुस्लिम वोट बना बड़ा फैक्टर
नई दिल्ली | 30 मार्च, 2026
देश के पांच राज्यों में आगामी चुनावों को लेकर सियासी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार, छोटे-छोटे वोट प्रतिशत में बदलाव भी बड़े चुनावी नतीजे तय कर सकते हैं। खासतौर पर पश्चिम बंगाल और असम में स्थिति बेहद दिलचस्प मानी जा रही है।
बंगाल में 5% वोट स्विंग से बदल सकता है समीकरण
विश्लेषकों का मानना है कि अगर ममता बनर्जी की पार्टी के करीब 5% वोट खिसकते हैं, तो भारतीय जनता पार्टी राज्य में नंबर-1 पार्टी बन सकती है।
पिछले चुनावों में दोनों दलों के बीच वोट प्रतिशत का अंतर बहुत ज्यादा नहीं था, ऐसे में छोटा बदलाव भी बड़ा असर डाल सकता है।
असम में मुस्लिम वोट निर्णायक
वहीं असम में करीब 34% मुस्लिम मतदाता चुनावी परिणामों में अहम भूमिका निभा सकते हैं। यदि यह वोट बैंक एकजुट होकर मतदान करता है, तो हिमंत बिस्व सरमा के नेतृत्व वाली सरकार के लिए वापसी मुश्किल हो सकती है।
5 राज्यों में BJP की बड़ी परीक्षा
इन चुनावों में बीजेपी के लिए कई राज्यों में अपनी साख और विस्तार दोनों दांव पर हैं। पार्टी एक ओर सत्ता बचाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी ओर नए क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास भी कर रही है।
विपक्ष की रणनीति भी तेज
दूसरी तरफ विपक्षी दल भी वोट बैंक को एकजुट करने और स्थानीय मुद्दों को उभारने में जुटे हुए हैं। खासतौर पर क्षेत्रीय पार्टियां अपने-अपने राज्यों में मजबूत चुनौती पेश कर रही हैं।
छोटे बदलाव, बड़ा असर
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मौजूदा समय में चुनाव केवल बड़े मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि सूक्ष्म स्तर पर वोट शेयर के उतार-चढ़ाव पर भी निर्भर हो गए हैं। 3-5% वोट का इधर-उधर होना सरकार बनाने या गिराने में निर्णायक साबित हो सकता है।
नजरें चुनावी रणनीतियों पर
आने वाले समय में सभी दल अपने-अपने वोट बैंक को साधने के लिए नई रणनीतियां अपनाएंगे। जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय समीकरणों के साथ विकास के मुद्दे भी चुनावी बहस का केंद्र रहेंगे।
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को हटाने के लिए विपक्ष लाएगा प्रस्ताव, जानिए आगे की प्रक्रिया क्या होगी
नई दिल्ली | 09 मार्च 2026
नई दिल्ली | लोकसभा में आज विपक्षी दल स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव पेश करने जा रहे हैं। इस कदम से संसद में राजनीतिक माहौल गरमा गया है। विपक्ष ने सदन की कार्यवाही के पहले हिस्से में इस प्रस्ताव का नोटिस दिया था।
इस प्रस्ताव के मद्देनजर प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने सांसदों को सदन में उपस्थित रहने के लिए तीन लाइन व्हिप जारी किया है। भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों ने अपने सांसदों को महत्वपूर्ण मतदान के दौरान सदन में मौजूद रहने के निर्देश दिए हैं।
विपक्ष के आरोप
विपक्षी दलों का आरोप है कि स्पीकर सदन की कार्यवाही के संचालन में निष्पक्षता नहीं बरत रहे हैं और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्ष को पर्याप्त समय नहीं दिया जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए यह प्रस्ताव लाया गया है।
हालांकि, सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को निराधार बताया है और कहा है कि स्पीकर ने हमेशा नियमों के अनुसार सदन की कार्यवाही संचालित की है।
प्रस्ताव का आगे का प्रोसेस
लोकसभा में स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया संविधान और सदन के नियमों के तहत तय होती है।
- नोटिस देना:
किसी भी सांसद को स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव के लिए लिखित नोटिस देना होता है, जिसे निर्धारित संख्या में सांसदों का समर्थन होना चाहिए। - चर्चा की अनुमति:
नोटिस स्वीकार होने के बाद इस पर चर्चा के लिए दिन तय किया जाता है। उस दिन सदन में प्रस्ताव पर विस्तृत बहस होती है। - स्पीकर की भूमिका:
जब स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव पर चर्चा होती है, तो वे सदन की अध्यक्षता नहीं करते। इस दौरान कार्यवाही की अध्यक्षता किसी अन्य सदस्य या डिप्टी स्पीकर द्वारा की जाती है। - वोटिंग:
चर्चा के बाद प्रस्ताव पर मतदान होता है। यदि सदन के बहुमत सदस्य प्रस्ताव के पक्ष में वोट देते हैं, तो स्पीकर को पद छोड़ना पड़ता है।
राजनीतिक महत्व
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रस्ताव संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ते टकराव का संकेत है। हालांकि लोकसभा में संख्या बल के लिहाज से सत्तारूढ़ दल मजबूत स्थिति में है, इसलिए प्रस्ताव के पारित होने की संभावना कम मानी जा रही है।
फिर भी इस मुद्दे पर होने वाली बहस संसद के भीतर राजनीतिक रणनीति और विपक्ष की एकजुटता की परीक्षा मानी जा रही है।
INDI गठबंधन की कमान को लेकर सियासी हलचल: अय्यर के बयान से बढ़ी चर्चा, विपक्षी दलों में प्रतिक्रिया तेज
23 फरवरी 2026
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर के ताज़ा बयान ने विपक्षी राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने सुझाव दिया कि राहुल गांधी को INDI गठबंधन की कमान किसी अन्य वरिष्ठ नेता को सौंप देनी चाहिए ताकि गठबंधन को अधिक समय और सक्रिय नेतृत्व मिल सके। अय्यर का कहना है कि गठबंधन को मजबूत करने के लिए नेतृत्व ऐसा होना चाहिए जो सभी दलों को संतुलित समय दे सके और साझा रणनीति पर फोकस कर सके।
उन्होंने संभावित नेताओं के तौर पर ममता बनर्जी, एम. के. स्टालिन, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जैसे नामों का जिक्र किया। उनके मुताबिक ये नेता क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत जनाधार रखते हैं और गठबंधन को समय देकर उसे चुनावी तौर पर अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
कांग्रेस और सहयोगी दलों की प्रतिक्रिया
अय्यर के बयान पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर ही अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। पार्टी के कई नेताओं ने इसे उनका व्यक्तिगत विचार बताया और कहा कि गठबंधन के नेतृत्व का फैसला सामूहिक सहमति से होता है, न कि सार्वजनिक बयानबाज़ी से।
वहीं तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भी बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि विपक्षी एकता को लेकर सार्वजनिक मंचों पर ऐसे बयान देना राजनीतिक रूप से उचित नहीं है और इससे विपक्षी एकजुटता की छवि प्रभावित हो सकती है।
गठबंधन की रणनीति पर बढ़ी चर्चा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अय्यर की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब विपक्षी दल आगामी चुनावों को लेकर साझा रणनीति बनाने में जुटे हैं। ऐसे में नेतृत्व को लेकर उठी यह बहस संकेत देती है कि गठबंधन के भीतर नेतृत्व मॉडल और समन्वय तंत्र पर अभी भी चर्चा जारी है।
हालांकि, अभी तक गठबंधन के किसी आधिकारिक मंच से नेतृत्व परिवर्तन को लेकर कोई संकेत नहीं दिया गया है। सूत्रों के अनुसार, विपक्षी दल फिलहाल सीट-शेयरिंग, साझा एजेंडा और चुनावी रणनीति पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं, ताकि चुनावी मुकाबले में एकजुटता दिखाई जा सके।
स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस, राहुल गांधी के हस्ताक्षर न करने पर सियासी चर्चा तेज
केंद्र में मोदी सरकार के 11 साल पूरे हो गए हैं। इसको लेकर भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की है। नड्डा ने कहा कि मोदी सरकार जनता के नेतृत्व वाली सरकार है। पिछले कुछ सालों में हमने पारदर्शिता लाई है और एक दूरदर्शी, फ्यूचर ओरिएंटेड प्रशासन बनाया है। इसीलिए हम विकसित भारत की बात करते हैं। यह अमृत काल है। पिछले 11 सालों ने वास्तव में विकसित और आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव रखी है।
इन सिद्धांतों पर किया गया काम
बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमने सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास के मूल सिद्धांत पर काम किया है। मोदी सरकार की योजनाओं से आम जनता को खासा लाभ हुआ है।
11 सालों में मोदी सरकार ने लिए ऐतिहासिक फैसले
इसके साथ ही नड्डा ने कहा, ‘एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 11 साल के शासन का पूरा लेखा-जोखा पेश करना मुश्किल है, लेकिन हमारी सरकार ने लगातार राष्ट्रहित में साहसिक और ऐतिहासिक फैसले लिए हैं। कुछ उदाहरण लें तो हमने अनुच्छेद 370 को हटाया और तीन तलाक को खत्म किया। हमने नया वक्फ अधिनियम बनाया और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित किया। हमने विधायी निकायों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण भी सुनिश्चित किया है।’
लोगों की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि
नड्डा ने कहा कि मोदी सरकार के तहत नेतृत्व में मजबूत भरोसे के कारण लोगों की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह वही देश है, जहां पहले शिक्षा मंत्रियों को एक साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने में भी संघर्ष करना पड़ता था। लेकिन आज हम सामूहिक रूप से राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) पर सहमत हुए हैं। जो कि हमारे इतिहास में सबसे व्यापक और सबसे समावेशी परामर्श प्रक्रियाओं में से एक का परिणाम है।
स्वच्छ भारत सबसे सफल आंदोलन बना
पार्टी अध्यक्ष ने आगे कहा, ‘एक समग्र दृष्टिकोण के कारण, हमने बिना किसी भ्रम या अराजकता के सुचारू रूप से एक नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति पेश की है। स्वच्छ भारत जैसी पहल सबसे सफल जन आंदोलनों में से एक बन गई है।’
जिम्मेदार व जवाबदेह वाली सरकार है
केंद्रीय मंत्री एवं पार्टी अध्यक्ष नड्डा ने कहा कि देश में 11 साल पहले, तुष्टिकरण व समाज को खंडित करके अपनी कुर्सी को सुरक्षित रखना राजनीतिक संस्कृति का तरीका बन गया था। लेकिन 2014 के बाद पीएम मोदी के नेतृत्व वाली जिम्मेदार व जवाबदेह सरकार आई, जिसने रिपोर्ट कार्ड की राजनीति शुरू की। हम जो काम कर रहे हैं, उसे जनता के सामने रखें। उन्होंने कहा कि पिछले 11 साल में पीएम मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने भारत की राजनीति की संस्कृति को बदला है।







